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कभी जिगरी दोस्त थे बजाज और फिरोदिया, फिर सालों की दोस्ती कैसे दुश्मनी में बदल गई? पुणे के सबसे बड़े कॉरपोरेट वॉर की कहानी

Updated: Mon, 17 Aug 2026 12:20 PM (GMT+05:30)

Rahul Bajaj vs Naval Firodia: भारत को दो बड़ी मोटर कंपनियां देने वाले दो परिवार कभी पक्के दोस्त हुआ करते थे। लेकिन एक समय ऐसा आया, जब उनके रिश्तों में ...और पढ़ें

बजाज ऑटो और टेंपो की वो लड़ाई, जिसने दुश्मनी में बदल दी दो घरानों की दोस्ती।

बजाज ऑटो और टेंपो की वो लड़ाई, जिसने दुश्मनी में बदल दी दो घरानों की दोस्ती।

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नई दिल्ली| महाराष्ट्र में पुणे के आकुर्डी में एक घास का मैदान है। उसके बीचों-बीच खड़ी है- एक दीवार। वो दीवार कोई आम दीवार नहीं, बल्कि भारत के दो सबसे बड़े कॉरपोरेट घरानों के बीच दशकों पुरानी कड़वाहट का सबसे बड़ा सबूत है। एक वक्त था, जब दोनों परिवारों के सदस्य बेधड़क इस मैदान को पार करके एक-दूसरे से मिलने या सलाह लेने जाया करते थे। लेकिन आज, अगर यह दीवार न भी हो, तो कोई भी गलती से उस तरफ जाने की नहीं सोचता।

अब सवाल यह है कि आखिर कौन हैं वो दोनों परिवार और ये सब शुरू कैसे हुआ? कैसे 20 साल पुरानी एक मजबूत पार्टनरशिप देश की सबसे चर्चित कॉरपोरेट वॉर में बदल गई? आइए, इसकी पूरी इनसाइड स्टोरी जानते हैं।

500 रुपए की नौकरी से हुई थी शुरुआत

ये कहानी है बजाज फैमिली और फोर्स मोटर्स वाले फिरोदिया परिवार (Bajaj vs Firodia) की, जिसकी जड़ें बहुत पुरानी हैं। शुरुआत करते हैं नवल के. फिरोदिया (Naval K Firodia) से, जिनका जन्म साल 1910 में हुआ था, जो मूल रूप से अहमदनगर के एक वकील थे। फिरोदिया गांधीवादी विचारधारा वाले व्यक्ति थे। साल 1942 के 'भारत छोड़ो आंदोलन' के दौरान उन्होंने पुणे स्थित यरवदा सेंट्रल जेल में भी समय बिताया था। 1920 के दशक में कांग्रेस पार्टी के जरिए उनकी मुलाकात बजाज परिवार यानी जमनालाल बजाज (Jamnalal Bajaj) से हुई थी।

आजादी के बाद, फिरोदिया बजाज ग्रुप से जुड़ गए। एक समय ऐसा भी था, जब फिरोदिया बछराज ट्रेडिंग (Bachraj Trading) में 500 रुपए महीने की सैलरी पर काम करते थे। बाद में जब ग्रुप ने भारत में ऑटो-रिक्शा और स्कूटर बनाने के लिए विदेशी कंपनियों से हाथ मिलाया, तो फिरोदिया ने इसमें अहम भूमिका निभाई। अगस्त 1957 में बजाज टेंपो (Bajaj Tempo) की शुरुआत हुई।

शुरुआती दिनों में, दोनों कंपनियों का काम अलग-अलग जगह से होता था। अगस्त 1957 में बजाज टेंपो को जर्मन तकनीक के इस्तेमाल से थ्री-व्हीलर बनाने के लिए प्रमोट किया गया। दूसरी ओर, बजाज ऑटो का पहला भारतीय वेस्पा मुंबई के बाहरी इलाके गोरेगांव की एक गैराज जैसी जगह से चला। बाद में बजाज ऑटो की मैन्युफैक्चरिंग यूनिट कुर्ला में खोली गई।

