चीनी-प्याज के बाद महंगा हुआ गेहूं, ₹150 तक बढ़े भाव! खुदरा बाजारों में कैसी रहेगी कीमत और सप्लाई?
भारत सरकार ने 4 साल बाद गेहूं निर्यात पर से प्रतिबंध हटा लिया है, जिसके बाद घरेलू कृषि मंडियों में ...और पढ़ें
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मंडियों में गेहूं की कीमत ₹150 प्रति क्विंटल तक बढ़े
HighLights
गेहूं निर्यात प्रतिबंध हटने से घरेलू कीमतें बढ़ीं।
अल नीनो के कारण भविष्य की फसल पर चिंता।
सरकारी भंडार पर्याप्त, पर वैश्विक कीमतें ऊंची।
बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली | भारत सरकार द्वारा 24 अगस्त को गेहूं और उससे बने उत्पादों जैसे आटा, मैदा और सूजी के एक्सपोर्ट पर लगभग 4 साल से लगी रोक हटा दिया है। इसके बाद घरेलू बाजार में गेहूं की कीमतों में तेजी देखने को मिली है। कृषि मंडियों में गेहूं के दाम ₹150 प्रति क्विंटल से अधिक बढ़ चुके हैं, जिससे उद्योग के एक वर्ग में चिंता बढ़ गई है।
ग्लोबल मार्केट में गेहूं की कीमतें लगभग तीन साल के हाई लेवल पर पहुंच चुकी हैं। ऐसे में कुछ कारोबारी संगठनों का मानना है कि यदि आगामी रबी सीजन में अल नीनो का असर फसल पर पड़ता है, तो घरेलू सप्लाई पर दबाव बढ़ सकता है। अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने अल नीनो की स्थिति मार्च 2027 तक बने रहने का अनुमान जताया है।
खुदरा बाजारों में भी दिखेगी तेजी?
मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो निर्यात से बैन हटाने के बाद कृषि मंडियों में कीमतें तेजी से बढ़ी हैं, हालांकि इसका असर अभी खुदरा बाजार में पूरी तरह नहीं दिखा है। उपभोक्ता मामलों के विभाग के मूल्य निगरानी प्रभाग के अनुसार देश में गेहूं का औसत खुदरा मूल्य ₹31.58 प्रति किलोग्राम है। अधिकतम खुदरा कीमत ₹55 और न्यूनतम ₹22 प्रति किलो दर्ज की गई है।
उत्तर प्रदेश की मंडियों में भी तेजी साफ है। लखनऊ मंडी में 17 अगस्त को गेहूं का भाव ₹2,466 प्रति क्विंटल था, जो बढ़कर ₹2,640 प्रति क्विंटल हो गया। वहीं हरदोई में दारा किस्म का गेहूं ₹2,408 प्रति क्विंटल से बढ़कर ₹2,553 प्रति क्विंटल तक पहुंच गया।
उद्योग ने उठाए सवाल
4 साल बाद गेहूं और गेहूं से बने उत्पादों के निर्यात से बैन हटाने के बाद एक आटा मिल संचालक ने नाम न छापने की शर्त पर मीडिया से बातचीत के दौरान कहा कि इस बार फसल पिछले साल की तुलना में 7-8 प्रतिशत कम रही है। सरकार ने 3.6 करोड़ टन गेहूं खरीदा है और मक्का की कीमतें भी बढ़ रही हैं। ऐसे में अल नीनो की आशंका के बीच निर्यात की अनुमति देना आगे चलकर समस्या पैदा कर सकता है।
स्टॉक को लेकर कोई चिंता नहीं
हालांकि सरकारी आंकड़ों की माने तो स्थिति संतुलित है। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के अनुसार 2025-26 में देश का गेहूं उत्पादन रिकॉर्ड 12.06 करोड़ टन रहने का अनुमान है, जो पिछले वर्ष के 11.79 करोड़ टन से अधिक है। इसके साथ ही भारतीय खाद्य निगम (FCI) के आंकड़ों के मुताबिक 1 अगस्त तक सरकारी गेहूं भंडार 5.05 करोड़ टन था, जो पिछले पांच वर्षों का सबसे ऊंचा स्तर है।
सीमित रह सकता है निर्यात
जानकारों का कहना है कि भारत का गेहूं मुख्य रूप से नेपाल, भूटान और उत्तरी बांग्लादेश जैसे पड़ोसी बाजारों में ही जा सकता है। बांग्लादेश के पास पहले से अमेरिकी गेहूं खरीदने का समझौता है, इसलिए वहां भी भारतीय गेहूं की मांग सीमित रहने की संभावना है। इसके अलावा नई दिल्ली के निर्यातक राजेश जैन पहाड़िया ने बिजनेस लाइन को बताया कि, भारतीय गेहूं का FOB (फ्री-ऑन-बोर्ड) मूल्य अन्य देशों के गेहूं की तुलना में कम से कम 30 डॉलर प्रति टन अधिक है।
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उनके मुताबिक कांडला बंदरगाह पर भारतीय गेहूं की कीमत करीब 325 डॉलर प्रति टन है, जबकि अन्य देशों का गेहूं 295 डॉलर प्रति टन या उससे कम में उपलब्ध है। इसलिए बड़े पैमाने पर निर्यात की संभावना फिलहाल कम दिखाई देती है।
वैश्विक बाजार में क्यों बढ़ रहे दाम?
अंतरराष्ट्रीय बाजार में शिकागो बोर्ड ऑफ ट्रेड (CBOT) पर गेहूं की कीमत 7.54 डॉलर प्रति बुशल (करीब 277 डॉलर प्रति टन) तक पहुंच गई है। रूस और यूक्रेन के बीच काला सागर (Black Sea) क्षेत्र में बढ़ते हमलों के कारण रूस से होने वाले निर्यात को लेकर चिंता बढ़ी है। इसके अलावा मौसम संबंधी समस्याओं से उत्पादन घटने की आशंका ने भी वैश्विक कीमतों को फरवरी 2023 के बाद के उच्चतम स्तरों के करीब पहुंचा दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक कीमतें ऊंची बनी रहती हैं और अल नीनो का असर फसल पर पड़ता है, तो आने वाले महीनों में भारत के गेहूं बाजार पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि फिलहाल पर्याप्त सरकारी भंडार और भारतीय गेहूं की ऊंची कीमतें बड़े पैमाने पर निर्यात की संभावना को सीमित कर रही हैं।
