क्या है आरबीआई का 'ECL' मॉडल, जिससे सरकारी बैंकों में मचा हाहाकार! समझें 'खराब लोन' कैसे बढ़ाएंगे मुश्किल?
आरबीआई ने 'एक्सपेक्टेड क्रेडिट लॉस (ECL)' मॉडल लागू किया है, जिससे बैंकों को संभावित खराब लोन के लिए पहले से ही फंड अलग रखना होगा। इस नए नियम से सरकार ...और पढ़ें

HighLights
आरबीआई ने ECL मॉडल लागू किया, 1 अप्रैल 2027 से प्रभावी।
बैंकों को संभावित खराब लोन के लिए पहले से फंड रखना होगा।
नए नियमों से सरकारी बैंकों के शेयरों में भारी गिरावट आई।
नई दिल्ली| रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने भारत के बैंकिंग सिस्टम को और ज्यादा सिक्योर व पारदर्शी बनाने के लिए एक सख्त कदम उठाया है, लेकिन यह सरकारी बैंकों के लिए मुसीबत बनता नजर आ रहा है। दरअसल, RBI ने एसेट क्लासिफिकेशन और लोन प्रॉविजनिंग से जुड़े 14 नए और सख्त नियम लागू कर दिए हैं। इन नियमों का संबंध, बैंकों के बेड लोन से है, और इनका सीधा असर इस बात पर पड़ेगा कि बैंक अपने खराब लोन (Bad Loans) की पहचान कैसे करते हैं और उनके लिए प्रोविजनिंग का इंतजाम कैसे करते हैं। इस कवायद के लिए आरबीआई ने बैंकों से 'Expected Credit Loss (ECL)' मॉडल अपनाने को कहा है।
इसके बाद खासतौर पर सरकारी बैंक शेयरों में जोरदार गिरावट देखने को मिली है। निफ्टी पीएसयू बैंक इंडेक्स पौने 2 फीसदी तक गिर गया है। केनरा बैंक, एसबीआई, पंजाब नेशनल बैंक, यूनियन बैंक और एसबीआई समेत अन्य शेयर 3 फीसदी तक गिर गए हैं। आइये आपको बताते हैं आखिर क्या है आरबीआई का ECL मॉडल और इससे क्यों बढ़ी बैंकों की चिंता?
क्या है 'ECL' मॉडल?
ECL मॉडल से पहले बैंक 'Incurred Loss' मॉडल पर काम करते थे। इसके तहत जब बैंकों को नुकसान हो जाता था, तब उसके लिए पैसे अलग रखे जाते थे, लेकिन अब RBI 'Expected Credit Loss (ECL)' मॉडल लेकर आया है। इसके तहत अब बैंकों को इस बात का ध्यान रखना होगा कि अगर किसी लोन में डूबने का थोड़ा भी जोखिम दिख रहा है, तो बैंक को पहले से ही उसके लिए फंड सिक्योर करेगा। यह पूरी तरह से 'फॉरवर्ड लुकिंग' अप्रोच है, जिसमें भविष्य की संभावनाओं को ध्यान में रखना होगा। नई प्रणाली अगले वर्ष 1 अप्रैल से लागू की जाएगी।
वहीं, RBI ने साफ किया है कि NPA (नॉन-परफॉर्मिंग एसेट) की परिभाषा पहले जैसी ही रहेगी। अगर किसी लोन की किश्त 90 दिनों तक नहीं चुकाई जाती है, तो उसे डिफॉल्ट या NPA ही माना जाएगा। आरबीआई ने कहा, "एनपीए का वर्गीकरण एक वस्तुनिष्ठ और सुस्थापित ढांचा है जिसे बैंकों और उधारकर्ताओं सहित सभी हितधारकों द्वारा व्यापक रूप से समझा और मान्यता प्राप्त है। यह कई वैधानिक और नियामक ढांचों में भी समाहित है।"
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RBI के फैसले पर ब्रोकरेज ने क्या कहा?
ग्लोबल ब्रोकरेज फर्म मैक्वेरी के अनुसार, भारतीय रिज़र्व बैंक के अंतिम एसेट क्लासिफिकेशन और प्रोविजनिंग रूल, जो 1 अप्रैल, 2027 से प्रभावी होंगे। इससे सरकारी बैंकों के लिए प्रावधान आवश्यकताओं में वृद्धि होने की उम्मीद है।
मैक्वेरी की रिपोर्ट: इस ब्रोकरेज फर्म के अनुसार, नए नियम से सरकारी बैंकों की कुल नेट वर्थ (Net Worth) पर एकमुश्त 5% से 10% तक का असर पड़ सकता है। साथ ही बैंकों की क्रेडिट कॉस्ट भी 20 से 25 बेसिस पॉइंट तक बढ़ सकती है। खास तौर पर जिन बैंकों का असुरक्षित लोन (Unsecured loans) या माइक्रोफाइनेंस में ज्यादा पैसा लगा है, उन पर इसका ज्यादा बुरा असर होगा।
मूडीज की रिपोर्ट: मूडीज का मानना है कि इसका असर उतना विनाशकारी नहीं होगा। चूंकि इसे 4 साल के चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाएगा, इसलिए बैंक अपने डिविडेंड (लाभांश) को कम करके इस पूंजीगत गिरावट को आसानी से संभाल लेंगे।
कुल मिलाकर, RBI के नए नियमों के कारण बैंकों को संभावित नुकसान से बचने के लिए अपने पास ज़्यादा पैसा रिज़र्व रखना होगा, जिससे उनकी तुरंत की प्रॉफिटेबिलिटी (मुनाफ़े) और नेट वर्थ पर असर पड़ने की आशंका है। इसी डर से बैंकिंग शेयरों में यह बिकवाली देखने को मिली है।