Trending

    विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

    गिद्धों को बचाने के लिए खुला जटायु रेस्टोरेंट, बिहार में सैलानियों और शोधकर्ताओं के लिए बना नया हॉटस्पॉट

    Updated: Mon, 20 Jul 2026 05:55 AM (IST)

    Wildlife Research Bihar: भारत-नेपाल सीमा पर वाल्मीकिनगर के पास 'जटायु रेस्टोरेंट' गिद्धों के संरक्षण का एक अनूठा केंद्र है, जिसने विलुप्त हो रहे गिद्ध ...और पढ़ें

    प्रजातियों के संरक्षण और पर्यावरण संतुलन को बनाए रखने की दिशा में अनोखा प्रयास।

    प्रजातियों के संरक्षण और पर्यावरण संतुलन को बनाए रखने की दिशा में अनोखा प्रयास।

    timer icon

    समय कम है?

    जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

    संक्षेप में पढ़ें

    सुनील कुमार गुप्ता, वाल्मीकिनगर (पश्चिम चंपारण)। Jatayu Restaurant Vulture: विलुप्त हो रही वन्यजीव प्रजातियों के संरक्षण और पर्यावरण संतुलन को बनाए रखने की दिशा में एक अनोखा प्रयास सामने आया है।

    भारत-नेपाल सीमा पर स्थित वाल्मीकिनगर से सटे नवलपरासी जिले में संचालित 'जटायु रेस्टोरेंट' आज गिद्धों के संरक्षण के साथ-साथ पर्यटन और शोध का एक बड़ा वैश्विक केंद्र बन चुका है।

    एक अनूठा संरक्षण केंद्र

    जटायु रेस्टोरेंट के संयोजक डी बी चौधरी ने बताया कि नाम सुनने में यह भले ही इंसानों के खान-पान की जगह जैसा लगता है, लेकिन असल में यह विलुप्त हो रहे गिद्धों को सुरक्षित भोजन (आहार) उपलब्ध कराने के लिए स्थापित किया गया एक अनूठा संरक्षण केंद्र है।

    डाइक्लोफेनेक का डंक

    साल 1990 के दशक में पशुओं के इलाज में इस्तेमाल होने वाली 'डाइक्लोफेनेक' दवा के जहरीले असर के कारण नेपाल और भारत में गिद्धों की आबादी तेजी से घटने लगी थी। इस संकट को देखते हुए साल 2006 में स्थानीय निवासियों, वन कर्मियों और सरकार ने मिलकर इस केंद्र की नींव रखी।

    बढ़ी गिद्धों की संख्या

    कावासोटी नगरपालिका के नमूना मध्यवर्ती सामुदायिक वन के लगभग 50 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले इस अनूठे रेस्टोरेंट में जब शुरुआत हुई थी, तब यहां सिर्फ 72 गिद्ध थे। बेहतर देखरेख और सुरक्षित माहौल के कारण आज इस बसेरे में गिद्धों की संख्या बढ़कर करीब 540 तक पहुंच गई है।

    आठ प्रजातियों का घर

    इस केंद्र की सबसे बड़ी खासियत यह है कि नेपाल में पाई जाने वाली नौ प्रजातियों में से आठ प्रजाति के गिद्ध अकेले यहीं निवास करते हैं। इनमें से चार प्रजातियां स्थानीय हैं, जबकि बाकी चार प्रजातियां कड़ाके की ठंड के दिनों में हिमालयी क्षेत्रों से प्रवास कर यहां पहुंचती हैं।

    खबरें और भी

    ऊंचे पेड़ों पर बसेरा

    जटायु रेस्टोरेंट के कर्मचारी यम नेपाली ने बताया कि यहां गिद्धों के प्राकृतिक वास के लिए ऊंचे-ऊंचे सेमल और अन्य अनुकूल प्रजातियों के पेड़ लगाए गए हैं। केंद्र के भीतर ही घायल और बीमार पक्षियों के इलाज, उनके लिए स्वच्छ पानी और नियमित सुरक्षित आहार की पुख्ता व्यवस्था मौजूद है।

    सी ब्लॉक से दीदार

    संरक्षण प्रयासों की सफलता के बाद अब यह जगह एक प्रमुख ईको-टूरिज्म स्पॉट में तब्दील हो चुकी है। पर्यटकों और शोधकर्ताओं की सहूलियत के लिए यहां एक विशेष 'सी-ब्लॉक' (C-Shaped House) बनाया गया है, जिसके अंदर बैठकर लोग गिद्धों को बेहद करीब से भोजन करते देख पाते हैं।

    अध्ययन का मुख्य केंद्र

    जैविक विविधता, पक्षी विज्ञान (Ornithology) और वन्यजीव संरक्षण में रुचि रखने वाले देश-विदेश के विद्यार्थियों एवं वैज्ञानिकों के लिए यह क्षेत्र अब सबसे पसंदीदा अनुसंधान केंद्र बन गया है। सुरक्षित दूरी से फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी की सुविधा होने के कारण यहां हर साल पर्यटकों का फुटफॉल तेजी से बढ़ रहा है।