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    मुगल काल में एक कागज से होते थे लेन-देन, इंटरनेट नहीं, सिर्फ भरोसे पर चलता था 'कैशलेस' कारोबार; कुछ ऐसा था सिस्टम

    Updated: Mon, 10 Aug 2026 12:15 PM (GMT+05:30)

    यूपीआई पर संभावित चार्ज की चर्चा के बीच, यह लेख भारत की प्राचीन भुगतान प्रणाली 'हुंडी' पर प्रकाश डालता है। सूरत में 300 साल पहले प्रचलित यह वित्तीय सा ...और पढ़ें

    सूरत की हुंडी हुआ करती थी लेन-देन का माध्यम (AI फोटो)

    सूरत की हुंडी हुआ करती थी लेन-देन का माध्यम (AI फोटो)

    HighLights

    1. हुंडी: 300 साल पहले सूरत में प्रचलित वित्तीय साख पत्र

    2. यह प्राचीन प्रणाली आधुनिक यूपीआई और क्रेडिट कार्ड जैसी थी

    3. सुरक्षित लेनदेन, कर्ज चुकाने में व्यापारियों द्वारा उपयोग की जाती थी

    नई दिल्ली। आजकल इस बात की चर्चा बहुत चल रही है कि क्या यूजर्स को भी यूपीआई ट्रांजेक्शन पर चार्ज देना होगा। हालांकि फिलहाल सरकार और आरबीआई ने इससे इनकार किया है। माना जा रहा है कि अगर कभी ऐसा भविष्य में हुआ तो यूपीआई ट्रांजेक्शन में कमी आ सकती है और लोग चार्ज से बचने के लिए फिर से कैश में लेन-देन बढ़ा सकते हैं।
    मगर कभी आपने सोचा है कि आज यूपीआई है और पहले से ही बैंक, क्रेडिट कार्ड और कैश उपलब्ध हैं। मगर इन सबसे पहले कैसे ट्रांजेक्शन होती थी? कैश से पहले तरीका था वस्तु विनिमय प्रणाली का। मगर कैश यानी सिक्के आने के बाद भी लेन-देन का एक ऐसा तरीका चलन में था, जिसे आज के हिसाब से यूपीआई कहा जा सकता है। क्या था वो तरीका, आइए जानते हैं।

    छोटे भुगतानों के लिए था वस्तु विनिमय सिस्टम

    आपने भी पढ़ा या सुना होगा कि पहले समय में लेन-देन के लिए सामान के बदले सामान लिया-दिया जाता था। मगर ये बड़ी चीजों के लिए उतना आसान नहीं था। इसलिए भारत में एक जगह एक खास सिस्टम चलता था। ये थी सूरत की 'हुंडी'।

    क्या थी हुंडी?

    अब से करीब 300 साल पहले सूरत में 'हुंडी' चलती थी, जो कहा जा सकता है कि तब क्रेडिट कार्ड और यूपीआई का काम करती थी। हुंडी कोई करेंसी या चीज नहीं थी, बल्कि एक वित्तीय साख पत्र हुआ करता था जिसे बिल ऑफ एक्सचेंज कहा जा सकता है।

    राज्य की गारंटी होती थी अहम

    18वीं सदी में हुंडी सूरत में राज्य की जमानत पर अदा की जाती थी। यानी अगर किसी लेन-देन वाले कागज पर राज्य की जमानत लिखी हो तो वो सेफ है। इसी का इस्तेमाल लेन-देन, कर्ज लेने और यहां तक कि रुपये-पैसे के लेन-देन तक के लिए किया जाता था।
    राज्य की गारंटी ही थी, जिसके कारण हुंडी कहे जाने वाले दस्तावेज को स्वीकार कर लिया जाता था। तब लेने वाले को पता होता था कि उसका पैसा सेफ रहेगा और डूबेगा नहीं।

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    ऐसे होती थी लेन-देन

    मुगल काल और 18वीं सदी में, सूरत के व्यापारी सुरक्षित कागजी क्रेडिट इंस्ट्रूमेंट के तौर पर 'हुंडी' सिस्टम का इस्तेमाल करते थे। तब व्यापारी सूरत में चांदी या कीमती सामान जमा करते थे और दूर-दराज के व्यापारिक केंद्रों (जैसे बंगाल) में सुरक्षित रूप से पैसे निकालने के लिए एक साधारण कागजी ड्राफ्ट साथ ले जाते थे, जिससे रास्ते में लूटपाट का खतरा नहीं रहता था।

    लोग इसी हुंडी का इस्तेमाल कर्ज चुकाने के लिए भी करते थे। अगर किसी को लोन के बदले कैश नहीं देना, मगर उसके पास हुंडी है तो वे हुंडी की मदद से लोन अदा कर सकता है।

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