आगे चलकर दोनों कंपनियों के प्लांट आकुर्डी में बनाए गए। दोनों के बीच एक घास का मैदान था। बाद में इसी जगह पर दीवार खड़ी हो गई, जो दोनों परिवारों के बीच बढ़ती दूरी का प्रतीक बन गई।

राहुल बजाज की एंट्री से शुरू हुआ विवाद

लड़ाई की असली शुरुआत तब हुई, जब राहुल बजाज ने कंपनी में एंट्री ली। राहुल की पहली जॉब डिप्टी जनरल मैनेजर की थी। उनके जिम्मे प्रोडक्शन छोड़कर बाकी सब कुछ था। जैसे- परचेजिंग, मार्केटिंग, सेल्स, फाइनेंस से लेकर ऑडिट तक। दिलचस्प बात यह है कि उस समय उनके बॉस नवल के. फिरोदिया ही थे, जो बजाज ऑटो के चीफ एग्जीक्यूटिव और बजाज टेंपो के मैनेजिंग डायरेक्टर थे।

माना जाता है कि 1967 के आसपास फिरोदिया परिवार ने शेयर बाजार से चुपचाप बजाज ऑटो के शेयर (Bajaj Auto Share) खरीदने शुरू कर दिए ताकि कंपनी में उनकी पकड़ मजबूत हो सके। जब युवा राहुल बजाज (Rahul Bajaj) को इसकी भनक लगी, तो उन्हें यह बात बिल्कुल रास नहीं आई। चूंकि कमर्शियल कामकाज राहुल ही देखते थे, इसलिए जब शेयर ट्रांसफर के लिए उनके पास आए, तो उन्होंने साफ इनकार कर दिया। यहीं से इस ऐतिहासिक झगड़े की नींव पड़ी।

सितंबर 1968: जब रास्ते अलग हो गए

सितंबर 1968 आते-आते यह दोस्ती पूरी तरह टूट गई। राहुल बजाज ने बजाज टेंपो से इस्तीफा दे दिया और एनके फिरोदिया ने बजाज ऑटो से। दोनों कंपनियों का बंटवारा हो गया। फिरोदिया के हाथ बजाज टेंपो (Bajaj Tempo History) आई, जो अब फोर्स मोटर्स (Force Motors History) के नाम से जानी जाती है और बजाज परिवार के पास बजाज ऑटो (Bajaj Auto History) रह गई। उस समय दोनों ही कंपनियों की सालाना बिक्री लगभग 70 मिलियन (भारतीय करेंसी में करीब 7 करोड़) रुपए थी।

हालांकि, इस बंटवारे से कोई भी खुश नहीं था। फिरोदिया परिवार का मानना था कि बजाज ऑटो को उन्होंने खड़ा किया है और उसका भविष्य ज्यादा उज्ज्वल है, जबकि बजाज टेंपो की संभावनाएं उन्हें सीमित लग रही थीं।

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शेयर बाजार और बोर्डरूम की वो "खूनी जंग"

बंटवारे के बाद, बजाज ऑटो पर कब्जे की लड़ाई शेयर बाजार से लेकर बोर्डरूम तक लड़ी गई। शुरुआत में, बजाज ऑटो के कुल 1,04,250 शेयरों में से फिरोदिया के पास 13% हिस्सेदारी थी। लेकिन फरवरी 1968 के अंत तक उन्होंने इसे बढ़ाकर 23% कर लिया। वहीं, बजाज परिवार ने अपनी 28% हिस्सेदारी को आक्रामक तरीके से बढ़ाकर 51% कर लिया।

इस लड़ाई का सबसे चर्चित किस्सा 4% शेयरों की नीलामी का है। ये शेयर LIC और UTI जैसी वित्तीय संस्थाओं के पास थे। उस समय शेयर का मार्केट प्राइस 260 रुपए था। फिरोदिया ने 262.50 रुपए प्रति शेयर की बोली लगाई। लेकिन दूसरी तरफ, राहुल बजाज ने बेहद आक्रामक रुख अपनाते हुए सीधे 411 रुपए की बोली लगा दी। यह देखकर फिरोदिया यह कहते हुए नीलामी से बाहर हो गए कि, "उनके पास फेंकने के लिए पैसे नहीं हैं।"

