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    देश में सड़क सुरक्षा क्यों बनी चुनौती? इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार, फिर भी खतरा बरकरार

    By Manu TyagiEdited By: Pooja Tripathi
    Updated: Thu, 25 Dec 2025 01:32 PM (GMT+05:30)

    दिल्ली में सुगम यात्रा और सुरक्षित यातायात के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता है। सड़क सुरक्षा नियमों का पालन करना और यातायात प्रबंधन को बेहतर बनाना महत् ...और पढ़ें

    सड़कों की संरचना कुछ इस तरह से होनी चाहिए, ताकि दुर्घटना की आशंका कम से कम हो। फाइल

    सड़कों की संरचना कुछ इस तरह से होनी चाहिए, ताकि दुर्घटना की आशंका कम से कम हो। फाइल

    HighLights

    1. दिल्ली में सुगम यात्रा की आवश्यकता

    2. सुरक्षित यातायात प्रबंधन का महत्व

    3. सड़क सुरक्षा नियमों का पालन करें

    मनु त्यागी, नई दिल्ली। यातायात व्यवस्था पहले की तुलना में सुलभ एवं सुविधाजनक हो गई है। दिल्ली से आपको कहीं भी जाना हो, आप आसानी से जा सकते हैं। यदि आसपास के शहरों की बात करें तो कह सकते हैं जितनी देर में आप अपने निवास से सड़क मार्ग से एयरपोर्ट तक और फिर उड़ान भरकर वहां से गंतव्य तक पहुंचेंगे, उतनी देर में आप दिल्ली से सड़क के माध्यम से गंतव्य तक पहुंच सकते हैं।

    वैसे केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने कई साल पहले यह बात कही थी कि गाड़ी रफ्तार में भी चलेगी और सड़क ऐसी होगी कि कार के डैश बोर्ड पर रखा चाय का प्याला भी नहीं छलकेगा। इसे आप अपने वाहन से महसूस कर सकते हैं और मजबूत कनेक्टिविटी के जरिए जल्दी पहुंच भी सकते हैं।

    इनफोर्समेंट की बात आते ही सब हो जाता है धराशाई 

    हालांकि तयशुदा गति से अधिक गति पर वाहन चलाना अपराध है, इसलिए रफ्तार पर नियंत्रण भी जरूरी है। यदि स्पीड पर नियंत्रण रखकर नहीं चलाएंगे तो दोषी तो कहलाएंगे और जब दोषी होंगे तो उसकी कार्रवाई, सजा-हर्जाना के हकदार भी होंगे। और वह कार्रवाई कैसे होगी? 

    बस यहीं पर आकर यानी इनफोर्समेंट की जब बात आती है तो सब धराशाई हो जाता है। कानून से लेकर कार्रवाई तक। हालांकि कई बार कानून जो कहता है, वह कार्रवाई में नहीं उतरता। उसी के बीच भ्रष्टाचार भी हावी हो जाता है और सड़क पर वाहन चलाते हुए लापरवाही करने वाला बार-बार नियमों को इसीलिए रौंदता है, क्योंकि हर बार कार्रवाई से बचकर वह आसानी से छूट भी जाता है।

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    ऐसा नहीं है कि भारत में सुरक्षित यातायात कानून की कमी है, वह खूब मजबूत हैं, लेकिन संकट हमेशा की तरह उसके क्रियान्वयन में है। यही संकट इतना विकराल हो चुका है कि विकसित देश का तमगा पाने की तैयारी में जी जान से लगे भारत के माथे पर सड़क सुरक्षा के सारे खराब रिकार्ड भी दर्ज हैं।

    दुर्घटनाओं से लेकर जान गंवाने वाले लोगों की संख्या तक। जिन हाईवे, एक्सप्रेसवे की विशेषता सुगम सफर के रूप में गिनाई जाती है वहां हर दूसरे दिन हादसे सड़क किनारे खड़े ट्रक/ वाहन की वजह से ही होते हैं।

    सुरक्षित यातायात की गारंटी :

    नितिन गडकरी ने हाईवे और एक्सप्रेसवे तो बनवाए, लेकिन इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि उन्हें सुरक्षित नहीं बना सके। बीते पांच वर्षों में देशभर में 21 लाख से ज्यादा सड़क दुर्घटनाएं हुई हैं, जिनमें आठ लाख से अधिक मौतें हुई हैं। इसमें भी सर्वाधिक जान गंवाने वालों में युवाओं की संख्या ही अधिक है। 

    18 से 45 वर्ष तक उम्र वर्ग वाले सबसे अधिक दुर्घटनाओं का शिकार हुए हैं। इन आंकड़ों में हर साल वृद्धि ही हुई है। सुरक्षित यातायात की गारंटी भी उसी तरह की होनी चाहिए जिस तरह राज्यों में ट्रिपल इंजन की सरकार की बात हो रही है।

