Ashok Leyland के लिए बजाज ने लगाई सबसे बड़ी बोली, लेकिन छोटी बोली लगा कैसे जीता हिंदुजा? 40 साल पुरानी लड़ाई की पूरी कहानी
Ashok Leyland takeover history: अशोक लेलैंड के अधिग्रहण के लिए 1987 में बजाज और हिंदुजा ग्रुप (Hinduja Group vs Bajaj Group) के बीच हुई कारोबारी लड़ाई ...और पढ़ें

आज से 40 साल पहले शुरू हुई थी कहानी (फोटो AI जनरेटेड है)

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Ashok Leyland acquisition story: ऑटोमोबाइल कंपनी अशोक लेलैंड को लेकर बजाज और हिंदुजा ग्रुप (Bajaj Group vs Hinduja Group) के बीच हुई जबरदस्त कारोबारी लड़ाई की कहानी सिर्फ एक बोली की कहानी नहीं थी। इसमें पैसा था, विदेशी मुद्रा की दिक्कत थी, तकनीक का सवाल था और सबसे अहम था- कंपनी के मैनेजमेंट को लेकर अलग-अलग सोच। आखिर में ज्यादा रकम की पेशकश करने के बावजूद बजाज हार गया और हिंदुजा ग्रुप बाजी मार ले गया। अब आप भी सोच रहे होंगे कि आखिर ऐसा कैसे हो सकता है? गीता पिरामल ने अपनी किताब 'बिजनेस महाराजास' में इस कहानी को विस्तार से बताया। तो चलिए इस खबर में समझते हैं कारोबारी लड़ाई की पूरी कहानी।
आज से 40 साल पहले शुरू हुई थी कहानी
यह कहानी जून 1987 में तब शुरू हुई, जब ब्रिटेन के रोवर ग्रुप (Rover Group) ने अशोक लेलैंड में अपनी 39 फीसदी हिस्सेदारी बेचने का फैसला किया। उस समय अशोक लेलैंड मद्रास यानी आज के चेन्नई से जुड़ी कंपनी थी और भारत की दूसरी सबसे बड़ी ट्रक निर्माता कंपनी थी। सबसे बड़ी कंपनी टेल्को (Telco) यानी टाटा की थी।
रोवर ग्रुप की हिस्सेदारी बेचने की जिम्मेदारी मर्चेंट बैंकर्स हिल सेमुएल (Hill Samuel) को दी गई। इस हिस्सेदारी को खरीदने के लिए कई देशों से करीब 20 प्रस्ताव आए। इनमें भारत, जापान और हॉलैंड की कंपनियां भी शामिल थीं।
3 बोलियों में सबसे मजबूत दावेदार था बजाज, लेकिन...
सितंबर 1987 में लंदन में हुई शुरुआती बोली में तीन नाम सबसे आगे थे- बजाज ग्रुप, हिंदुजा ग्रुप और एमआर चाबड़िया। बजाज को शुरू में मजबूत दावेदार माना जा रहा था। बजाज के पास करीब 1.2 अरब रुपए की नकदी थी और वह पिछले तीन साल से अशोक लेलैंड को खरीदने की कोशिश कर रहा था। उसके पास कंपनी की करीब 2 फीसदी इक्विटी भी थी।
लेकिन बजाज के सामने एक बड़ी मुश्किल थी- विदेशी मुद्रा। उस समय बजाज के पास विदेशी मुद्रा नहीं थी और डील के लिए इसकी जरूरत थी। सरकार से विदेशी मुद्रा हासिल करना आसान नहीं था। राजीव गांधी सरकार ने बजाज और हिंदुजा को बड़े अंतरराष्ट्रीय मर्चेंट बैंकों के जरिए जरूरी विदेशी मुद्रा जुटाने को कहा।
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यहीं से कहानी में बड़ा मोड़ आया। बजाज की मदद के लिए दुनिया की सबसे बड़ी वेल्थ मैनेजमेंट कंपनी मेरिल लिंच (Merrill Lynch) आगे आई। उसने अंतरराष्ट्रीय निवेशकों का एक कंसोर्टियम तैयार किया। योजना यह थी कि रोवर ग्रुप को भुगतान मेरिल के जरिए किया जाएगा और बाद में कंसोर्टियम को राइट्स इश्यू के जरिए पैसा वापस किया जाएगा।
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बजाज के पास पैसे के अलावा और क्या थी चुनौती?
