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    IIT से पढ़कर बनाया ₹10000 Cr का साम्राज्य, पर Flipkart-Amazon ने कर दिया 'कंगाल'; कौड़ियों के भाव बिकी कंपनी

    Updated: Thu, 09 Apr 2026 03:45 PM (GMT+05:30)

    शॉपक्लूज, जिसकी स्थापना IIT-BHU के संजय सेठी ने की थी। यह कंपनी 2016 तक 10,000 करोड़ रुपये का मूल्यांकन हासिल कर चुकी थी। यह कंपनी टियर-2 और टियर-3 शह ...और पढ़ें

    IIT-BHU से पढ़कर खड़ा किया ₹10 हजार करोड़ का साम्राज्य, फिर Flipkart-Amazon की आंधी के बीच कौड़ियों के भाव बिकी कंपनी

    IIT-BHU से पढ़कर खड़ा किया ₹10 हजार करोड़ का साम्राज्य, फिर Flipkart-Amazon की आंधी के बीच कौड़ियों के भाव बिकी कंपनी

    HighLights

    1. शॉपक्लूज 2016 में 10,000 करोड़ रुपये के मूल्यांकन पर पहुंचा था।

    2. अमेजन, फ्लिपकार्ट की प्रतिस्पर्धा और खराब गुणवत्ता ने कंपनी डुबोई।

    3. संस्थापकों के विवाद, वित्तीय दबाव से शॉपक्लूज का पतन हुआ।

    आईएएनएस, नई दिल्ली। कभी देश की प्रमुख ई-कॉमर्स कंपनियों में शुमार शॉपक्लूज का नाम अब उन कुछ चुनिंदा स्टार्टअप्स में शामिल है। लेकिन अब इसकी वैल्यूएशन अर्श से फर्श पर आ गई है। शॉपक्लूज को खड़ा करने वाले इसके फाउंडर संजय सेठी ने IIT BHU से पढ़ाई की थी।

    संजय सेठी ने पढ़ाई के बाद कई सालों तक अलग-अलग कंपनियों में काम भी किया। 15 साल से ज्यादा साल की नौकरी करने के बाद उन्होंने 2011 ShopClues की नींव रखी। और देखते ही देखते इसे भारत का सबसे बड़ा उभरता हुआ ऑनलाइन मार्केट प्लेस बना दिया था।

    फाउंडर्स की लिस्ट में सिर्फ एक नाम नहीं था। ShopClues की स्थापना जुलाई 2011 में, USA की सिलिकॉन वैली में संदीप अग्रवाल, राधिका अग्रवाल (अब राधिका घई) और संजय सेठी द्वारा की गई थी। इस कंपनी को एक मैनेज्ड मार्केटप्लेस बनाने के उद्देश्य से स्थापित किया गया था, जिसका मुख्य फोकस भारत के टियर 2 और टियर 3 शहरों पर था।

    10 हजार करोड़ की कंपनी कौड़ियो के भाव बिकी

    गुरुग्राम मुख्यालय वाली कंपनी शॉपक्लूज की 2016 में वैल्यूएशन करीब 1.1 अरब डॉलर (लगभग 10 हजार करोड़ रुपये) के करीब थी, लेकिन कारोबारी चुनौतियों के चलते सिंगापुर की कंपनी क्यूओओ10 ने इसका 2019 में मात्र 70-100 मिलियन डॉलर में अधिग्रहण कर लिया, जो कि इसके पहले के वैल्यूएशन से 90 प्रतिशत कम था।

    खबरें और भी

    "ऑनलाइन चांदनी चौक" के रूप में स्थापित शॉपक्लूज ने टियर-II और टियर-III शहरों में कीमत के प्रति संवेदनशील उपभोक्ताओं को लक्षित करके शुरुआती सफलता हासिल की, जहां उसने ग्राहकों को बिना ब्रांड वाले और कम लागत के सामान उपलब्ध कराए गए।

    अमेजन और फ्लिपकार्ट ने शॉपक्लूज को डुबोया?