    यहां भी ट्रिपल-इंजन के रूप में ट्रिपल ई यानी एजुकेशन, इंजीनियरिंग और इमरजेंसी केयर पर गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने भी सड़क दुर्घटनाओं को लेकर चिंता जताई है और यहां तक कह दिया कि अब इसको लेकर यदि सरकार कोई दिशा-निर्देश नहीं तय करती है तो कोर्ट इसके लिए सख्त नियम तक बनाने को तैयार है।

    दरअसल अभी सब केवल बातों तक, कागजी प्रक्रिया तक सीमित रह जाती हैं। सुरक्षित यातायात शिक्षा का बड़े स्तर पर परिवहन विभाग से लेकर आम लोगों तक में अभाव है। लोग जागरूक नहीं होना चाहते और भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआइ) से लेकर परिवहन विभाग तक सब अपनी जिम्मेदारियों को कागजों में पूरा कर लेते हैं।

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    सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद इस वर्ष कैशलेस उपचार की योजना पूरे देश में लागू करने की घोषणा की गई, लेकिन उसी का यह हश्र है कि अब भी यह एक पायलट प्रोजेक्ट माडल तक ही सीमित है। यहां समस्या यह है कि नए-नए हस्तक्षेप तो किए जा रहे हैं, लेकिन हादसे जिन कारणों से हो रहे हैं उन रोड इंजीनियरिंग पर ध्यान नहीं दिया जा रहा। इस पर ध्यान दिया जाना चाहिए।

    ताजा उदाहरण के रूप में यदि कोहरे के कारण हादसों को ही लिया जाए तो इसके लिए नियम तो सब तय हैं, पर उसका पालन कराना/ करना भी तो दोनों तरफ की ही जिम्मेदारी है। हाल ही में यमुना एक्सप्रेसवे पर आगरा क्षेत्र में घटना हुई जिसमें 19 लोगों की मौत हो गई।

    अब ऐसी घटना दोबारा न हो, सरकार को इसकी चिंता करनी चाहिए। केवल वाहनों की गति धीमी कर देना समाधान नहीं है। यदि लोग नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं तो उन पर कार्रवाई करना और पालन कराना भी तो जिम्मेदारी है।

    सुप्रीम कोर्ट की चिंता :

    कुछ माह पहले सुप्रीम कोर्ट ने फुटपाथ पर चलने वालों की सुरक्षा को लेकर चिंता जाहिर की थी और अब लगातार हाईवे/ एक्सप्रेसवे पर अव्यवस्थाओं के कारण बढ़े हादसों पर चिंता जाहिर करते हुए निर्देश बनाने की बात कही। हाईवे/ एक्सप्रेसवे पर अक्सर हादसों की वजह अनधिकृत ढाबे, जगह-जगह खड़े ट्रक होते हैं।

    कोर्ट ने इसीलिए पूछा कि ऐसे अनधिकृत ढाबों के खिलाफ कार्रवाई के संबंध में नियम-कानून क्या कहते हैं? सरकार ने इसके लिए किसे जिम्मेदार मानते हुए कार्रवाई की। इसमें कोई दोराय नहीं कि विकास के लिए हाईवे, एक्सप्रेसवे जरूरी हैं।

    बीते एक दशक में देखें तो इससे कई शहरों की तस्वीर बदल गई है। विकसित देश की परिभाषा को ऐसी मजबूत सड़क मार्ग कनेक्टिविटी से बल मिलता है। लेकिन जितने भी हाईवे/ एक्सप्रेसवे हैं उनका ट्रैफिक सेफ्टी आडिट नहीं होना भी यात्रियों की जान जोखिम में डालने जैसा है।

    परिवहन विभाग के पास तो इसका इतना मजबूत ढांचा होना चाहिए कि हर महीने सभी हाईवे एवं एक्सप्रेसवे का ट्रैफिक सेफ्टी ऑडिट हो सके। तभी तो पता लगेगा कि आखिर यातायात नियमों को लेकर कहां लापरवाही बरती जा रही है, कैसी लापरवाही हो रही हैं।

    अनधिकृत ढाबों से लेकर, अनियंत्रित होकर चलने वाले ट्रक या कहीं भी बगैर पार्किंग के खड़े ट्रक, कहीं दिशा सूचक नहीं हैं, कहीं एक्सप्रेसवे पर अंधेरा है तो कहीं लाइफ लाइन जैसे तमगे हासिल करने वाले बड़े एक्सप्रेसवे में खतरनाक जंप हैं। यानी रोड इंजीनियरिंग का अभाव है। इनका आडिट भी प्राधिकरण को खुद नहीं, बल्कि स्वतंत्र एजेंसी से कराना चाहिए।

    अभी एनएचएआइ हर साल खामियों को लेकर एक परंपरागत आडिट कराता तो है जिसमें ब्रेक स्टैट घटने-बढ़ने तक ही सब सीमित है। देश में जिस तरह अब रोड कनेक्टिविटी हो चुकी है, ऐसे में साल में एक बार औपचारिक आडिट नहीं, हर माह दुर्घटनाओं को आधार बनाकर आडिट होना चाहिए, ताकि मर्ज के अनुकूल इलाज किया जा सके।