लेकिन बजाज के सामने सिर्फ पैसे की चुनौती नहीं थी। बजाज को लगा कि अगर वह अशोक लेलैंड (Ashok Layland) खरीदता है तो कंपनी में तकनीकी कमी को पूरा करना होगा। इसी वजह से उसने इटली की फिएट इवेको (Fiat Iveco) के साथ तकनीकी साझेदारी की कोशिश शुरू की।
बातचीत काफी आगे बढ़ी, लेकिन आखिरकार टूट गई। इवेको, अशोक लेलैंड में अपनी तकनीक लाना चाहता था, जबकि बजाज कंपनी के लिए अपने विकल्प खुले रखना चाहता था। यही मतभेद बड़ी रुकावट बन गया।
दूसरी तरफ हिंदुजा ग्रुप के पास ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री का अनुभव नहीं था। वह मुख्य रूप से ट्रेडिंग और फाइनेंशियल सर्विसेज से जुड़ा कारोबारी परिवार था। इसके बावजूद उसके पास पैसा और अंतरराष्ट्रीय संपर्कों की ताकत थी।
अक्टूबर 1987 में रोवर ग्रुप के बोर्ड की हिंदुजा ग्रुप के मेंबर्स से मुलाकात हुई। इसके बाद अगले दो दिनों में रोवर ने एमआर चाबड़िया और बजाज से भी बातचीत की। रोवर के सामने तीन बड़े सवाल थे- बोली कितनी है, अशोक लेलैंड को तकनीकी मदद कौन देगा और कंपनी के स्थानीय मैनेजमेंट को लेकर खरीदार की सोच क्या है।
यहीं हिंदुजा को फायदा मिलता दिखा
अशोक लेलैंड के मैनेजिंग डायरेक्टर आरजे शाहाने हिंदुजा के पक्ष में थे। वजह यह बताई गई कि अगर बजाज कंपनी लेता तो वह ज्यादा सक्रिय और हैंड्स-ऑन मैनेजर हो सकता था। जबकि हिंदुजाओं के ट्रेडिंग और फाइनेंशियल सर्विसेज के अनुभव के चलते कंपनी का रोजमर्रा का संचालन एक पेशेवर मैनेजर के हाथ में रहने की संभावना थी।
फिर आया बोली का निर्णायक दौर
बजाज ने अपनी बोली 27.45 मिलियन पाउंड (1987 में भारतीय करेंसी के हिसाब से 60.63 करोड़ रुपए) तक पहुंचा दी। हिंदुजा की बोली करीब 26 मिलियन पाउंड (भारतीय करेंसी में करीब 55.06 करोड़ रुपए) थी। यानी कागज पर बजाज 5.57 करोड़ रुपए आगे था। फिर भी रोवर ने हिंदुजा को चुना।
बजाज ने हिंदुजा नहीं बल्कि सरकार पर उठाए सवाल
बजाज के मुताबिक, उसकी हार की मुख्य वजह यह थी कि हिंदुजा के पास विदेशी मुद्रा को लेकर वह समस्या नहीं थी, जिसका सामना बजाज कर रहा था। बजाज ने साफ कहा कि,
वह हिंदुजाओं को दोष नहीं देता, क्योंकि उन्होंने कुछ गलत नहीं किया था। असली सवाल उस व्यवस्था का था, जिसमें भारतीय खरीदार को विदेशी कंपनी से मुकाबला करते समय विदेशी मुद्रा की पाबंदियों का सामना करना पड़ रहा था।"
बजाज ने बाद में यह भी आरोप लगाया कि,
सरकार ने भारतीय कारोबारियों को विदेशी कंपनियों के मुकाबले बराबर का मैदान नहीं दिया। उसका कहना था कि अगर किसी विदेशी कंपनी को भारत में कंपनी खरीदने की इजाजत है, तो भारतीय खरीदार को उसी डील में नुकसान की स्थिति में नहीं होना चाहिए।"
इस पूरे विवाद में हिंदुजाओं के ब्रिटेन में मजबूत संपर्कों की चर्चा भी सामने आई। एक मर्चेंट बैंकर के हवाले से बताया गया कि हिंदुजाओं के प्रधानमंत्री से लेकर नीचे तक प्रभावशाली संपर्क थे। ब्रिटेन की तत्कालीन प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर का नाम भी इसी संदर्भ में सामने आया।
ज्यादा बोली लगाने के बाद भी हार गया बजाज
हालांकि, स्रोत में हिंदुजाओं के प्रभाव को उनकी जीत का निर्णायक कारण साबित नहीं किया गया है। बल्कि साफ तौर पर यह भी कहा गया है कि बजाज की हार को सिर्फ इसी वजह से समझना सही नहीं होगा। आखिरकार रोवर ग्रुप ने हिंदुजा ग्रुप को चुना। बजाज ज्यादा बोली लगाने के बावजूद हार गया।
अगर हम आज की बात करें तो बजाज देश की तीसरी सबसे बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनी है। उसका मार्केट कैप 3,21,847 करोड़ रुपए है। जबकि अशोक लेलैंड टॉप-10 में भी नहीं है और इसका मार्केट कैप 1,03,527 करोड़ रुपए है।
कारोबारी जगत की इस चर्चित कहानी का सबसे बड़ा सबक यही है कि बड़ी बोली हमेशा डील नहीं जिताती। विदेशी मुद्रा, तकनीकी साझेदारी, मैनेजमेंट की पसंद, कारोबारी नेटवर्क और कंपनी के भविष्य को लेकर खरीदार की रणनीति ये सब मिलकर फैसला बदल सकते हैं।