'मदर ऑफ ऑल डील' से क्यों डरी मारुति, महिंद्रा और हुंडई मोटर जैसी कंपनियां, शेयरों में गिरावट, इस बात से भयभीत
भारत-यूरोपीय यूनियन के बीच 'मदर ऑफ ऑल डील' से भारतीय ऑटो सेक्टर चिंतित है। यूरोपीय कारों पर टैरिफ कटौती की आशंका से मारुति सुजुकी, महिंद्रा एंड महिंद् ...और पढ़ें

मारुति और महिंद्रा एंड महिंद्रा के शेयर 3 फीसदी से ज्यादा गिरे।

समय कम है?
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नई दिल्ली। भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच 'मदर ऑफ ऑल डील' (Mother of All Deals) को लेकर उद्योग जगत खुश है, लेकिन देश की नामी ऑटोमोबाइल कंपनियों को बड़ा झटका लगा है और मारुति सुजुकी, महिंद्रा एंड महिंद्रा और हुंदई मोटर्स इंडिया (Hyundai Motor Shares) के शेयर 5 फीसदी तक गिर गए। दरअसल, इन ऑटो मोबाइल कंपनियों के शेयरों में यह तेज गिरावट इसलिए आई है क्योंकि भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच होने वाले व्यापार समझौते के तहत यूरोप से आने वाली कारों पर टैरिफ में कटौती होने जा रही है।
ऐसे में विदेशों से आने वाली महंगी कारों की कीमतें कम हो जाएंगी है और यह स्वदेशी कार निर्माता कंपनियों के लिए यह एक बड़ा झटका हो सकता है।
महिंद्रा से मारुति के शेयर धड़ाम
देश की दिग्गज कार निर्माता कंपनी महिंद्रा एंड महिंद्रा (M&M Share Price) के शेयरों में 5.1% तक की गिरावट आई और वे अगस्त 2025 के बाद के अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए।
मारुति सुजुकी के शेयर भी इंट्रा डे में 3 फीसदी तक गिरकर 15013 रुपये के स्तर पर आ गए। इसके अलावा, हुंदई के स्टॉक भी 3 प्रतिशत की गिरावट के साथ 2193 रुपये पर ट्रेड कर रहे हैं। इन तीनों दिग्गज शेयरों में गिरावट के चलते निफ्टी ऑटो इंडेक्स 2 फीसदी से ज्यादा टूट गया है।
110 से 40% होगी इंपोर्ट ड्यूटी
न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के सूत्रों के अनुसार, भारत-यूरोपीय संघ से आयातित कारों पर टैरिफ को 110% से घटाकर 40% करने की योजना बना रहा है, क्योंकि दोनों पक्ष मुक्त व्यापार समझौते के करीब पहुंच रहे हैं, जिस पर मंगलवार, 27 जनवरी तक हस्ताक्षर हो सकते हैं।
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सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि सरकार ने 15,000 यूरो (17,739 डॉलर) से अधिक आयात मूल्य वाली सीमित संख्या में कारों पर कर को तुरंत कम करने पर सहमति जताई है। इंपोर्ट ड्यूटी में कमी से फॉक्सवैगन, रेनॉल्ट और स्टेलेंटिस जैसी यूरोपीय ऑटोमोबाइल कंपनियों के साथ-साथ मर्सिडीज-बेंज जैसे लग्जरी ब्रांड्स की कारों की कीमत कम हो जाएंगी।
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देशी कार निर्माता क्यों कर रहे हैं विरोध?
भारतीय निर्माता लंबे समय से इस तरह की कटौती का विरोध करते रहे हैं, उनका तर्क है कि इससे आयातित वाहनों की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी और स्थानीय उत्पादन में निवेश हतोत्साहित होगा। बता दें कि भारत के 44 लाख यूनिट प्रति वर्ष के कार बाजार में यूरोपीय कार निर्माताओं की हिस्सेदारी वर्तमान में 4% से भी कम है।