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    दिल्ली दवा घोटाला: 2024 की चेतावनी हुई नजरअंदाज? समय पर कार्रवाई से टल सकता था ₹650 करोड़ का घपला

    Updated: Wed, 08 Jul 2026 06:54 AM (GMT+05:30)

    दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य विभाग में 650 करोड़ रुपये के दवा और उपकरण खरीद घोटाले की जांच के बीच यह सवाल उठ रहा है कि 2024 में मिले संकेतों पर कार्रवाई ...और पढ़ें

    एआई जेनेरेटेड इमेज।

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    HighLights

    1. 2024 में ही मिले थे 650 करोड़ के घोटाले के शुरुआती संकेत।

    2. डीडीयू अस्पताल में दवा चोरी और घटिया सामग्री आपूर्ति उजागर हुई।

    3. समय पर सख्त कार्रवाई होती तो यह बड़ा घोटाला टल जाता।

    जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य विभाग में सामने आए 650 करोड़ रुपये के दवा एवं उपकरण खरीद घोटाले की जांच के बीच एक बड़ा सवाल उठ रहा है, कहा जा रहा है कि वर्ष 2024 में मिले संकेतों पर समय रहते सख्त कार्रवाई होती तो जालसाजों की 2026 में 650 करोड़ के घोटाले करने की हिम्मत ही नहीं पड़ती।

    विभागीय दस्तावेज बताते हैं कि स्वास्थ्य विभाग की खरीद और आपूर्ति व्यवस्था में घपले-घोटाले को लेकर आशंकाएं नई नहीं थीं। 30 जनवरी 2024 को एंटी करप्शन ब्रांच (एसीबी) ने दीनदयाल उपाध्याय (डीडीयू) अस्पताल के स्टोर प्रभारी को नोटिस जारी कर विभिन्न चिकित्सा सामग्रियों की खरीद और आपूर्ति से जुड़े मूल रिकार्ड तलब किए थे।

    नोटिस में उल्लेख है कि स्वास्थ्य विभाग की विजिलेंस शाखा की ओर से जांच के लिए भेजे गए सामानों के नमूने गुणवत्ता परीक्षण में असफल पाए गए थे।

    70 लाख की दवा चोरी का मामला भी आया था सामने

    दस्तावेज बताते हैं कि 2024 में डीडीयू अस्पताल में अधोमानक दवा व सामाग्री आपूर्ति के साथ 70 लाख रुपये की दवा चोरी का मामला भी सामने आया था। इसमें स्टोर इंचार्ज और सिक्योरिटी इंचार्ज निलंबित हुए थे।

    तब आरोप लगे थे कि दवा चोरी की शिकायत ही झूठी है, दवा आपूर्ति हुई ही नहीं थी, जांच में मामला खुलने का डर सताया तो दवा चोरी का स्वांग रच दिया गया। हालांकि जांच में इसकी अधिकारिक पुष्टि नहीं की गई।

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    इस मामले में 30 जनवरी 2024 को एंटी करप्शन ब्रांच (एसीबी) ने डीडीयू अस्पताल के स्टोर प्रभारी को नोटिस जारी कर विभिन्न चिकित्सा सामग्रियों की खरीद और आपूर्ति से जुड़े मूल रिकार्ड तलब किए थे। स्वास्थ्य विभाग की विजिलेंस शाखा द्वारा लिए गए कुछ नमूने परीक्षण में असफल पाए गए थे। इनमें बैंडेज, काटन, सर्जिकल ग्लव्स, हैंड सैनिटाइजर, इन्फ्यूजन सेट, काटन गाज और सर्जिकल मास्क जैसी सामग्री शामिल थी।

    यानी एक ओर दवा चोरी का मामला सामने आया, वहीं दूसरी ओर अस्पतालों को आपूर्ति की गई चिकित्सा सामग्री की गुणवत्ता पर भी सवाल उठे। इन घटनाओं ने स्वास्थ्य विभाग की खरीद और आपूर्ति प्रणाली की पारदर्शिता, गुणवत्ता नियंत्रण और निगरानी तंत्र पर उस समय गंभीर प्रश्न खड़े किए थे।

    टल सकता था 650 करोड़ रुपये का घोटाला

    अब वर्ष 2026 में दर्ज एफआइआर में दवाओं, सर्जिकल सामग्री और चिकित्सा उपकरणों की खरीद में घोटाले, टेंडर शर्तों में हेरफेर, चुनिंदा आपूर्तिकर्ताओं को लाभ पहुंचाने, खरीद दरों में भारी अंतर और सरकारी धन के दुरुपयोग जैसे गंभीर आरोप सामने आए हैं।

    अब स्वास्थ्य विभाग में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि यदि 2024 में सामने आए मामलों के बाद खरीद प्रक्रिया, गुणवत्ता परीक्षण, स्टाक सत्यापन, रिकार्ड प्रबंधन और जवाबदेही व्यवस्था को और मजबूत बनाया जाता तो 650 करोड़ के घोटाले को शुरुआती स्तर पर ही पकड़ा जा सकता था।

    इसे लेकर पुराने मामलों, शिकायतों और वर्तमान जांच के बीच संभावित संबंधों की भी पड़ताल किए जाने की मांग दबी जुवान में उठाई जा रही है।

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