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    संजय गांधी का सपना, दिल्ली में टिन शेड से शुरुआत, 10 साल का संघर्ष; फिर मारुति कैसे बनी देश की सबसे बड़ी कार कंपनी?

    Updated: Mon, 13 Jul 2026 12:39 PM (IST)

    मारुति 800 की कहानी संजय गांधी के सपने से शुरू होकर भारत की पहली ड्रीम कार बनने तक के सफर को बयां करती है। इसमें राजनीतिक उथल-पुथल, विदेशी सहयोग और भा ...और पढ़ें

    HighLights

    1. संजय गांधी ने देखा था मारुति बनाने का सपना।

    2. इंदिरा गांधी ने सुजुकी के साथ मिलकर किया साकार।

    3. मारुति 800 बनी भारत की पहली ड्रीम कार।

    नई दिल्ली। अगर मैं आपसे कहूं कि आज आपकी ड्रीम कार कौन सी है? तो हो सकता है कि आप BMW, Ferrari या Mercedes का नाम लें। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत की पहली ड्रीम कार कौन सी थी? अगर इतिहास में थोड़ा पीछे जाएं तो भारत की ड्रीम कार कोई विदेशी मॉडल नहीं, बल्कि एक स्वदेशी कार थी और उस कार का नाम है मारुति 800।

    जब भी मारुति 800 की बात आती है, तो याद आता है गांधी परिवार, जहां से इस कार की कहानी शुरू हुई। गांधी परिवार के नौजवान ने मारुति पर काम शुरू किया। लेकिन फिर ऐसा क्या हुआ कि खुद इंदिरा गांधी ने मारुति 800 बनाने के लिए विदेशी कंपनियों को बुलाया? आखिर ऐसा क्या हुआ कि संजय गांधी ने खुद की खड़ी की गई फैक्ट्री में कभी दोबारा न आने की कसम खाई? और आखिर ऐसा क्या हुआ कि जिस मारुति की कीमत ₹6000 रखी गई थी, उसे ₹50 हजार से भी ज्यादा में बेचना पड़ा? आइए पूरा किस्सा आपको विस्तार के बताते हैं। 

    भारत में क्या था कारों का इतिहास?

    आज से करीब साठ साल पहले का भारत बिल्कुल अलग था। उस समय कार खरीदना किसी आम परिवार के लिए एक सपना ही था। देश में सिर्फ़ तीन कंपनियाँ कार बनाती थीं, एंबेसडर, फिएट और स्टैंडर्ड हेराल्ड। ऑप्शन्स इतने कम थे कि कार बुक करने के बाद डिलीवरी मिलने में दो से पाँच साल तक का समय लग जाता था। इसी दौर में एक युवा था, जिसका सपना था, भारत में ऐसी छोटी कार बनाना, जिसे देश का एक आम मध्यम वर्गीय परिवार भी खरीद सके।

    किसने देखा मारुति बनाने का सपना?

    मारुति का सपना देखने वाले युवा थे इंदिरा गांधी के छोटे बेटे, संजय गांधी। संजय को ये शौक अपने पिता फिरोज गांधी से मिला और वो कारों के पीछे इतने पागल थे उन्होंने जानी मानी कंपनी रोल्स रॉयस में करीब 3 साल तक कार बनाने की ट्रेनिंग भी ली। वापस आकर संजय ने दिल्ली की गुलाबी बाग इलाके में अपनी वर्क शॉप शुरू की।

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    मशहूर पत्रकार विनोद मेहता अपनी किताब 'The Sanjay Story' में लिखते हैं कि संजय इस प्रोजेक्ट में इस कदर डूबे थे कि वे रोज़ सुबह आठ बजे घर से निकलते और देर रात तक धूल, कूड़े के ढेर और खुले नालों के बीच बैठकर खुद इंजन के पुर्जे जोड़ते। एक बार तो वर्कशॉप में धमाका भी हुआ, जिसमें वो झुलस गए, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

    कैसे हुई मारुति की आधिकारिक शुरुआत?

    1971 में सरकार से लाइसेंस मिलने के बाद, 4 जून को 'मारुति लिमिटेड' की आधिकारिक शुरुआत हुई। हरियाणा सरकार ने गुड़गांव में लगभग 297 एकड़ जमीन दी, जिससे आज के ऑटोमोबाइल हब की बुनियाद पड़ी। 1972 तक कार का पहला प्रोटोटाइप तैयार हो गया, लेकिन तभी देश की राजनीति बदल गई। 1975 में इमरजेंसी लग गई और संजय गांधी पूरी तरह राजनीति में व्यस्त हो गए।

    1977 में जनता पार्टी की सरकार आते ही मारुति प्रोजेक्ट पर जांच बैठ गई। उधर फैक्ट्री में मजदूरों का आंदोलन शुरू हो गया। आर. सी. भार्गव लिखते हैं कि एक दिन कर्मचारियों ने करीब 12 घंटे तक संजय गांधी का घेराव किया और उनसे वादा लिया कि वे दोबारा कभी फैक्ट्री नहीं आएँगे। संजय गांधी ने वह वादा किया और अपनी मौत तक उसे निभाया भी। आखिरकार 6 मार्च 1978 को मारुति लिमिटेड को बंद कर दिया गया।

    संजय गांधी की मौत से सब बदल गया!

