सर्च करे
Home
फोकस

Trending

    विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

    छोटे से गांव में पले-बढ़े, कम उम्र में संभाली परिवार की जिम्मेदारी; फिर इस जज्बे से बनाई 'सबसे बड़ी अगरबत्ती कंपनी'

    Updated: Mon, 10 Aug 2026 07:42 AM (GMT+05:30)

    एन. रंगा राव ने 1948 में मैसूर में साइकिल प्योर अगरबत्ती की शुरुआत की, जो अब ₹1,700 करोड़ से अधिक के सालाना रेवेन्यू वाला एक वैश्विक साम्राज्य बन गया ...और पढ़ें

    किसने शुरू की थी साइकिल प्योर कंपनी?

    किसने शुरू की थी साइकिल प्योर कंपनी?

    HighLights

    1. एन. रंगा राव ने 1948 में मैसूर में कंपनी की शुरुआत की

    2. साइकिल प्योर अगरबत्ती का सालाना राजस्व ₹1,700 करोड़ से अधिक है

    3. यह दुनिया की पहली जीरो कार्बन अगरबत्ती निर्माता कंपनी है

    नई दिल्ली। भारत अगरबत्ती बनाने के मामले में दुनिया में काफी आगे है। भारत के मुख्य प्रोडक्शन हब कर्नाटक (बेंगलुरु और मैसूर), गुजरात और मध्य प्रदेश में हैं। बड़े पैमाने पर उत्पादन करने वाली कई प्रमुख कंपनियां भारत में मौजूद हैं। पर जिस कंपनी का नाम इस लिस्ट में टॉप पर आता है, वो साइकिल प्योर अगरबत्ती (Cycle Pure Agarbatti)।
    साइकिल प्योर की गिनती भारत की सबसे पुरानी अगरबत्ती कंपनियों में भी होती है। पर क्या आप जानते हैं कि इस कंपनी की शुरुआत किसने की थी? आइए जानते हैं।

    78 साल पहले हुई थी शुरुआत

    1948 में मैसूर में एन. रंगा राव ने साइकिल प्योर अगरबत्ती की शुरुआत की थी। 1948 में राव ने एक छोटे से स्थानीय कारोबार से शुरुआत की थी, जो अब बढ़कर ₹1,700 करोड़ से अधिक के सालाना रेवेन्यू वाले ग्लोबल साम्राज्य में बदल गया है।
    जमीनी स्तर पर स्मार्ट मार्केटिंग, इन-हाउस खुशबू इनोवेशन और पर्यावरण के अनुकूल पैकेजिंग का इस्तेमाल करके, यह दुनिया के सबसे बड़े अगरबत्ती ब्रांड में से एक बन गया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इसकी मार्केट हिस्सेदारी 15 फीसदी से अधिक है।

    खुद का बिजनेस शुरू करना चाहते थे

    राव मदुरै के पास वथिराईरुप्पु नाम के एक छोटे से गाँव में पले-बढ़े। कम उम्र से ही उन्हें अपने परिवार की जिम्मेदारी उठानी पड़ी। 1935 में शादी होने के बाद अरवनागाड की कॉर्डाइट फैक्टरी में उन्होंने बुककीपर के तौर पर काम शुरू किया। फिर आया 1947, जब भारत आजाद हुआ। भारत की आजादी से प्रेरित होकर, वे अपना खुद का कुछ शुरू करना चाहते थे।
    उन्होंने 1947 में ही मैसूर प्रोडक्ट्स एंड जनरल ट्रेडिंग शुरू की और घर से काम शुरू किया, जो फैक्ट्री की भी भूमिका निभाता था।

    ऐसे हुआ 'ब्रांड साइकिल' का जन्म

    असंगठित क्षेत्र में राव ने भविष्य को ध्यान में रखते हुए अपने बिजनेस को एक "ब्रांड" के तौर पर स्थापित करने का सोचा, जो अपने समय से काफी आगे की सोच थी। इस तरह 'ब्रांड साइकिल' का जन्म हुआ। फिर उन्होंने डिजाइन कॉपीराइट भी हासिल कर लिए। इसके बाद राव के बेटे आर गुरू अपने पिता का साथ देने के लिए बिजनेस में शामिल हुए, जिससे दूसरी पीढ़ी की एंट्री उनके कारोबार में हुई।

    खबरें और भी

    1960-69 तक क्या-क्या किया?

    1960-69 के दौरान 'साइकिल रत्न' (Cycle Ratna) लॉन्च किया गया। फिर यह 'वैल्यू-फॉर-मनी' सेगमेंट में अपनी तरह का पहला प्रोडक्ट था। जब बाजार में एक पैक की कीमत 25 पैसे थी, तब 'साइकिल सुगंध मल्लिका' (Cycle Sugandha Mallika) को एक प्रीमियम पैक के तौर पर लॉन्च किया गया, जिसकी कीमत 10 स्टिक्स के लिए एक रुपया थी।
    यह प्रोडक्ट सफल रहा, जिससे साबित हुआ कि ग्राहक अच्छी क्वालिटी के लिए अधिक पैसे देने को तैयार हैं। दक्षिण भारत में बड़े पैमाने पर वैन ऑपरेशन शुरू किए। यह अगरबत्ती इंडस्ट्री में एक अहम पड़ाव और फाउंडर की मार्केटिंग सोच का सबूत था।

    दुनिया की पहली जीरो कार्बन / न्यूट्रल निर्माता कंपनी

    इसके बाद कंपनी ने कई और ब्रांड पेश किए और पिछले दशक में ये दुनिया की पहली जीरो कार्बन / न्यूट्रल निर्माता कंपनी भी बनी। अपने-अपने अलग ब्रांड्स और सेवाओं के चलते आज ये NR GROUP बन गया है, जिसके प्रोडक्ट्स में ऑयल, फ्रेग्रेंस भी शामिल हैं।

    ये भी पढ़ें - जब दुनिया सहमी थी, तब इस शख्स ने लिया बड़ा रिस्क! 50 की उम्र में 2.5 लाख की नौकरी छोड़ ऐसे खड़ा किया करोड़ों का कारोबार