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    चीन-पाकिस्तान की दोस्ती का तोड़ है 'चाबहार पोर्ट', ऐसे ही नहीं छोड़ सकता भारत; भारत की अमेरिकी प्रतिबंधों पर दो टूक

    Updated: Sun, 18 Jan 2026 11:47 AM (IST)

    भारत चाबहार बंदरगाह (Chabahar Port) पर अपनी प्रतिबद्धता बनाए रखेगा, जो अमेरिकी प्रतिबंधों में छूट समाप्त होने के बावजूद रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। ...और पढ़ें

    भारत के लिए बहुत अहम है चाबहार पोर्ट

    भारत के लिए बहुत अहम है चाबहार पोर्ट

    HighLights

    1. चाबहार बंदरगाह भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण

    2. यह अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक सीधा पहुंच है देता

    3. भारत अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद संचालन जारी रखेगा

    नई दिल्ली। भारत ने शुक्रवार को संकेत दिया कि वह ईरान के चाबहार बंदरगाह से पीछे नहीं हटेगा। भारत ने इस प्रोजेक्ट के रणनीतिक, आर्थिक और भू-राजनीतिक महत्व पर जोर दिया। दरअसल चाबहार पोर्ट के ऑपरेशंस को कवर करने वाली अमेरिकी प्रतिबंधों में छूट 26 अप्रैल को खत्म होने वाली है। इसी बीच ये मामला चर्चा में है। विदेश मंत्रालय (MEA) ने कहा कि भारत चाबहार पोर्ट पर ऑपरेशंस जारी रखने के लिए अमेरिका के साथ बातचीत कर रहा है। MEA के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल के मुताबिक 28 अक्टूबर, 2025 को अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने 26 अप्रैल, 2026 तक वैध सशर्त प्रतिबंधों में छूट दिशानिर्देश जारी किए थे।

    व्यापार के लिए अहम

    भारत के चाबहार पोर्ट पर अपने ऑपरेशंस जारी रखने के पीछे वहां का भूगोल है। ईरान के दक्षिण-पूर्वी तट पर स्थित चाबहार भारत का एकमात्र पश्चिमी समुद्री गलियारा है, जो पाकिस्तान को बाईपास करते हुए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक सीधा एक्सेस प्रोवाइड करता है, जिसके जमीनी रास्ते भारतीय व्यापार के लिए काफी हद तक बंद हैं।
    दशकों से, पाकिस्तान के प्रमुख क्रॉसिंग पर नियंत्रण के कारण भारत को अफगानिस्तान में सामान भेजने में बाधाओं का सामना करना पड़ रहा था। चाबहार उस बाधा को दूर करता है, जो एक समुद्री रास्ता प्रोवाइड करता है, जो क्षेत्रीय चोकपॉइंट और राजनीतिक बाधाओं से भी बचाता है।

    रूस और यूरोप से जोड़ने वाला नेटवर्क

    चाबहार इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) के लिए भी सेंट्रल है, जो समुद्र, सड़क और रेल लिंक के कॉम्बिनेशन के जरिए भारत को ईरान, रूस और यूरोप से जोड़ने वाला एक मल्टी-मोडल नेटवर्क है। यह कॉरिडोर स्वेज नहर के रास्ते पारंपरिक रूट की तुलना में ट्रांजिट टाइम और लॉजिस्टिक्स लागत को कम करता है, जिससे यूरेशियन बाजारों के साथ भारत का इंटीग्रेशन मजबूत होने की उम्मीद है।
    व्यापार के अलावा, इस बंदरगाह का एनर्जी के लिहाज से भी काफी महत्व है। यह ईरान और सेंट्रल एशिया से आयात के लिए एक जरिया बन सकता है, जिससे भारत को सप्लाई रूट में विविधता लाने और लंबे या राजनीतिक रूप से संवेदनशील शिपिंग लेन पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी।

    CPEC का तोड़ है चाबहार

    चाबहार पोर्ट को चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर के तहत पाकिस्तान में चीन समर्थित ग्वादर बंदरगाह के मुकाबले एक बैलेंस बनाने वाला कदम माना जाता है। चाबहार में अपनी मौजूदगी बनाए रखने से भारत क्षेत्रीय समुद्री कनेक्टिविटी में अपना प्रभाव बनाए रख सकता है।
    इस बंदरगाह की उपयोगिता सिर्फ रणनीतिक नहीं है। लैंडलॉक क्षेत्रों के लिए एक गेटवे खोलकर, चाबहार भारत के एक्सपोर्ट एक्सेस को बढ़ाता है और इसका इस्तेमाल पहले ही मानवीय सहायता के लिए एक लॉजिस्टिक्स हब के रूप में किया जा चुका है, जिसमें अफगानिस्तान को गेहूं की खेप भेजना भी शामिल है।

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    क्षेत्रीय कनेक्टिविटी रणनीति के लिए बहुत जरूरी

    साल 2024 में, भारत ने इंडियन पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड के जरिए चाबहार में एक टर्मिनल चलाने के लिए 10 साल का समझौता किया और लगभग $120 मिलियन के निवेश की प्रतिबद्धता जताई थी।
    भारत ने सबसे पहले साल 2003 में अफगानिस्तान और मध्य एशिया के लिए एक वैकल्पिक रास्ता सुरक्षित करने के लिए चाबहार को डेवलप करने का प्रस्ताव दिया था। ईरान पर प्रतिबंधों के कारण बार-बार रुकावटों के बावजूद, भारत का कहना है कि यह बंदरगाह उसकी क्षेत्रीय कनेक्टिविटी रणनीति के लिए बहुत जरूरी है।

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