    इस रणनीति ने शॉपक्लूज को उस समय तेजी से विस्तार करने में मदद की, जब अमेजन और फ्लिपकार्ट जैसे बड़े प्रतिद्वंद्वी मुख्य रूप से महानगरों पर ध्यान केंद्रित कर रही थीं। हालांकि, शॉपक्लूज का यह मॉडल तब ध्वस्त हो गया है, जब दोनों दिग्गजों कंपनियों ने बेहतर लॉजिस्टिक्स, अधिक छूट और ग्राहकों के मजबूत विश्वास के साथ छोटे शहरों में आक्रामक रूप से विस्तार किया।

    जैसे-जैसे प्रतिस्पर्धा तेज होती गई, शॉपक्लूज अपना मार्केट शेयर खोने लगा। साथ ही, इसके असंगठित विक्रेताओं पर अत्यधिक निर्भरता के कारण जल्द ही गुणवत्ता नियंत्रण संबंधी समस्याएं उत्पन्न हो गईं।

    सामान की क्वालिटी ने प्लेटफॉर्म की छवि गिराई

    बाद में प्लेटफॉर्म की छवि नकली और निम्न-गुणवत्ता वाले उत्पादों की बन गई, जिसके कारण वापसी की दर बहुत अधिक (अनुमानित 30-40 प्रतिशत) हो गई और इससे उपभोक्ताओं का विश्वास कम हो गया। दूसरी तरफ प्रतिद्वंद्वी कंपनियों विश्वसनीयता और सेवा में भारी निवेश किया।

    कंपनी की मुश्किलें आंतरिक उथल-पुथल से और बढ़ गईं। सह-संस्थापक संदीप अग्रवाल ने अमेरिका में इनसाइडर ट्रेडिंग के आरोपों के बाद पद छोड़ दिया था, जिसके बाद राधिका अग्रवाल और संजय सेठी को कंपनी का नेतृत्व संभालना पड़ा।

    फाउंडर्स के बीच कलह

    संस्थापकों के बीच बाद में हुए सार्वजनिक विवाद ने भी निवेशकों के विश्वास को कम करने का काम किया। वित्तीय दबाव जल्द ही एक "पतन के चक्र" में तब्दील हो गया। संभावित आईपीओ से पहले मुनाफा दिखाने के प्रयास में, शॉपक्लूज ने मार्केटिंग खर्चों में भारी कटौती की, जिसके परिणामस्वरूप सकल व्यापार मूल्य में भारी गिरावट आई।

    नए निवेश जुटाने के कई प्रयास विफल रहे, यहां तक कि मौजूदा निवेशक भी अतिरिक्त पूंजी लगाने से हिचकिचा रहे थे। कंपनी ने रणनीतिक बदलावों पर भी विचार किया, जिसमें उद्यम-केंद्रित वर्टिकल का निर्माण और अपने पुनर्विक्रेता प्लेटफॉर्म का विस्तार करना शामिल था, लेकिन ये प्रयास गिरावट को रोकने के लिए अपर्याप्त थे। नियामक जांच, जिसमें प्रवर्तन निदेशालय द्वारा कुछ निधि प्रवाहों की जांच की खबरें भी शामिल थीं, ने अनिश्चितता को और बढ़ा दिया।

    इस बीच, 2015 में मुख्य कार्यकारी पद से इस्तीफा देने के बाद, संदीप ने बाद में ड्रूम की स्थापना की, जो सेकंड हैंड ऑटोमोबाइल खरीदने और बेचने के लिए एक ऑनलाइन बाजार है, जो पुणे, जयपुर और हरियाणा में जीएसटी जांच का सामना कर रहा है। हालांकि, कंपनी ने कहा कि "ड्रूम सभी लागू कानूनों और नियामक प्रकटीकरण आवश्यकताओं का पूरी तरह से पालन करेगा।

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