दिल्ली: 10 किलो गांजा बरामदगी के मामले में आरोपित बरी, कोर्ट ने जांच में गंभीर खामियां गिनाईं
दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने अमजद मंडल को 10 किलो गांजा बरामदगी मामले में बरी कर दिया। अदालत ने पुलिस जांच में एनडीपीएस अधिनियम की अनिवार्य कानूनी ...और पढ़ें

कोर्ट ने अमजद मंडल को 10 किलो गांजा बरामदगी मामले में बरी कर दिया। (AI Generated Image)
HighLights
अमजद मंडल को 10 किलो गांजा मामले में बरी किया।
पुलिस ने एनडीपीएस अधिनियम की प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया।
अभियोजन पक्ष आरोपित के खिलाफ आरोप साबित नहीं कर सका।
जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। पटियाला हाउस स्थित विशेष न्यायाधीश की अदालत ने 10 किलो गांजा बरामदगी के मामले में एनडीपीएस एक्ट के तहत गिरफ्तार आरोपित अमजद मंडल को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि पुलिस जांच के दौरान एनडीपीएस अधिनियम की अनिवार्य कानूनी प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया और अभियोजन पक्ष आरोपित के खिलाफ आरोप संदेह से परे साबित करने में विफल रहा।
विशेष न्यायाधीश जितेंद्र प्रताप सिंह की अदालत में यह मामला वसंत कुंज नार्थ थाना पुलिस द्वारा दर्ज किया गया था। अभियोजन के अनुसार 10 सितंबर 2018 को दक्षिण-पश्चिम जिले की नारकोटिक्स टीम को गुप्त सूचना मिली थी कि अमजद मंडल किशनगढ़ गांव की ओर 10 किलो गांजा लेकर जा रहा है। सूचना के आधार पर पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया और बरामद मादक पदार्थ के नमूने जांच के लिए रोहिणी स्थित फारेंसिक साइंस लेबोरेटरी (एफएसएल) भेजे थे।
तस्वीरें लेना व इन दस्तावेजों को मजिस्ट्रेट से प्रमाणित कराना आवश्यक
अदालत ने कहा कि एनडीपीएस अधिनियम के तहत जांच एजेंसी के लिए कानून में निर्धारित प्रक्रिया का अक्षरश पालन करना अनिवार्य है। विशेष रूप से अधिनियम की धारा 52ए के तहत जब्त मादक पदार्थ की विस्तृत सूची (इन्वेंट्री) तैयार करना, उसकी तस्वीरें लेना व इन दस्तावेजों को मजिस्ट्रेट से प्रमाणित कराना आवश्यक है। यह प्रक्रिया पारदर्शिता सुनिश्चित करने और जब्त मादक पदार्थ से किसी भी प्रकार की छेड़छाड़, अदला-बदली या चोरी की आशंका को समाप्त करने के लिए बनाई गई है।
अदालत ने कहा कि इस मामले में अभियोजन पक्ष ऐसा कोई साक्ष्य पेश नहीं कर सका जिससे यह साबित हो कि मजिस्ट्रेट के समक्ष इन्वेंट्री तैयार की गई थी या उनकी मौजूदगी में तस्वीरें ली गई थीं। किसी भी गवाह ने यह नहीं बताया कि मजिस्ट्रेट के समक्ष इस संबंध में कोई आवेदन दिया गया था। इसलिए धारा 52ए का स्पष्ट उल्लंघन हुआ।
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जांच में कोई स्वतंत्र सार्वजनिक गवाह शामिल नहीं किया गया
कोर्ट ने यह भी कहा कि मामले की जांच में कोई स्वतंत्र सार्वजनिक गवाह शामिल नहीं किया गया। तलाशी, बरामदगी और सैंपलिंग की वीडियोग्राफी या फोटोग्राफी भी नहीं कराई गई। न तो छापेमारी, न आरोपी की गिरफ्तारी और न ही सीलिंग प्रक्रिया का कोई वीडियो रिकार्ड मौजूद है। इससे अभियोजन का मामला और कमजोर हो गया।
फैसले में अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयानों में कई महत्वपूर्ण विरोधाभास थे। घटनास्थल पर पहुंचने का समय, एसीपी प्रमोद कुमार के वहां रहने की अवधि तथा सैंपल लेने के समय को लेकर गवाहों के बयान मेल नहीं खाते। इसके अलावा जब्त मादक पदार्थ की सुरक्षित अभिरक्षा (चेन ऑफ कस्टडी) को लेकर भी आवश्यक सुरक्षा उपायों का अभाव पाया गया।
एनडीपीएस अधिनियम की धारा 42 के उल्लंघन को भी गंभीर माना
अदालत ने एनडीपीएस अधिनियम की धारा 42 के उल्लंघन को भी गंभीर माना। इस धारा के अनुसार गुप्त सूचना की प्रति 72 घंटे के भीतर जब्ती करने वाले अधिकारी के वरिष्ठ अधिकारी को भेजना अनिवार्य है। अदालत ने कहा कि पूरे मामले की नींव इसी गुप्त सूचना पर आधारित थी, इसलिए इस कानूनी चूक ने तलाशी और बरामदगी की वैधता पर ही प्रश्नचिह्न लगा दिया।