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₹99, ₹199 या ₹499 ही क्यों? एक रुपये का फर्क कैसे बदल देता है आपकी खरीदारी का फैसला?

Updated: Thu, 20 Aug 2026 04:57 PM (IST)

यह लेख बताता है कि दुकानदार और ऑनलाइन कंपनियां ₹99, ₹199 जैसी कीमतें क्यों रखती हैं, जिसे मनोवैज्ञानिक मूल्य निर्धारण कहते हैं।

प्राइस टैग के पीछे की स्ट्रेटजी

प्राइस टैग के पीछे की स्ट्रेटजी

HighLights

  1. कीमतों में 9 का अंत मनोवैज्ञानिक मूल्य निर्धारण है।

  2. यह ग्राहक को कीमत कम महसूस कराता है।

  3. लेफ्ट-डिजिट प्रभाव खरीदारी के फैसले बदलता है।

बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली: ₹100 की जगह ₹99, ₹200 की जगह ₹199 और ₹1000 की जगह ₹999 आखिरकार दुकानदार और ऑनलाइन कंपनियां कीमतों को राउंड फिगर में क्यों नहीं रखतीं? अगर आपने कभी ऑनलाइन शॉपिंग की है या बाजार में खरीदारी की है, तो आपने इस तरह की कीमतें (price tags) जरूर देखी होंगी। पहली नजर में ₹1 का अंतर मामूली लगता है, लेकिन कीमत तय करने का यह तरीका ग्राहक की सोच और खरीदारी के फैसले पर असर डाल सकता है। इसे Psychological Pricing यानी मनोवैज्ञानिक मूल्य निर्धारण कहा जाता है।

₹999 देखकर क्यों लगता है ₹1000 से कम?

इसके पीछे एक अहम वजह Left-Digit effect बताई जाती है। आसान भाषा में समझें तो जब हम किसी कीमत को देखते हैं, तो दिमाग अक्सर बाईं तरफ के शुरुआती अंक को ज्यादा महत्व देता है।

उदाहरण के लिए:

* ₹99 की कीमत ₹100 से कम महसूस होती है।
* ₹199, ₹200 से काफी कम लग सकता है।
* ₹999 देखकर दिमाग इसे ₹1000 के बजाय ‘900 और कुछ’ की कीमत के तौर पर पकड़ सकता है।
* इसी तरह ₹4,999 की कीमत ₹5,000 से नीचे वाली कैटेगरी में महसूस होती है।

असल अंतर सिर्फ ₹1 का है, लेकिन कीमत की perception यानी धारणा अलग बन सकती है। यही वजह है कि 9 पर खत्म होने वाली कीमतों का इस्तेमाल लंबे समय से मार्केटिंग में किया जाता रहा है।

इसे charm pricing भी कहते हैं

₹99, ₹199, ₹499 या ₹999 जैसी कीमतों को मार्केटिंग की भाषा में charm pricing या Nine-Ending pricing कहा जाता है। इसका मकसद केवल कीमत कम करना नहीं होता, बल्कि ग्राहक को कीमत कम या ज्यादा आकर्षक महसूस कराना भी होता है।

कई रिसर्च में पाया गया है कि 9 पर खत्म होने वाली कीमतें कुछ परिस्थितियों में ग्राहकों के खरीदारी व्यवहार और ब्रांड की ब्रिकी पर असर डाल सकती है। हालांकि इसका प्रभाव हर प्रोडक्ट, हर ग्राहक और मार्केट में एक जैसा नहीं है।

इसका फायदा दुकानदारों और ऑनलाइन कंपनियों को कैसे मिलता है?

Retail और E-commerce कंपनियां ग्राहकों के खरीदारी व्यवहार को ध्यान में रखकर कीमत तय करती हैं। ₹999 जैसे प्राइस पॉइंट से ग्राहक को कीमत थोड़ी कम महसूस हो सकती है, जबकि कंपनी की कमाई लगभग वही रहती है जो ₹1000 की कीमत पर होती।

यही कारण है कि कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑनलाइन कोर्स, सब्सक्रिप्शन, होटल बुकिंग और कई दूसरे प्रोडक्ट्स में आपको ₹499, ₹999, ₹1,499 या ₹4,999 जैसी कीमतें दिखाई देती हैं।

₹99 और ₹100 में सिर्फ ₹1 का अंतर है, लेकिन ग्राहक के दिमाग में दोनों कीमतों की तस्वीर अलग बन सकती है। यही Psychological Pricing का मूल विचार है। कंपनियां कीमत को इस तरह पेश करती हैं कि ग्राहक को डील ज्यादा आकर्षक लगे।

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