सोने की चाल कैसे होती है तय, निवेश में इसे कैसे करें समझदारी से शामिल
सोना, जो कभी सुरक्षित निवेश माना जाता था, उसकी कीमत आर्थिक अनिश्चितताओं और भू-राजनीतिक तनाव से प्रभावित होती है। हाल ही में केंद्रीय बैंकों की भारी खर ...और पढ़ें

सोने की चाल कैसे होती है तय, निवेश में इसे कैसे करें समझदारी से शामिल
HighLights
सोने की कीमत आर्थिक अनिश्चितताओं और भू-राजनीतिक तनाव से बढ़ती है।
केंद्रीय बैंकों की भारी खरीद ने सोने की कीमतों में उछाल लाया।
सोना हमेशा महंगाई से बचाव का विश्वसनीय साधन नहीं होता।
नई दिल्ली। पृथ्वी के जन्म से अरबों साल पहले, भयानक ब्रह्मांडीय विस्फोटों में बना सोना। पृथ्वी पर सबसे कीमती धातुओं में से एक है। न केवल भौतिक रूप से, बल्कि मौद्रिक दृष्टि से भी। 14 अप्रैल को सोना 4835 डॉलर प्रति औंस पर कारोबार कर रहा था, यानी चांदी के मुकाबले 60 गुना अधिक कीमत पर!
आज सोने की मांग मुख्य रूप से निवेश (~40%), आभूषण (~31%), केंद्रीय बैंकों द्वारा अपने विदेशी मुद्रा भंडार को सुरक्षित रखने के लिए की गई खरीद (~17%), और कुछ हद तक औद्योगिक उपयोग (~6%) के लिए होती है।
सोने में निवेश बढ़ा
दिलचस्प बात यह है कि 2000 के दशक की शुरुआत में लगभग 0% के स्तर से बढ़कर, अब एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ईटीएफ) के जरिए किया जाने वाला निवेश (सोने की ईंटों/सिक्कों में भौतिक निवेश के विपरीत) सोने में कुल निवेश प्रवाह का 40% है। इससे स्पष्ट है कि सोने में खुदरा और संस्थागत निवेशकों की भागीदारी बढ़ी है।
सोने का प्रदर्शन शानदार रहा है। पिछले तीन साल में इसकी कीमत 2.5 गुना बढ़ गई, और इसने हर प्रमुख वित्तीय परिसंपत्ति को पीछे छोड़ दिया है। फिर भी, अमेरिका-ईरान युद्ध के पहले महीने में इसकी कीमत 17% गिर गई थी, और अभी भी यह 8% नीचे है। इस उतार-चढ़ाव की वजह क्या है?
कैसे बढ़ती है सोने की कीमत
"सुरक्षित निवेश" माने जाने वाले सोने की कीमत आम तौर पर तब बढ़ती है, जब आर्थिक और भू-राजनीतिक अनिश्चितताएं बढ़ती हैं। अप्रैल 2025 में ट्रंप द्वारा लगाए गए टैरिफ के झटके के बाद, एक ही हफ्ते में इसकी कीमत 12% बढ़ गई थी। लेकिन अमेरिका-ईरान के बीच चल रहे मौजूदा संघर्ष के कारण भू-राजनीतिक तनाव के चरम पर होने के बावजूद, सोने में गिरावट आई। ऐसा क्यों? इसकी वजह है: ब्याज दरें।
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तेल और गैस की कीमत 50% से अधिक बढ़ गई है, जिससे महंगाई बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है और केंद्रीय बैंक ब्याज दरें बढ़ाने या उनमें कटौती में देरी करने पर मजबूर हो गए हैं। दुर्भाग्य से, ऊंची ब्याज दरों के कारण सोने जैसी ऐसी संपत्तियों को अपने पास रखने की लागत बढ़ जाती है, जिनसे कोई आय नहीं होती। इससे सोने की मांग और उसके मूल्यांकन को नुकसान पहुंचता है।
महंगाई और सोने का रिश्ता
जब सोना महंगाई से बचाव का जरिया माना जाता हो, तो महंगाई का जोखिम बढ़ने पर इस समय इसकी कीमत बढ़नी चाहिए या नहीं? लेकिन ऐतिहासिक तौर पर महंगाई और सोने के बीच का रिश्ता थोड़ा उलझा हुआ है। इसकी वजह यह है कि महंगाई बढ़ने पर आमतौर पर ब्याज दरें भी बढ़ जाती हैं। और ऊंची ब्याज दरों से सोने को नुकसान पहुंचता है। अक्सर इतना अधिक कि महंगाई के कारण सोने की मांग में होने वाली किसी भी बढ़ोतरी का असर पूरी तरह से खत्म हो जाता है। ठीक यही इस समय हो रहा है।
इसके अलावा, सोने के बारे में एक बड़ी गलतफहमी यह है कि यह महंगाई से बचाव का जरिया है। विश्लेषक अक्सर इस बात की ओर इशारा करते हैं कि सोने ने लंबे समय में अपनी क्रय शक्ति बनाए रखी है - जैसे तेल या कारों की तुलना में - लेकिन अच्छे रिटर्न देने वाली किसी भी अन्य परिसंपत्ति का प्रदर्शन भी ऐसा ही रहा है, जिसमें इक्विटी भी शामिल है।
