200 साल का रहस्य सुलझा: रोहतासगढ़ किले में मिला ऐतिहासिक संस्कृत शिलालेख, 7 साल की मेहनत के बाद पढ़ा गया
इतिहासकार डॉ. श्याम सुंदर तिवारी ने 7 साल की कड़ी मेहनत के बाद रोहतासगढ़ किले के 200 साल पुराने दुर्लभ ...और पढ़ें

किले पर लिखा शिलालेख। (जागरण)
HighLights
दो सदी से अधिक पुराना रोहतासगढ़ शिलालेख आखिरकार पढ़ा गया।
इतिहासकार डॉ. श्याम सुंदर तिवारी ने वर्षों के प्रयास से सफलता पाई।
यह शिलालेख राजा मान सिंह की किलेबंदी का महत्वपूर्ण विवरण देता है।
प्रवीण दुबे, सासाराम (रोहतास)। बिहार के ऐतिहासिक रोहतासगढ़ किले से जुड़ा एक बड़ा पुरातात्विक रहस्य सुलझ गया है।
कठौतिया घाट दरवाजे के ऊपर लगभग 20 फीट की ऊंचाई पर लगा एक प्राचीन संस्कृत शिलालेख, जो पिछले दो शताब्दियों से अधिक समय से इतिहासकारों और पुरातत्वविदों की पकड़ से बाहर था, उसे अब सफलता-पूर्वक पढ़ लिया गया है।
इस कठिन और ऐतिहासिक पाठ को डिकोड करने का श्रेय वरिष्ठ इतिहासकार डॉ. श्याम सुंदर तिवारी को जाता है।
दो सदियों का इंतजार और दिग्गजों की असफलता
कठौतिया घाट द्वार पर स्थित यह शिलालेख अत्यंत क्षतिग्रस्त स्थिति में है और इसके अक्षर बहुत छोटे हैं। इसी वजह से लंबे समय तक कई प्रमुख इतिहासकार और सर्वेक्षक इसको पढ़ नहीं पा रहे थे।
कुछ महत्वपूर्ण तथ्य
- 1812: ब्रिटिश सर्वेयर फ्रांसिस बुकानन ने सबसे पहले अपनी डायरी में इसका जिक्र किया।
- 1838–1896: मार्टिन (1838), इतिहासकार राजेंद्र लाल मित्र (1876) और प्रो. किल्हौर्न (1896) जैसे विद्वानों के अध्ययनों में भी इसका स्पष्ट विवरण सामने नहीं आ सका।
- 1901–1929: भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के डॉ. थियोडोर ब्लोच (1901-02) और मौलवी मोहम्मद हामिद कुरैशी (1929) ने स्थल का दौरा तो किया, लेकिन सटीक संसाधनों (जैसे सीढ़ी) की कमी और पत्थर के टूटे होने के कारण वे भी इसे पढ़ नहीं पाए।
शिलालेख की विषय-वस्तु और सैन्य महत्व
यह अभिलेख रोहतासगढ़ किले की सामरिक किलेबंदी और कठौतिया घाट के निर्माण की सटीक जानकारी देता है।
रोहतासगढ़ में प्रवेश का सबसे सुगम और प्राकृतिक रास्ता कठौतिया घाट माना जाता था, जो दो गहरी खाइयों के बीच लगभग 100 मीटर की डमरू-नुमा पट्टी पर स्थित है। पहले यहां लाल दरवाजा और गुलेरिया खोह के पास सुरक्षा घेरा बनाया गया था, जो समय के साथ जर्जर हो गया।
सुरक्षा के खतरे को देखते हुए राजा मानसिंह ने इस संवेदनशील मार्ग को मिट्टी और विशाल पत्थरों की मदद से एक मजबूत पहाड़ी की तरह सुरक्षित कराया, ताकि बिना अनुमति कोई किले में एंट्री न कर सके। इसी नए रक्षा द्वार के निर्माण के साथ उन्होंने यह शिलालेख स्थापित करवाया था।
जहांगीर काल की राजनीतिक पहेली
डॉ. तिवारी के अनुसार, इस शिलालेख में सबसे चौंकाने वाली बात इसका समयकाल और राजनीतिक संदर्भ है। सन 1607 के इस अभिलेख में स्पष्ट रूप से राजा मानसिंह के निर्माण कार्य का ब्यौरा है।
यह निर्माण मुगल शासक जहांगीर के शासनकाल (1605–1627) में हुआ था, फिर भी इस शिलालेख में जहांगीर का नाम गायब है। इसके विपरीत, हथियापोल में स्थित अकबर के समय का शिलालेख स्पष्ट रूप से मुगल सम्राट अकबर का उल्लेख करता है।
जहांगीर का नाम न होना उस दौर में मुगल केंद्र और स्थानीय प्रांतीय शासकों (राजा मानसिंह) के बीच के राजनीतिक और सामाजिक संबंधों पर नए शोध के द्वार खोलता है।
7 साल की कड़ी मेहनत
डॉ. तिवारी को इस शिलालेख को डिकोड करने में सात साल का समय लगा। रोहतासगढ़ के घने जंगलों और पत्तियों के कारण शुरुआत में स्पष्ट तस्वीरें लेना संभव नहीं था।
2019 में पतझड़ के मौसम में पेड़ों की पत्तियां गिरीं और उन्हें शिलालेख की पहली साफ तस्वीर मिली। इसके बाद अलग-अलग कोणों से तस्वीरें लेकर उनका डिजिटल विश्लेषण किया गया।
विशेषज्ञों का सहयोग
टूटे और गायब अक्षरों को समझने के लिए तात्कालिक ऐतिहासिक परिस्थितियों और संस्कृत व्याकरण का सहारा लिया गया, जिसमें आचार्य पंडित राम अवधेश चतुर्वेदी जैसे विशेषज्ञों का मार्गदर्शन मिला।
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