68 साल की उम्र में बिजनेस वुमन बनीं सुपौल की कुमकुम: घर के पीछे शुरू की मशरूम फार्मिंग, 2 जिलों में सप्लाई
सुपौल की 68 वर्षीय कुमकुम सिंह ने मशरूम की खेती कर आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश की है। स्वतंत्रता सेनानी की पौत्री कुमकुम ने अपने घर के पीछे बटन और ऑयस्ट ...और पढ़ें


समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
ब्रह्मानंद सिंह, सुपौल। प्राकृतिक विपदा के चलते पिछड़ेपन के शिकार कोसी क्षेत्र की महिलाएं आत्मनिर्भर बन देश के विकास में किसी न किसी रूप में अपना योगदान दे रही हैं। ऐसी ही एक महिला सदर प्रखंड के बरैल गांव में है, जिनकी उम्र तो लगभग 68 वर्ष है, लेकिन उन्होंने अपनी बढ़ती उम्र को अपने जुनून के आड़े नहीं आने दिया।
ये हैं स्वतंत्रता सेनानी शत्रुघ्न प्रसाद सिंह की पौत्री कुमकुम सिंह। इनके पिता भी लंबे समय तक पंचायत के मुखिया रहे। ये अपने दम पर मशरूम उपजा रही हैं और सुपौल व सहरसा जिले के बाजार में बेच रही हैं।
कुमकुम बढ़ती उम्र के लोगों के लिए एक मिसाल बनी हुई है। कुमकुम सिंह का कहना कि मेरे दो बेटे हैं, जो फिलहाल मुंबई में नौकरी करते हैं। मैं कुछ वर्ष पूर्व गुजरात के गांधीनगर में थी, जहां मुझे कुछ करने की प्रेरणा मिली।
उसके बाद बेटे के साथ मुंबई आई और मशरूम की खेती करने की सोची। गांव में घर बंद रहता था, इसलिए इसी जगह मशरूम बेड लगाने की योजना बनाई।
घर के पीछे खाली जमीन थी, जहां पिछले साल एक हजार बैग से बटन मशरूम का उत्पादन शुरू किया। 100 बैग आस्टर्ड मशरूम भी लगाई। जब मशरूम तैयार हुआ तो उसके लिए बाजार भी खोजी।
AC फॉर्म बनाने की है योजना
उन्होंने कहा, "अब मेरी योजना मशरूम का वातानुकूलित फार्म बनाने की है, ताकि बाजार को अधिक मात्रा में मशरूम उपलब्ध करा सकूं।"
उन्होंने बताया कि वैसे बटन मशरूम की सबसे अधिक मांग है, लेकिन आगे मिल्की मशरूम उपजाने की भी योजना है। वे मशरूम की खेती को वृहत रूप देने की भी बात कहती हैं। यह भी बताती हैं कि बच्चों में कुपोषण दूर करने के लिए मशरूम बेहतर उपाय है।
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वह बताती हैं कि धान-गेहूं की खेती के लिए अधिक जमीन चाहिए, लेकिन मशरूम उत्पादन के लिए ऐसी बात नहीं है। इतना ही नहीं धान-गेहूं कभी उपजा तो कभी नहीं। ये इस तरह के रोजगार करने के लिए गांव के बेरोजगार युवाओं को भी प्रोत्साहित करती हैं।
सरकार से मदद न मिलने का मलाल
हालांकि, इन्हें इस बात का भी मलाल है कि इस दिशा में विभाग से अबतक कोई मदद नहीं मिली। विभाग से मदद मिले इसके लिए वे प्रयास भी की, लेकिन बात ढाक के तीन पात बनकर रह गई।
फिलहाल इस मशरूम फार्म से कई लोगों को रोजगार भी मिल गया है। इस उम्र में कुमकुम सिंह के जज्बे को देख गांव के कई लोग अब मशरूम की खेती से जुड़ने का मन बना रहे हैं। उनकी मजबूत इच्छाशक्ति काबिले तारीफ है।