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‘बिना ठोस आधार के दिल्ली पुलिस की छवि खराब करना गलत’, BCI परिसर में वकीलों पर हमले की CBI जांच की मांग खारिज

Published: Mon, 21 Sep 2026 04:23 PM (IST)Updated: Mon, 21 Sep 2026 07:38 PM (IST)

दिल्ली हाई कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया परिसर में वकीलों पर हुए हमले की सीबीआई जांच की मांग को ...और पढ़ें

पीठ ने कहा कि बिना किसी ठोस आधार के पूरी दिल्ली पुलिस की छवि को इस तरह खराब करना सही नहीं है।

पीठ ने कहा कि बिना किसी ठोस आधार के पूरी दिल्ली पुलिस की छवि को इस तरह खराब करना सही नहीं है।

HighLights

  1. दिल्ली हाई कोर्ट ने सीबीआई जांच की मांग ठुकराई।

  2. बीसीआई परिसर में वकीलों पर हुए हमले का मामला।

  3. दिल्ली पुलिस की छवि खराब करना गलत बताया।

जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। बार काउंसिल आफ इंडिया (बीसीआई) के परिसर के अंदर और बाहर अधिवक्ताओं पर हुए हमले की सीबीआई या किसी दूसरी स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराने की मांग को दिल्ली हाई कोर्ट ने को ठुकरा दिया। न्यायमूर्ति गिरीश कथपालिया की पीठ ने इस तर्क को ठुकरा दिया कि बीसीआई चेयरमैन ममन कुमार मिश्रा सत्ताधारी दल के सांसद हैं और इसलिए दिल्ली पुलिस निष्पक्ष रूप से काम नहीं करेगी।

पीठ ने कहा कि बिना किसी ठोस आधार के पूरी दिल्ली पुलिस की छवि को इस तरह खराब करना सही नहीं है। अदालत ने कहा कि सीबीआई भी एक सरकारी संस्था है और ऐसे सामान्य व बेबुनियाद आरोपों से किसी सरकारी संस्था को बदनाम करने की कोशिश से बचना चाहिए, क्योंकि, इससे आम आदमी के मन में पूरे सिस्टम के प्रति नकारात्मक सोच और अविश्वास पैदा होता है।

याचिकाकर्ता अधिवक्ताओं ने याचिका दायर कर बीसीआई से घटना के समय की अपनी बिल्डिंग की सीसीटीवी रिकार्डिंग को सुरक्षित रखें और सौंपने का निर्देश देने की मांग की थी।अधिवक्ताओं की तरफ से पेश हुए अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि याचिका में सीबीआई या किसी दूसरी स्वतंत्र एजेंसी से जांच की मांग की गई थी, क्योंकि दिल्ली पुलिस सरकार के अधीन आती है और बीसीआई के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा सत्ताधारी पार्टी के सांसद हैं।

यह भी तर्क दिया था कि इन हालात में निष्पक्ष जांच न होने की आशंका पैदा होती है। याचिकाकर्ता वकीलों ने यह भी कहा कि शिकायत के बावजूद दिल्ली पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। यह तर्क दिया गया कि मजिस्ट्रेट सीसीटीवी फुटेज जब्त करने या जांच के दूसरे कदम उठाने का निर्देश नहीं दे सकते और न ही उन्हें सीबीआई जांच का निर्देश देने का अधिकार है।

हालांकि, अदालत ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि याचिकाकर्ताओं ने ऐसा कोई मामला नहीं बनाया जिससे कोर्ट को यह यकीन हो सके कि संबंधित एसएचओ लापरवाही या कार्रवाई न करने का दोषी है। पीठ ने पाया कि याचिकाकर्ताओं की शिकायतों से कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता है।

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