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'समलैंगिक जोड़ों की याचिका पर एक साल बाद भी क्यों नहीं दाखिल किया जवाब', हाई कोर्ट ने पूछा

Published: Thu, 20 Aug 2026 10:12 PM (IST)

दिल्ली हाई कोर्ट ने समलैंगिक जोड़ों की याचिका पर केंद्र सरकार से एक साल बाद भी जवाब न देने पर ...और पढ़ें

दिल्ली हाई कोर्ट ने गुरुवार को केंद्र सरकार पर सवाल उठाया।

दिल्ली हाई कोर्ट ने गुरुवार को केंद्र सरकार पर सवाल उठाया।

HighLights

  1. हाई कोर्ट ने केंद्र से समलैंगिक याचिका पर जवाब मांगा।

  2. मेडिकल इलाज में पार्टनर को प्रतिनिधि मान्यता देने की मांग।

  3. अदालत ने समलैंगिक लिव-इन संबंधों पर भी सवाल उठाए।

जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। समलैंगिक जोड़ों की याचिका पर एक साल का समय बीत जाने के बाद भी जवाब नहीं दाखिल करने पर दिल्ली हाई कोर्ट ने गुरुवार को केंद्र सरकार पर सवाल उठाया। न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा की पीठ ने केंद्र सरकार को एक सप्ताह का समय देते हुए पूछा कि एक साल बीत जाने के बाद भी उन्होंने उस याचिका पर जवाब क्यों नहीं दिया।

याचिका में मेडिकल इलाज के दौरान समलैंगिक जोड़ों को मेडिकल प्रतिनिधि के तौर पर मान्यता देने की मांग की गई है।
अदालत ने मौखिक रूप से कहा कि जब लोगों को समलैंगिक पार्टनर के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रहने की अनुमति है तो अधिकारियों को उसी के अनुसार नियमों में बदलाव करने होंगे।

अधिकारियों ने अभी तक अपना जवाब क्यों दाखिल नहीं किया: कोर्ट

पीठ ने कहा कि कानून एक पुरुष और महिला के बीच लिव-इन रिलेशनशिप को मान्यता देता है। यह दो पुरुषों के बीच लिव-इन रिलेशनशिप को क्यों नहीं मानेगा? जुलाई 2025 में केंद्र और नेशनल मेडिकल कमीशन (एनएमसी) को नोटिस जारी करने पर पीठ ने पूछा कि अधिकारियों ने अभी तक अपना जवाब क्यों दाखिल नहीं किया है।

इस पर सरकारी वकील ने कोर्ट से कुछ समय मांगा ताकि वे अधिकारियों से निर्देश ले सकें। याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता सौरभ कृपाल ने कहा कि कोर्ट ने जुलाई में केंद्र सरकार को अपना जवाब दाखिल करने का आखिरी मौका दिया था, लेकिन वह अभी तक दाखिल नहीं किया गया है।

कोई स्पष्ट कानूनी ढांचा या सामान्य कानून को मान्यता नहीं

याचिकाकर्ता ने कहा था कि 2015 से अपने पार्टनर के साथ रिश्ते में थी और दोनों ने 2023 में न्यूजीलैंड में शादी की थी। वे 2018 से दिल्ली में समलैंगिक पार्टनर के तौर पर साथ रह रहे हैं। याचिका में कहा गया कि इलाज या इमरजेंसी के दौरान मेडिकल सहमति के लिए पार्टनर को मान्यता देने वाला कोई स्पष्ट कानूनी ढांचा या सामान्य कानून को मान्यता नहीं है।

याचिका में कोर्ट से ऐसी गाइडलाइंस बनाने का आग्रह किया गया जो अस्पतालों या डॉक्टरों को समलैंगिग पार्टनर को मेडिकल प्रतिनिधि के तौर पर मान्यता या एक्सेस देने का निर्देश देने की मांग की गई है।

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