कस्टडी विवाद के चलते USA जाकर पढ़ाई पर रोक से इनकार, मां को बच्चे के साथ जाने की अनुमति; दिल्ली HC का फैसला
दिल्ली हाई कोर्ट ने एक मां को बच्चे के साथ उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका जाने की अनुमति दी। अदालत ने कहा कि मां का व्यक्तिगत विकास और गरिमा संविधान के अन ...और पढ़ें

महिला को बच्चे के साथ उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए जाने की अनुमति देते हुए अदालत ने की टिप्पणी।

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जागरण, नई दिल्ली। एक महिला के सपनों की उड़ान को पंख देते हुए बच्चे की कस्टडी से जुड़े मामले पर दिल्ली हाई कोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। महिला के व्यक्तिगत विकास को महत्व देते हुए अदालत ने कहा कि एक मां के व्यक्तिगत विकास, गरिमा और आजादी का अधिकार संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत आजादी के अधिकार का एक जरूरी हिस्सा है।
अदालत ने कहा कि ऐसे अधिकार को सिर्फ इसलिए कम नहीं किया जा सकता क्योंकि बच्चे की कस्टडी और मुलाकात की कार्यवाही लंबित है। न्यायमूर्ति सौरभ बनर्जी की पीठ ने कहा कि एक मां बच्चे की परवरिश के लिए जिम्मेदार है और इसके लिए उसे शिक्षा, व्यक्तिगत तरक्की के अधिकार को छोड़ने के लिए मजबूर करने का आधार नहीं हो सकता।
अदालत ने कहा कि इसके उलट, एक मां को उच्च शिक्षा हासिल करने देना उसकी गरिमा, आर्थिक आजादी और कुल मिलाकर भलाई को मजबूत करता है। अदालत ने कहा कि ये ऐसे तत्व हैं जो संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत जीवन के अधिकार के मूल में हैं और बदले में उसे बच्चे के लिए ज्यादा सुरक्षित, स्थिर और पोषण वाला माहौल देने में सक्षम बनाते हैं।
अदालत ने उक्त टिप्पणी महिला को अपने नाबालिग बेटे के साथ अपनी पोस्ट-ग्रेजुएट डिग्री पूरी करने के लिए यूएसए जाने की इजाजत देते हुए की। महिला की शादी 2014 में हुई थी और 2017 में उनका बेटा हुआ। 2019 में पति अलग होने के बाद पारिवारिक अदालत और हाई कोर्ट में बच्चे की कस्टडी और मुलाकात के विवादों सहित कई कार्यवाही शुरू की गईं।
महिला काे वर्जीनिया में मैरीमाउंट यूनिवर्सिटी में पब्लिक हेल्थ एजुकेशन एंड प्रमोशन में मास्टर प्रोग्राम में दाखिला मिल गया और उसने बच्चे के साथ अमेरिका जाने की इजाजत मांगी। हालांकि, पति ने इस याचिका का विरोध करते हुए आरोप लगाया कि जगह बदलने से उसके मुलाकात के अधिकार खत्म हो जाएंगे।
हालांकि, महिला को राहत देते हुए अदालत ने कहा कि विशेषतौर पर विदेशी विश्वविद्यालय से परास्नातक की डिग्री हासिल करने का फैसला एक सोच-समझकर लिया गया फैसला है और इसका मकसद व्यक्तिगत विकास, गरिमा और बेहतर भविष्य के करियर के मौके हासिल करने की क्षमता है।
पीठ ने कहा कि ऐसे निर्णय पर रोक लगाना या बिना वजह पाबंदी लगाना, संविधान में निहित व्यक्तिगत आजादी और विकास के अधिकार की भावना में एक गलत दखलअंदाजी होगी। पीठ ने यह भी कहा कि नाबालिग बच्चे की भलाई सबसे जरूरी है, लेकिन एक मां को अपनी पूरी क्षमता को हासिल करने का हकदार है।
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किसी मां को अपने बच्चे और अपने करियर के बीच कोई मुश्किल चुनाव करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। अदालत ने महिला को बच्चे के साथ उच्च शिक्षा पूरा करने के लिए यूएसए जाने की इजाजत दे दी और पिता के मिलने के अधिकारों से जुड़े मौजूदा अंतरिम इंतजाम में बदलाव कर दिया।