    जब हर सरकार या एनएचएआइ हर माह सड़क हादसों की रिपोर्ट का आडिट सामने रखेगी तो लोगों को खुद भी अपनी लापरवाहियों का भान होगा। नैतिक जिम्मेदारी, चेतना जागृत होगी कि केवल दूसरों की ही नहीं हमारी भी जिम्मेदारी है।

    पिछले एक दशक में देश के अधिकांश हिस्सों में सड़क यातायात की व्यवस्था में व्यापक स्तर पर सुधार हुआ है। यात्रा करना तुलनात्मक रूप से बहुत ही सुगम और सुलभ हो गया है। परंतु सड़क दुर्घटनाओं से जुड़ा मामला अब भी बड़ी चिंता का विषय है।

    वस्तुत: तमाम उपायों के बावजूद देश में सड़क दुर्घटनाओं की संख्या कम नहीं हो रही है। इस कारण बड़ी संख्या में लोग घायल होने के साथ ही असमय मौत का शिकार हो रहे हैं। लिहाजा इस ओर भी ध्यान दिया जाना चाहिए, ताकि सड़क यात्रा अधिकतम सुरक्षित बने

    चालान होने पर भुगतान भी हो सुनिश्चित

    यह सही है कि सड़क नेटवर्क के हिसाब से भारत में सर्वाधिक सड़क दुर्घटनाएं होती हैं। लेकिन इसके पीछे भी एक बड़ा मर्ज है, जिसकी अनदेखी आज सुचारु व्यवस्था का रूप ले चुकी है। हर साल लोक अदालत आदि लगाकर करोड़ों केस निपटा दिए जाते हैं, जिसमें सर्वाधिक मामले परिवहन विभाग के जुड़े ही होते हैं।

    इससे लोगों को कोई फर्क ही नहीं पड़ता कि उनके वाहनों के चालान होते रहते हैं। अनेक चालानों के बावजूद भुगतान ही नहीं किया जाता। यदि चालान हुआ है तो उसकी समय-सीमा तय होनी चाहिए कि आपको निर्धारित समयसीमा में उसका भुगतान करना ही होगा, अन्यथा उसका दंड दोगुना-तिगुना होगा।

    चूंकि इस तरह का कोई नियम या दबाव नहीं है, इसलिए वाहन चालकों को भी फर्क नहीं पड़ता। एक साल में कितने ही तरह के सड़क सुरक्षा कानून के सख्त नियमों का उल्लंघन किया हो, एक दिन का समय लगाकर आराम से लोक अदालत में माफ कराकर चले आते हैं।

    यदि यही व्यवस्था बनी रहेगी तो लोगों में कानून का डर कहां से बनेगा। हमने विदेश से सुगम यातायात हेतु सड़क मार्गों के माडल तो अपना लिए, लंबी दूरी तय करने के लिए वैसी सड़कें भी बना दीं, पर वहां सुरक्षा आश्वासन नहीं कर पाए। लोग स्वयं तो सीखेंगे नहीं, कानून के डर से भी उन्हें नियमों का पालन करना नहीं सिखा पाए।

    वैश्विक स्तर पर सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों में वृद्धि के बावजूद, कुछ देशों में राजमार्गों पर होने वाली मौतों की दर बहुत कम है। कम सड़क दुर्घटनाओं वाले देशों की मुख्य विशेषता यातायात कानूनों का कड़ाई से पालन, वाहनों के सुरक्षित डिजाइन, पैदल यात्रियों और साइकिल चालकों के लिए अलग लेन और कम गति सीमा, विशेष रूप से शहरी क्षेत्रों में है।

    इसीलिए विश्व में सबसे कम सड़क दुर्घटनाओं वाले देशों में मोनाको अपने सख्त यातायात कानूनों, सुव्यवस्थित बुनियादी ढांचे और उच्च स्तरीय नियंत्रण वाले यातायात माहौल के लिए जाना जाता है। मोनाको में लापरवाही से वाहन चलाने, तेज गति और नशे की हालत में वाहन चलाने के प्रति जीरो टालरेंस नीति है।

    वहीं यूरोप भी उच्च गुणवत्ता वाले सड़क बुनियादी ढांचे में भारी निवेश करता है। सड़कें सुव्यवस्थित, अच्छी तरह से रोशन और स्पष्ट रूप से चिह्नित हैं, और दुर्घटनाओं को कम करने के लिए गोल चक्कर, पैदल यात्री क्रासिंग और उन्नत यातायात प्रबंधन प्रणालियों का व्यापक उपयोग किया जाता है।

    कई यूरोपीय देशों में लाइसेंस जारी करने से पहले व्यापक चालक प्रशिक्षण, कई ड्राइविंग टेस्ट और उच्च शुल्क अनिवार्य होते हैं। इससे यह सुनिश्चित होता है कि चालक सड़क पर बेहतर तरीके से तैयार और अधिक जिम्मेदार हों। ये व्यवस्थाएं धीरे-धीरे हमारे देश में भी लागू हो रही हैं, लेकिन उनमें गहनता से पारदर्शिता बनाने की आवश्यकता है।