ये कंपनी बनाएगी दो नदियों को जोड़ने वाली सुरंग, ऊबड़-खाबड़ जमीन चीरकर पानी से करेगी कारनामा! खर्च होंगे ₹2300 करोड़
भारत सरकार 1 अगस्त तक चिनाब और ब्यास नदियों को जोड़ने वाली महत्वाकांक्षी टनल परियोजना शुरू करने जा रही है। यह 8.7 किमी लंबी सुरंग 2,300 करोड़ रुपये की ...और पढ़ें

NHPC टनल से दो नदियों को जोड़ेगी

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
नई दिल्ली। भारत में कई बेहद खास टनल यानी सुरंग हैं, जिनका अलग-अलग वजहों से अपना महत्व है। इसी कड़ी में अब एक और टनल बनने जा रही है। ये टनल दो नदियों को जोड़ेगी। दरअसल सरकार इस साल 1 अगस्त तक अपनी सबसे महत्वाकांक्षी नदी-जोड़ो परियोजनाओं में से एक पर काम शुरू करने की योजना बना रही है। कौन बनाएगा ये टनल और कितने में होगी तैयार, आइए जानते हैं।
कितने में बनकर तैयार होगी?
जिस टनल की हम बात कर रहे हैं, वो 2,300 करोड़ रुपये की लागत से तैयार होगी और इसकी लंबाई कुल 8.7 किमी होगी। इस परियोजना के पूरा होने की तारीख 31 जुलाई, 2029 तय की है। इस परियोजना के तहत चिनाब नदी के अतिरिक्त पानी को ब्यास नदी बेसिन की ओर मोड़ा जाएगा।
कौन बनाएगा ये सुरंग?
इस टनल को NHPC तैयार करेगी। ये लिंक-3 प्रोजेक्ट है, जो हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति जिले की लाहौल घाटी में चिनाब नदी पर तैयार होगा। इसमें, चिनाब नदी पर 19 मीटर ऊँचा बैराज, इनटेक और लगभग 8.7 किलोमीटर लंबी पानी ले जाने वाली सुरंग बनाने की योजना है।
प्रोजेक्ट के दूसरे चरण में पनबिजली बनाने की संभावना पर भी विचार किया गया है।
कैसी होगी प्रोजेक्ट की संरचना?
प्रोजेक्ट में प्रस्तावित बैराज क्षेत्र के आस-पास का इलाका ऊबड़-खाबड़ है और नदी इस क्षेत्र में एक चौड़ी U-आकार की घाटी से होकर बहती है। NHPC के दस्तावेज में चिनाब-ब्यास लिंक टनल प्रोजेक्ट के बारे में बताया गया है कि इस इलाके की बनावट तेज ढलान वाली चोटियों और चौड़ी घाटियों से बनी है। यहां की जमीन 3095 मीटर से लेकर लगभग 6517 मीटर तक अलग-अलग ऊँचाई वाली है।
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पाकिस्तान में होगा जल संकट
8.7 किलोमीटर लंबी यह सुरंग चेनाब बेसिन से अतिरिक्त पानी को ब्यास नदी प्रणाली में मोड़ देगी, जिससे अनुमान है कि पाकिस्तान में जल संकट पैदा हो सकता है। बता दें कि चेनाब एक पश्चिमी नदी है, जिस पर सिंधु जल संधि के तहत भारत के अधिकार सीमित रहे हैं। मगर पहलगाम हमले के बाद से ही भारत ने इस संधि को रद्द कर दिया था और इसी का पानी रोकने की तैयारी है।
बिजली उत्पादन भी बढ़ेगा
इस प्रोजेक्ट से उत्तरी भारत में हाइड्रोइलेक्ट्रिक बिजली उत्पादन की क्षमता भी बढ़ने की उम्मीद है। माना जा रहा है कि इस प्रस्ताव के दूसरे चरण में, पानी के मोड़े गए बहाव से जुड़ा बिजली उत्पादन का इंफ्रास्ट्रक्चर शामिल हो सकता है।
गौरतलब है कि हिमालयी नदियों को भारत की सबसे बड़ी रिन्यूएबल एनर्जी एसेट्स में से एक माना जाता है, खासकर ऐसे समय में जब देश थर्मल पावर पर अपनी निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहा है।