अभावों को 'किक' कर सपनों का गोल दाग रहीं थरुहट की बेटियां, फुटबॉल विश्वकप के बीच निखर रहा हुनर
Tharu Tribe Football Girls: पश्चिम चंपारण के थारुहट क्षेत्र की बेटियां अभावों के बावजूद फुटबॉल में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रही हैं, फीफा विश्वकप से प्रेर ...और पढ़ें

नदी किनारे रेत पर अभ्यास करने पहुंचीं सिठी की बेटियां। सौ. प्रशिक्षक

समय कम है?
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प्रभात मिश्र, नरकटियागंज (पश्चिम चंपारण)। Bihar Women Footballers: ये बेटियां हर रोज जिंदगी के अभावों को 'किक' मारती हैं। सामने आने वाली हर बाधा को 'हिट' करती हैं और मुश्किलों के बीच से संभावनाओं को लपककर मैदान में 'गोल' का शानदार जश्न मनाती हैं।
यह कहानी है पश्चिम चंपारण के थारू जनजाति बहुल क्षेत्र 'थरुहट' की उन बेटियों की, जो आज किसी पहचान की मोहताज नहीं हैं।
इन दिनों फीफा फुटबॉल विश्वकप का रोमांच पूरी दुनिया के साथ-साथ वाल्मीकि टाइगर रिजर्व के जंगलों से सटे सुदूर गांवों तक पहुंच चुका है।
फुटबॉलर तनु को अभ्यास कराते प्रशिक्षक। सौ. प्रशिक्षक
पहले से ही मैदान में दनादन फुटबॉल उड़ाने वाली यहां की बेटियां अब विश्वकप के मैचों को देखकर दुनिया के दिग्गज खिलाड़ियों की तकनीक और शैली को अपने खेल में उतार रही हैं।
मोबाइल-टीवी की सीमित पहुंच और नेटवर्क की जंग
जिला मुख्यालय बेतिया से करीब 65 किलोमीटर दूर गौनाहा प्रखंड का सिठी गांव इन दिनों फुटबॉल का गढ़ बना हुआ है। जंगल से सटे होने के कारण यहां आज भी मोबाइल नेटवर्क का बड़ा इश्यू रहता है। बिजली और टीवी की पहुंच भी सीमित है।
इसके बावजूद, खेल के प्रति इन बेटियों की दीवानगी ऐसी है कि वे रात में मैच देखने के लिए दूसरों के घरों तक का चक्कर लगाती हैं।
रात में जो बारीक तकनीक, ड्रिब्लिंग, ऑफसाइड, टैकलिंग और थ्रू-पास वे स्क्रीन पर देखती हैं, अगले ही दिन सुबह मैदान पर आकर उसका कड़ा अभ्यास करती हैं।
कोई हालैंड तो कोई एमबाप् से सीख रही
बिहार टीम की दीवार बनीं गोलकीपर तनु
सिठी गांव की रहने वाली तनु कुमारी आज बिहार सब-जूनियर टीम की भरोसेमंद गोलकीपर हैं। असम के जोरहाट में आयोजित सब-जूनियर राष्ट्रीय फुटबॉल प्रतियोगिता में बिहार को तीसरा स्थान दिलाने में तनु की भूमिका बेहद अहम रही थी।
अभ्यास करती खिलाड़ी गीता कुमारी। सौ. प्रशिक्षक
वह छत्तीसगढ़ में आयोजित राष्ट्रीय जनजातीय फुटबॉल प्रतियोगिता में भी बिहार का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। तनु बताती हैं कि विश्वकप के मैचों में दुनिया के टॉप गोलकीपरों की पोजीशनिंग और बॉल सेव करने की तकनीक देखकर वह अपने खेल को और निखार रही हैं।
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एर्लिंग हालैंड और एमबाप्पे हैं आदर्श
प्रथम खेल नर्सरी की स्ट्राइकर दामिनी कुमारी विश्व फुटबॉल के स्टार स्ट्राइकर नार्वे के एर्लिंग हालैंड को अपना आदर्श मानती हैं। दामिनी का कहना है कि हालैंड की शारीरिक ताकत, मैदान पर उनकी गति और सटीक गोल करने की क्षमता उन्हें सबसे ज्यादा प्रेरित करती है।
वहीं, बिहार अंडर-14 टीम की स्ट्राइकर रितिका कुमारी फ्रांस के स्टार खिलाड़ी किलियन एमबाप्पे की रफ्तार और आक्रामक खेल शैली की दीवानी हैं और मैदान पर उसी अंदाज में डिफेंडरों को छकाते हुए आगे बढ़ने का अभ्यास करती हैं।
पगडंडियों से निकलकर नेशनल टीम तक
250 से अधिक बेटियां बहा रही हैं पसीना
सुदूर इलाके में स्थित सिठी और उसके आसपास के पंचकहर, मंडीहा और जगन्नाथपुर गांवों की करीब 250 बेटियां विभिन्न आयु वर्ग की श्रेणियों में फुटबॉल खेल रही हैं।
इन गांवों में न तो कोई आधुनिक स्टेडियम है, न कोई जिम और न ही खेल की बुनियादी सुविधाएं। इसके बावजूद 'प्रथम खेल नर्सरी' के माध्यम से ये बेटियां किसी भी खाली या परती पड़ी जमीन को ही अपना स्टेडियम मानकर पसीना बहा रही हैं।
आर्थिक तंगी से लड़कर चमकीं गीता
इन्हीं पगडंडियों से निकलकर बिहार की बेहतरीन मिडफील्डरों में शुमार होने वाली गीता कुमारी की कहानी बेहद भावुक करने वाली है। बचपन में ही मां का साया सिर से उठ गया। पिता पंजाब में मजदूरी कर किसी तरह परिवार का पेट पालते हैं।
इस भयंकर आर्थिक तंगी के बाद भी गीता ने अपने सपनों से समझौता नहीं किया। वह अब तक खेलो इंडिया, आंध्र प्रदेश में आयोजित नेशनल फुटबॉल और भुवनेश्वर के राष्ट्रीय जनजातीय खेलों में बिहार का नाम रोशन कर चुकी हैं। गीता का एक ही सपना है— भारतीय राष्ट्रीय फुटबॉल टीम की जर्सी पहनना।
सिठी गांव और आसपास की बेटियां अपनी विपरीत परिस्थितियों के बावजूद उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रही हैं। हमारी संस्था उन्हें बेहतर से बेहतर प्रशिक्षण देने का हरसंभव प्रयास कर रही है। फिलहाल फुटबॉल विश्वकप को लेकर लड़कियों में गजब का क्रेज है। वे मैच देखने के साथ-साथ उसकी तकनीकी बारीकियों को समझ रही हैं, जिससे हमारी कोचिंग और ट्रेनिंग के काम में काफी मदद मिल रही है।
सुमित पांडेय, प्रशिक्षक (प्रथम खेल नर्सरी, गौनाहा)