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    'सबूत पेश करने में पूरी तरह विफल रहा अभियोजन पक्ष', अडकोली कोल ब्लॉक मामले में दोनों पूर्व अधिकारी बेदाग करार

    Updated: Tue, 14 Jul 2026 11:53 PM (GMT+05:30)

    राउज एवेन्यू स्थित विशेष सीबीआइ अदालत ने अडकोली कोल ब्लॉक आवंटन मामले में महाराष्ट्र स्टेट माइनिंग कार्पोरेशन लिमिटेड के पूर्व एमडी और चेयरमैन को बरी ...और पढ़ें

    अडकोली कोल ब्लॉक मामले में पूर्व एमडी व चेयरमैन बरी।

    अडकोली कोल ब्लॉक मामले में पूर्व एमडी व चेयरमैन बरी।

    जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। राउज एवेन्यू स्थित विशेष सीबीआइ अदालत ने महाराष्ट्र स्टेट माइनिंग कार्पोरेशन लिमिटेड (एमएसएमसीएल) के पूर्व प्रबंध निदेशक डोमिनिक गैब्रियल फिलिप और पूर्व चेयरमैन अविनाश मनोहर राव वारजुकर को अडकोली कोल ब्लॉक आवंटन में अनियमितताओं के मामले में बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश के आरोपों के मूल तत्व तक साबित नहीं कर सका।

    विशेष सीबीआइ न्यायाधीश धीरज मोर ने 157 पन्नों के फैसले में कहा कि सनिल हाईटेक इंजीनियर्स लिमिटेड (एसएचईएल) को संयुक्त उद्यम (जेवी) के लिए तकनीकी रूप से पात्र घोषित करना दोनों आरोपित अधिकारियों का एकतरफा निर्णय नहीं था, बल्कि महाराष्ट्र सरकार के विभिन्न स्तरों पर जांच और मंजूरी के बाद लिया गया एक संस्थागत फैसला था।

    अदालत ने कहा कि रिकार्ड पर ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो कि किसी आरोपित ने धोखे, अवैध लाभ, गलत मंशा, अवैध आर्थिक लाभ या आपराधिक साजिश के तहत काम किया। अभियोजन यह भी साबित नहीं कर सका कि एमएसएमसीएल को किसी प्रकार के धोखे से संपत्ति या मूल्यवान अधिकार छोड़ने के लिए प्रेरित किया गया या आरोपित अधिकारियों और निजी कंपनी के बीच किसी अवैध समझौते का अस्तित्व था।

    अदालत ने यह भी कहा कि सीबीआइ किसी भी प्रकार के क्विड प्रो क्वो (बदले में लाभ) या अवैध रिश्वत का कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सकी। फैसले में कहा गया कि एसएचईएल या उससे जुड़ी कंपनियों द्वारा बाद में किए गए लेन-देन भी धोखाधड़ी, आपराधिक साजिश या आरोपपत्र में वर्णित अन्य अपराधों को साबित नहीं करते।

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    इन परिस्थितियों में अदालत ने दोनों आरोपितों को सभी आरोपों से बरी करते हुए कहा कि अभियोजन उनके विरुद्ध लगाए गए आरोप संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह विफल रहा।

    सीबीआइ ने वर्ष 2012 में प्राथमिकी दर्ज कर आरोप लगाया था कि वर्ष 2006 में महाराष्ट्र सरकार को आवंटित मार्की-जरी-जामनी-अडकोली कोल ब्लॉक के संबंध में दोनों अधिकारियों ने एसएचईएल को अनुचित लाभ पहुंचाने के लिए साजिश रची।

    एजेंसी का आरोप था कि खनन का आवश्यक अनुभव नहीं होने के बावजूद कंपनी को तकनीकी रूप से योग्य घोषित किया गया और वर्ष 2009 के संयुक्त उद्यम समझौते (जेवीए) में कुछ प्रावधान जोड़कर निजी कंपनी को लाभ पहुंचाया गया।

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