याद है 'शिप' की माचिस, जिसने घर-घर पहुंचाया उजाला! 103 साल पहले इस विदेशी ने किया था कमाल; अब बहुत कम है दिखती
WIMCO ने 1923 में स्वीडिश मैच AB द्वारा भारत में 'शिप' माचिस ब्रांड की शुरुआत की थी, जिसका उद्देश्य स्थानीय ...और पढ़ें

किसने बनाई थी शिप माचिस?
HighLights
WIMCO ने 1923 में 'शिप' माचिस ब्रांड शुरू किया
स्वीडिश मैच AB ने भारत में इसकी स्थापना की
2004 में ITC ने WIMCO का अधिग्रहण किया
नई दिल्ली। अब तो घर-घर में लाइट की सुविधा खूब हो गई है। साथ ही गैस की भी सुविधा है, जिसके लिए लाइटर का यूज होता है। मगर जिन लोगों ने स्टोव, दीया, मोमबत्ती और चूल्हे वाला दौर देखा है, वे माचिस की अहमियत बखूबी जानते होंगे और जो लोग माचिस की अहमियत समझते हैं, वे शिप की माचिस (Ship Matchbox) के बारे में भी जानते होंगे।
शिप ब्रांड की माचिस आज भी बाजार में बिकती है। खरीदने वाले खरीदते हैं, पर क्या आप जानते हैं कि इसकी शुरुआत किसने की थी? किसने इस माचिस को बनाना शुरू किया और आज कौन इसका मालिक है? आइए बताते हैं।
किस कंपनी ने की थी शुरुआत?
मशहूर 'शिप' माचिस, सेफ्टी माचिस का एक जाना-माना घरेलू ब्रांड है, जिसे मूल रूप से भारत में WIMCO लिमिटेड (वेस्टर्न इंडिया मैच कंपनी) ने लॉन्च किया था। वेस्टर्न इंडिया मैच कंपनी, जिसे आमतौर पर WIMCO के नाम से जाना जाता है, की स्थापना 1923 में बॉम्बे (मुंबई) के पास अंबरनाथ में स्वीडिश मैच AB वेंचर की एक सहायक कंपनी के तौर पर की गई थी।
क्यों शुरू की गयी थी WIMCO?
औपनिवेशिक भारत में स्थानीय स्तर पर सेफ्टी माचिस बनाने के लिए 1923 में WIMCO की स्थापना की गई थी। उस समय स्वीडन और जापान से होने वाले माचिस के आयात पर निर्भरता कम करने के लिए WIMCO की शुरुआत की गयी, ताकि भारत में माचिस का उत्पादन हो।
WIMCO के पीछे किसका दिमाग?
WIMCO की स्थापना 1923 में स्वीडिश मैच कंपनी ने की थी, जिसके प्रमुख स्वीडन के जाने-माने उद्योगपति इवर क्रूगर थे। 1908 में, उन्होंने कंस्ट्रक्शन कंपनी 'क्रूगर एंड टोल बायग्नाड्स AB' की सह-स्थापना की थी, जो नई बिल्डिंग तकनीकों में माहिर थी।
एग्रेसिव निवेश अप्रोच और नए तरह के फाइनेंशियल इंस्टिट्यूशंस के जरिए, उन्होंने माचिस और फाइनेंस का एक ग्लोबल साम्राज्य खड़ा किया।
पूरे भारत में एक बड़ा नेटवर्क बनाया
अंबरनाथ में शुरुआत के बाद WIMCO ने पूरे भारत में फैक्ट्रियों का एक बड़ा नेटवर्क बनाया। जिन शहरों में फैक्ट्रियां लगाई गईं, उनमें बरेली (उत्तर प्रदेश), आलमबाजार/कलकत्ता (पश्चिम बंगाल) और मद्रास (चेन्नई) शामिल थे। साथ ही, कर्मचारियों के लिए विमको नगर जैसी बस्तियाँ भी बसाईं।
2004 में ITC ने खरीदा
1990 के दशक के आखिर और 2000 के दशक की शुरुआत तक, WIMCO भारी वित्तीय नुकसान में डूबी हुई थी। 2004-05 में, कंज्यूमर गुड्स की बड़ी कंपनी ITC लिमिटेड ने इस क्षेत्र में कदम रखा और अपनी सब्सिडियरी, रसेल क्रेडिट के जरिए लगभग ₹200 करोड़ में WIMCO की 74% कंट्रोलिंग हिस्सेदारी खरीदी, जिसे बाद में बढ़ाकर 96% से अधिक कर लिया।
घाटे के कारण कीं फैक्ट्री बंद
माचिस कारोबार के घटने के कारण आईटीसी ने भी अपनी विमको की फैक्ट्री बंद कर दीं। ITC ने विमको की कई माचिस फैक्ट्रियां बंद कर दीं, क्योंकि अधिक टैक्स और कच्चे माल की बढ़ती लागत की वजह से उनका कामकाज आर्थिक रूप से फायदे का सौदा नहीं रह गया था।
अब विमको के तहत शिप माचिस का कारोबार छोटे पैमाने पर होता है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार आज, भारत में कई क्षेत्रीय निर्माता और स्वतंत्र उत्पादक भी मशहूर शिप ब्रांड नाम के तहत सेफ्टी माचिस की पैकेजिंग और सप्लाई करते हैं।