मामला सुप्रीम कोर्ट तक भी गया, जब फिरोदिया ने राहुल बजाज से शेयर ट्रांसफर करवाने के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उनकी मांग ठुकरा दी।

सार्वजनिक बयानबाजी: "कौवे के कोसने से बैल नहीं मरता"

1980 के दशक तक आते-आते यह कॉरपोरेट युद्ध मीडिया की सुर्खियों में आ गया। 1988 में संडे ऑब्जर्वर को दिए एक इंटरव्यू में राहुल बजाज ने गुस्से में कहा था-

मुझे पूरा विश्वास है कि एक दिन बजाज टेंपो अविभाजित बजाज ग्रुप का हिस्सा बनेगा।"

इसके जवाब में फिरोदिया ने एक मशहूर महाराष्ट्रीयन कहावत का इस्तेमाल करते हुए करारा पलटवार किया-

कौवे के कोसने से बैल नहीं मरता।"

1990 का दशक: शतरंज की नई बिसात

दशकों तक दोनों परिवार एक-दूसरे की कंपनियों में भारी हिस्सेदारी लेकर बैठे रहे, जिससे तनाव हमेशा बना रहा। बजाज ऑटो में फिरोदिया की 23% हिस्सेदारी थी, जिसके कारण राहुल बजाज बिना उनकी मर्जी के कोई स्पेशल रेजोल्यूशन पास नहीं करवा सकते थे।

90 के दशक की शुरुआत में, अपने एक्सपेंशन प्लान को फंड करने के लिए फिरोदिया को बजाज ऑटो के कुछ शेयर बेचने पड़े, जिससे उनकी हिस्सेदारी घटकर 13% रह गई। इससे बजाज को तो राहत मिली, लेकिन बजाज टेंपो में फिरोदिया की स्थिति कमजोर हो गई। अधिकारों के नए इश्यू (Rights Issues) के कारण टेंपो में फिरोदिया की हिस्सेदारी गिर गई।

1991-92 में जब बजाज टेंपो के टेकओवर का खतरा मंडराया, तो कैश से भरपूर राहुल बजाज ने इस मौके का फायदा उठाते हुए बाजार से 3% शेयर और खरीद लिए। इस तरह जर्मन कंपनी डैमलर बेंज, फिरोदिया और बजाज, तीनों के पास बजाज टेंपो के 26-26% शेयर हो गए। बाकी 22% शेयर पब्लिक के पास थे।

क्या जिंदा रहते बजाज टेंपो खरीदना चाहते थे राहुल बजाज?

साल 1993 की बात है। बजाज टेंपो ने डैमलर बेंज को मना लिया कि वे अपने अधिकार फिरोदिया के पक्ष में छोड़ दें। इसके बाद साल 1995 तक, फिरोदिया के पास 36%, बजाज के पास 26% और डैमलर बेंज के पास 16% हिस्सेदारी हो गई।

1995 में बजाज टेंपो की कुल बिक्री 5.65 बिलियन (भारतीय करेंसी में 565 करोड़) रुपए थी। इस दौरान राहुल बजाज मानने लगे थे कि अब बजाज टेंपो को टेकओवर करना संभव नहीं है। तो फिर वे 26% शेयर क्यों पकड़े बैठे हैं? इस पर राहुल बजाज तंज कसते हुए कहते हैं,

"यह एक अच्छा इन्वेस्टमेंट है। फिरोदिया कंपनी बहुत अच्छी चलाते हैं। जब भी मैं अपने शेयर बेचूंगा, अच्छा मुनाफा कमाऊंगा।"

लेकिन यही हिस्सेदारी फिरोदिया परिवार के लिए चिंता का कारण बनी रही। 26% हिस्सेदारी के कारण राहुल बजाज के पास विशेष प्रस्तावों को रोकने की ताकत थी। यही वजह थी कि दोनों परिवारों के बीच चली आ रही कारोबारी 'कोल्ड वॉर' लंबे समय तक खत्म नहीं हुई और आज भी कॉरपोरेट इतिहास के सबसे दिलचस्प और लंबे चलने वाले झगड़ों में गिना जाता है।

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