छपरा में 13 एकड़ से सिकुड़कर 2 एकड़ में सिमटा वेटलैंड, वेटरन्स फोरम ने DM से लगाई गुहार
वेटरन्स फोरम ने छपरा की अधिसूचित आर्द्रभूमियों पर अतिक्रमण और उनके सिकुड़ते दायरे पर चिंता जताई है। उन्होंने जिलाधिकारी से अतिक्रमण हटाने, संरक्षण के ...और पढ़ें

छपरा की आर्द्रभूमियों पर अतिक्रमण का खुलासा (AI Generated Image)
HighLights
वेटरन्स फोरम ने छपरा की अधिसूचित आर्द्रभूमियों पर अतिक्रमण का मुद्दा उठाया।
मलामिर्जा टुकड़ा आर्द्रभूमि का क्षेत्रफल 13 एकड़ से घटकर 2 एकड़ हुआ।
प्रशासन से अतिक्रमण हटाने और आर्द्रभूमि संरक्षण की मांग की गई।
जागरण संवाददाता, छपरा। शहर की अधिसूचित आर्द्रभूमियों (वेटलैंड) पर अतिक्रमण और उनके सिकुड़ते दायरे को लेकर वेटरन्स फोरम फॉर ट्रांसपेरेंसी इन पब्लिक लाइफ ने प्रशासन का ध्यान आकर्षित किया है। फोरम की ओर से जिलाधिकारी को भेजे गए पत्र में छपरा नगर निगम क्षेत्र की आर्द्रभूमियों की पहचान कर अतिक्रमण हटाने तथा उनके संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाने की मांग की गई है।
पत्र के अनुसार बिहार राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण ने छपरा नगर निगम क्षेत्र में तीन आर्द्रभूमियों को अधिसूचित एवं पंजीकृत किया है। इनमें पूरबी तेलपा स्थित मलामिर्जा टुकड़ा आर्द्रभूमि के अलावा नगर निगम क्षेत्र की दो अन्य आर्द्रभूमियां शामिल हैं। तीनों का कुल क्षेत्रफल 14.39 हेक्टेयर दर्ज है।
फोरम के महासचिव विंग कमांडर (सेवानिवृत्त) डा. विश्वनाथ प्रसाद सिंह ने बताया कि संगठन द्वारा प्राधिकरण से प्राप्त विवरण के आधार पर इन आर्द्रभूमियों का स्थल सर्वेक्षण किया गया। सर्वे के दौरान केवल पूरबी तेलपा स्थित मलामिर्जा टुकड़ा आर्द्रभूमि की पहचान हो सकी।
उनका दावा है कि अभिलेखों में इसका क्षेत्रफल 5.43 हेक्टेयर (करीब 13.44 एकड़) दर्ज है, जबकि वर्तमान में इसका वास्तविक क्षेत्रफल घटकर लगभग दो एकड़ रह गया है। वहीं अधिसूचित अन्य दो आर्द्रभूमियों का अस्तित्व स्थल पर नहीं मिल सका।
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फोरम ने अपने पत्र में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के आदेश के अनुपालन में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) द्वारा जारी जल निकायों के पुनर्स्थापन संबंधी दिशानिर्देशों का भी उल्लेख किया है।
इसमें राज्य सरकारों को तालाबों और झीलों की सीमाओं का अभिलेख सुरक्षित रखने तथा अतिक्रमण हटाने के लिए आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित करने का प्राविधान है।
पत्र में कहा गया है कि आर्द्रभूमियां जल शोधन, बाढ़ नियंत्रण, भूजल पुनर्भरण, तट संरक्षण और कार्बन संचयन जैसी महत्वपूर्ण पारिस्थितिकीय सेवाएं प्रदान करती हैं। लेकिन शहरीकरण, अतिक्रमण, जल प्रदूषण और अव्यवस्थित विकास के कारण इनका अस्तित्व लगातार संकट में पड़ रहा है।
फोरम ने चिंता जताई है कि छपरा नगर निगम क्षेत्र में तेजी से गिरते भूजल स्तर के पीछे आर्द्रभूमियों का सिकुड़ना और उन पर बढ़ता अतिक्रमण भी एक प्रमुख कारण हो सकता है।
पत्र में प्रशासन से अधिसूचित आर्द्रभूमियों की पुनः पहचान कराने, अतिक्रमण हटाने और भविष्य में संरक्षण सुनिश्चित करने के लिए उनकी सीमाओं पर स्थायी संकेतक चिह्न स्थापित कराने की मांग की गई है।