बिहार में 'फर्जी-मनगढ़ंत FIR' से कोर्ट चिंतित, सख्त लहजा अपनाते हुए 68 साल के बुजुर्ग को दी जमानत
सहरसा कोर्ट ने 68 वर्षीय आरोपी को जमानत देते हुए डीजीपी और गृह सचिव को एफआईआर दर्ज करने के संबंध में आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करने का सुझाव दिया।

प्रतीकात्मक तस्वीर
HighLights
सहरसा कोर्ट ने फर्जी एफआईआर पर जताई गंभीर चिंता।
68 वर्षीय बुजुर्ग आरोपी नन्हकू यादव को मिली जमानत।
डीजीपी, गृह सचिव को एफआईआर दिशानिर्देश जारी करने का सुझाव।
जागरण संवाददाता, सहरसा। सहरसा के अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश चतुर्थ अविनाश कुमार ने सिमरी बख्तियारपुर थाना में दर्ज गोली मारकर हत्या के एक मामले में जमानत की सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है।
न्यायालय ने जमानत याचिका पर फैसला सुनाते हुए बिहार में कथित रूप से बढ़ रही फर्जी एवं मनगढ़ंत एफआईआर की प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त की है। साथ ही इस संबंध में बिहार के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) एवं गृह सचिव को प्रशासनिक स्तर पर आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करने का सुझाव दिया है।
न्यायालय ने आरोपी नन्हकू यादव उर्फ नंद किशोर यादव को जमानत प्रदान करते हुए कहा कि वह 01 मार्च 2023 से न्यायिक हिरासत में हैं, उनकी आयु लगभग 68 वर्ष है। उनका आपराधिक इतिहास नहीं है तथा सह-अभियुक्त को पूर्व में उच्च न्यायालय से जमानत मिल चुकी है।
साथ ही मामले के अधिकांश गवाहों का परीक्षण पूरा हो चुका है और साक्ष्यों से छेड़छाड़ की संभावना भी कम है। इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने 10,000 रुपये के निजी मुचलके एवं समान राशि के दो जमानतदारों पर उन्हें जमानत देने का आदेश दिया।
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने यह भी दलील दी कि प्राथमिकी दर्ज होने के समय एवं पोस्टमार्टम तथा पंचनामा की प्रक्रिया के समय में विसंगतियां हैं तथा एफआईआर की सत्यता पर प्रश्न उठाए। न्यायालय ने इन दलीलों का उल्लेख करते हुए बिहार में एफआईआर लेखन की वर्तमान व्यवस्था पर गंभीर चिंता व्यक्त की।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि बिहार में यह एक चिंताजनक प्रवृत्ति बनती जा रही है कि अनेक मामलों में प्राथमिकी स्वयं सूचक की हस्तलिपि में नहीं लिखी जाती। न्यायालय ने सुझाव दिया कि यदि एफआईआर सूचक की लिखावट में नहीं है तो उसी कागज पर यह स्पष्ट रूप से अंकित किया जाए कि शिकायत किस व्यक्ति ने लिखी है तथा उसका नाम और पता क्या है।
न्यायालय ने यह भी सुझाव दिया कि यदि शिकायत या एफआईआर कंप्यूटर अथवा टाइप मशीन से तैयार की गई हो तो यह भी दर्ज किया जाए कि उसे किस स्थान पर और किस व्यक्ति द्वारा टाइप कराया गया।
अपने आदेश में अदालत ने यह भी कहा कि यदि इन सुझावों को प्रशासनिक आदेश के रूप में लागू किया जाता है तो झूठे मुकदमों एवं फर्जी एफआईआर की घटनाओं पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सकेगा। अदालत ने आदेश की प्रति बिहार के डीजीपी, गृह सचिव तथा पुलिस अधीक्षक, सहरसा को ई-मेल एवं अन्य माध्यम से भेजने का निर्देश भी दिया।
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