यह महंगाई से बचाव नहीं है बल्कि इतनी सी बात है कि रिटर्न महंगाई से अधिक है। महंगाई से बचाव करने वाली असली संपत्ति वह होती है जिसकी कीमत महंगाई के दौर में बढ़ती है, और साथ ही उस समय आपकी परिसंपत्ति की कीमत को सुरक्षित रखती है जब उसकी सबसे अधिक ज़रूरत होती है। दुर्भाग्य से, पिछले दो दशकों के आंकड़ों में सोने और महंगाई के बीच का संबंध लगभग शून्य रहा है, जिससे पता चलता है कि सोने और महंगाई के बीच ऐसा कोई व्यवस्थित संबंध नहीं है।
सोने की मांग और मूल्यांकन में बदलाव
हालांकि, एक बड़ा ढांचागत बदलाव हो रहा है, जिससे सोने की मांग और उसके मूल्यांकन में बदलाव आ रहा है। जब 2022 में अमेरिका ने रूस की 300 अरब डॉलर की परिसंपत्ति को फ्रीज़ कर दिया, तो इससे 'डी-डॉलराइज़ेशन' (डॉलर पर निर्भरता कम करने) का जो चलन पहले से चल रहा था, उसे और तेजी मिली।
इसकी वजह से पोलैंड, चीन, तुर्की, भारत, कजाकिस्तान, चेक गणराज्य और ब्राजील जैसे कई देशों के केंद्रीय बैंकों ने अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड से हटकर सोने में निवेश करना शुरू कर दिया। केंद्रीय बैंकों ने 2022, 2023 और 2024 में हर साल 1,000 टन से ज्यादा सोना खरीदा - जो ऐतिहासिक औसत के मुकाबले लगभग दोगुना था - और 2025 में 865 टन और खरीदा, जिससे वैश्विक विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी बढ़कर लगभग 20% हो गई। सोने की मांग में यह लगातार और सरकारी स्तर पर हुई बढ़ोतरी ही शायद वह सबसे बड़ा कारण है जिसकी वजह से पिछले तीन साल में सोने की कीमतों में 2.5 गुना उछाल आया है।
1990 से अब तक सोने का सालाना रिटर्न
निवेशकों को परिसंपत्ति वर्ग के तौर पर सोने के बारे में कुछ बातें साफ तौर पर समझ लेनी चाहिए। पहली बात यह कि सोने से मिलने वाला रिटर्न ठीक-ठाक होता है, लेकिन बहुत असाधारण नहीं। 1990 से लेकर अब तक सोने में सालाना रिटर्न 7.1% रहा है जबकि अमेरिकी इक्विटी से 8.6% रिटर्न हासिल हुआ है।
यदि पिछले चार साल के आंकड़ों को हटा दें, तो सोने का सालाना रिटर्न घट कर 4.8% रह जाएगा। दूसरी बात, सोने को सुरक्षित निवेश (सेफ हेवन) मानने का मतलब यह नहीं है कि इसमें उतार-चढ़ाव कम होता है। - 17% के स्तर पर, सोने के रिटर्न में होने वाला उतार-चढ़ाव अमेरिकी और भारतीय इक्विटी बाज़ारों के बराबर ही है, जो डॉलर के 8% उतार-चढ़ाव से कहीं अधिक है। दरअसल सुरक्षित निवेश का मतलब यह है कि मंदी या संकट के दौर में सोना, इक्विटी की तुलना में अधिक मजबूती से टिका रहता है, खास तौर पर ऐसे समय में जब आर्थिक विकास की गति धीमी होने की संभावना हो, लेकिन महंगाई नियंत्रण में हो।
इक्विटी के साथ सोने का संबंध
तीसरी बात, इक्विटी के साथ सोने का संबंध (कोरिलेशन) लगभग शून्य होने के कारण, यह आपके निवेश पोर्टफोलियो में विविधता लाने का उल्लेखनीय जरिया बन जाता है। आखिर में, निवेशकों को सोने और चांदी को एक-दूसरे का विकल्प मानना बंद कर देना चाहिए। चूंकि चांदी की 60% मांग औद्योगिक होती है, इसलिए उसकी कीमतों को प्रभावित करने वाले कारक अब अलग होते जा रहे हैं। पिछले कुछ ही सालों में सोने और चांदी के बीच का संबंध (कोरिलेशन) 90% से गिरकर 65% पर आ गया है।
क्या सोना, डॉलर की जगह दुनिया के लिए सबसे सुरक्षित निवेश बनता जा रहा है? आंकड़े तो कुछ और ही कहते हैं। पिछले दो दशक में दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों के रिजर्व में डॉलर की हिस्सेदारी में गिरावट जरूर आई है, लेकिन यह अभी भी 58% पर बनी हुई है।
साथ ही, 'डी-डॉलराइजेशन' (डॉलर पर निर्भरता कम करने) की यह कहानी हर जगह एक जैसी नहीं है। 2025 में जापान, फ्रांस, जर्मनी, बेल्जियम, ब्रिटेन और इजरायल - इन सभी देशों ने अमेरिकी ट्रेज़री में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाई, जबकि निजी निवेशकों ने ट्रेजरी में 442 अरब डॉलर का निवेश किया। सबसे बड़ी बात यह है कि अमेरिका-ईरान संघर्ष के दौरान डॉलर में दुनिया भर की सभी प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले तेजी आई, जिससे 'सुरक्षित निवेश' के तौर पर उसकी भूमिका और भी पुख्ता हो गई।
लेखक- डॉ. अपूर्वा जावड़ेकर (मुख्य अर्थशास्त्री, मुथूट फिनकॉर्प लिमिटेड)