    1980 में इंदिरा गांधी दोबारा सत्ता में आईं। वे अपने दिवंगत बेटे संजय गांधी का यह अधूरा सपना हर हाल में पूरा करना चाहती थीं। 23 जून 1980 को एक विमान हादसे में संजय गांधी की अचानक मौत हो गई, जिसने सबको झकझोर दिया। लेकिन एक माँ ने हिम्मत नहीं हारी। इंदिरा गांधी ने अरुण नेहरू की सलाह पर विदेशी तकनीक की मदद लेने का फैसला किया।

    सरकार ने मारुति का राष्ट्रीयकरण करके 24 फ़रवरी 1981 को 'मारुति उद्योग लिमिटेड' का गठन किया। इसकी कमान वी. कृष्णमूर्ति को सौंपी गई। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी दुनिया की किसी बड़ी कंपनी को भारत लाने के लिए राजी करना। रेनो, फॉक्सवैगन, फिएट और टोयोटा जैसी बड़ी कंपनियों ने यह कहकर मना कर दिया कि भारत में छोटी कारों का कोई भविष्य नहीं है।

    मारुति को फिर कैसे मिली नई उड़ान?

    तमाम जगह हाथ-पैर मारने के बाद मारुति की टीम जापान की 'सुजुकी' कंपनी से मिली। सुजुकी के प्रमुख ओसामु सुजुकी की सादगी और तेजी से फैसले लेने के अंदाज ने मारुति की टीम का दिल जीत लिया। सुजुकी ने बड़ा जोखिम लेते हुए 14 अप्रैल 1982 को भारत सरकार के साथ हाथ मिला लिया।

    कार को भारत में लॉन्च करने से पहले जापानी ड्राइवरों ने उसे कोलकाता से दिल्ली और शिमला की टूटी-फूटी सड़कों पर दौड़ाया। भारतीय सड़कों के मिजाज को देखकर कार का ग्राउंड क्लियरेंस बढ़ाया गया, हॉर्न तेज किए गए और शॉक एब्जॉर्बर मजबूत किए गए। इसके साथ ही, वी. कृष्णमूर्ति ने कंपनी में "मारुति कल्चर" की शुरुआत की, जहां सरकारी बाबू वाला रवैया खत्म करके जापानी अनुशासन और प्रोफेशलिज्म लाया गया।

    तीस महीनों बाद मारुति को मिली रफ्तार!

    कई महीनों की कड़ी मेहतन के बाद आखिरकार मारुति बनकर तैयार हुई। गुड़गांव की फैक्ट्री से गेंदे के फूलों से सजी भारत की पहली सफेद मारुति 800 बाहर निकली। इस पहली कार के मालिक बने इंडियन एयरलाइंस के कर्मचारी हरपाल सिंह। खुद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भावुक होकर उन्हें कार की चाबी सौंपी। भाषण के दौरान अपने बेटे संजय के संघर्षों को याद कर इंदिरा गांधी का गला भर आया, वहां मौजूद लोगों ने एक पीएम को नहीं बल्कि बेटे का सपना पूरा होते देख रही एक माँ को देखा।

    इस कार की ऑन-रोड कीमत करीब 52,500 रुपये रखी गई थी। देखते ही देखते इसकी बुकिंग के लिए लंबी कतारें लग गईं। लोग इस कार को जल्दी पाने के लिए दोगुना पैसा देने को तैयार थे। मारुति 800 ने हिंदुस्तान मोटर्स और फिएट के सालों पुराने साम्राज्य को हिलाकर रख दिया।

    आगे चलकर फ़ील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ, डॉ. मनमोहन सिंह और सचिन तेंदुलकर जैसी बड़ी हस्तियाँ भी इस कार की मालिक बनीं। मारुति 800 ने भारतीय मिडिल क्लास को यह भरोसा दिया कि कार सिर्फ़ अमीरों की जागीर नहीं है। आज जब भी सड़क पर कोई पुरानी मारुति 800 गुजरती है, तो वो सिर्फ एक कार नहीं, बल्कि उस दौर की याद दिलाती है जब इस स्वदेशी सपने ने पूरे भारत को चार पहियों पर रफ्तार दी थी।

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