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    हाइपोथायरायडिज्म से प्रभावित लोगों के लिए अपने ब्लड शुगर लेवल को स्थिर रखना क्यों है मुश्किल?

    Updated: Tue, 28 Jul 2026 06:10 PM (IST)

    हाइपोथायरायडिज्म और टाइप 2 डायबिटीज दो सामान्य स्थितियां हैं जो आपस में जुड़ी हैं, जिससे ब्लड शुगर को नियंत्रित करना मुश्किल हो जाता है। थायरॉयड हार्म ...और पढ़ें

    हाइपोथायरायडिज्म और टाइप 2 डायबिटीज का गहरा संबंध (Picture Credit- AI Generated)

    हाइपोथायरायडिज्म और टाइप 2 डायबिटीज का गहरा संबंध (Picture Credit- AI Generated)

    ब्रांड डेस्क, नई दिल्ली। शरीर के अंग कैसे काम करते हैं, अगर इसे अच्छे से समझा जाए तो स्वास्थ्य को बेहतर किया जा सकता है, और सही डॉक्टर से सलाह लेकर बीमारी का इलाज हो सकता है। हाइपोथायरायडिज्म और टाइप 2 डायबिटीज (T2DM) दो कॉमन लॉन्ग-टर्म कंडीशन है, जो आपस में गहरे रूप से जुड़े हुए हैं और अक्सर एक साथ होते हैं। इसे एक तरह से एंडोक्राइन डिसऑर्डर के रूप में जाना जाता है। 

    यह संबंध इतना गहरा है कि एक की स्थिति में बदलाव से दूसरा प्रभावित होता है और मैनेज करना मुश्किल हो जाता है। इसका सीधा संबंध थाइरॉइड हार्मोन और इंसुलिन हार्मोन से है। यहां इन दोनों के बीच के संबंधों को समझना जरूरी है, ताकि इन्हें बेहतर तरीके से मैनेज किया जा सके।  

    सबसे पहले समझते हैं हाइपोथायरायडिज्म क्या है?

    हाइपोथायरायडिज्म एक स्थिति है, जिसमें थाइरॉयड ग्रंथि शरीर की जरूरत के हिसाब से पर्याप्त थाइरॉयड हार्मोन नहीं बनाता है। इसकी वजह से बॉडी का मेटाबॉलिज्म सुस्त पड़ जाता है। ज्यादा थकान, बढ़ता वजन, ठंड लगना आदि इसके लक्षण हैं। अगर मेटाबॉलिज्म धीमा होगा तो ब्लड शुगर को मैनेज करने में परेशानी होगी। इसके कारण शरीर में अतिरिक्त ग्लूकोज जमा हो सकता है और इंसुलिन रेजिस्टेंस की संभावना बढ़ सकती है, जिससे ब्लड शुगर तेजी से बढ़ेगा या तेजी से नीचे आएगा। यही वजह है कि हाइपोथायरायडिज्म से प्रभावित लोगों को अपने ब्लड शुगर लेवल को स्थिर रखना मुश्किल लगने लगता है।

    इंसुलिन रेजिस्टेंस: हाइपोथायरायडिज्म और ब्लड शुगर के बीच की कड़ी 

    दरअसल, हाइपोथायरायडिज्म और ब्लड शुगर दोनों स्थितियों के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी इंसुलिन रेजिस्टेंस है। हाइपोथायरायडिज्म की स्थिति में हो सकता है कि शरीर के सेल्स इंसुलिन हार्मोन के संबंध में प्रतिक्रिया न दे पाएं। यह हार्मोन ब्लड शुगर (ग्लूकोज) को बॉडी सेल्स में प्रवेश करने में मदद करता है। हाइपोथायरायडिज्म की स्थिति में इसका काम करना मुश्किल हो जाएगा। परिणामस्वरूप, ब्लड शुगर लेवल ज्यादा हो जाएगा और डायबिटीज को मैनेज करना कठिन हो जाएगा।

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    हाइपोथायरायडिज्म का सीधा संबंध मोटापे से भी है, क्योंकि थाइरॉयड की समस्या हार्मोन के लेवल को कम करता है, जिससे धीरे-धीरे वजन बढ़ता है, जो आखिरकार टाइप 2 डायबिटीज के खतरे को बढ़ाएगा। इसके अलावा, हाइपोथायरायडिज्म और ब्लड शुगर दोनों स्थितियां हार्ट डेल्थ से भी जुड़ी हुई हैं। हाइपोथायरायडिज्म कोलेस्ट्रॉल लेवल को ऊपर ले जाता है, वहीं डायबिटीज हृदयरोग के खतरे को बढ़ाता है। अगर इनको सही से मैनेज न किया जाए, तो कॉप्लिकेशन बढ़ सकते हैं।

    हाइपोथायरायडिज्म और ब्लड शुगर दोनों कंडीशन में क्या करें 

    हाइपोथायरायडिज्म के लक्षण डायबिटीज के लक्षण के समान है। यह एक ओवरलैप स्थिति है, जो कभी-कभी डायग्नोसिस में देरी कर सकती है या दोनों स्थितियों को अच्छे से मैनेज करने में कठिनाई हो सकती है। कुल मिलाकर यह कहें कि अगर हाइपोथायरायडिज्म का उपचार नहीं किया गया तो यह डायबिटीज उपचार के असर को प्रभावित कर सकता है।   

    टाइप 2 डायबिटीज वाले मरीजों को अक्सर सलाह दी जाती है कि वो नियमित रूप से अपने थाइरॉयड लेवल की जांच कराएं, खासकर उस समय जब थाइरॉयड समस्या के लक्षण सामने आए। मरीज को हाइपोथायरायडिज्म है या नहीं, इसके लिए TSH टेस्ट कराना चाहिए। यह एक सामान्य ब्लड टेस्ट है। टेस्ट के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से कंसल्ट करें। 

    बात करें हाइपोथायरायडिज्म के उपचार की तो इस संबंध में डॉक्टर उचित इलाज के बारे में सुझाव देगा। हाइपोथायरायडिज्म का उपचार करवाने से ब्लड शुगर को कंट्रोल करने में मदद मिलेगी, साथ ही इससे हेल्दी मेटाबॉलिज्म को रिस्टोर किया जा सकता है। इसके अलावा, अपनी लाइफस्टाइल की आदतों में बदलाव लाकर हाइपोथायरायडिज्म और टाइप 2 डायबिटीज दोनों स्थितियों को अच्छे से मैनेज किया जा सकता है। इसके लिए नियमित रूप से एक्सरसाइज करना चाहिए, संतुलित आहार लेना चाहिए और तनाव को प्रबंधित करना चाहिए। सबसे जरूरी चीज अपने वजन को कंट्रोल करें। 

    रोग कोई सा भी हो, सही जानकारी और डॉक्टर के कंसल्टेशन से बेहतर उपचार प्राप्त किया जा सकता है। हाइपोथायरायडिज्म और टाइप 2 डायबिटीज को मैनेज करने के लिए आप नियमित रूप से चेकअप कराएं और अपना पूरा ध्यान दें। इससे लॉन्ग टर्म कॉम्प्लिकेशन का रिस्क कम हो जाएगा।

    डिस्केल्मर: Abbott ने यह जानकारी लोगों के हित में जारी की है। यह आर्टिकल वैज्ञानिक संदर्भ पर आधारित है। इसमें दी गई कोई भी जानकारी चिकित्सीय सलाह नहीं है और किसी भी प्रकार की जिम्मेदारी नहीं ली जाती है। अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें। 

    Note:- यह आर्टिकल ब्रांड डेस्क द्वारा लिखा गया है।