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    दिल्ली हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: वयस्क अपनी मर्जी से चुन सकते हैं जीवनसाथी, परिवार की मंजूरी जरूरी नहीं

    Updated: Fri, 06 Feb 2026 08:35 PM (GMT+05:30)

    दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है कि वयस्क अपनी मर्ज़ी से जीवनसाथी चुन सकते हैं, जिसके लिए समाज या परिवार की मंज़ूरी ज़रूरी नहीं है। कोर्ट ने इसे संवैधानिक अ ...और पढ़ें

    कोर्ट ने कहा कि व्यक्तियों को अपना जीवन साथी चुनने का संवैधानिक अधिकार है। फाइल फोटो

    कोर्ट ने कहा कि व्यक्तियों को अपना जीवन साथी चुनने का संवैधानिक अधिकार है। फाइल फोटो

    HighLights

    1. वयस्कों को जीवनसाथी चुनने का संवैधानिक अधिकार है।

    2. परिवार या समाज की मंज़ूरी आवश्यक नहीं है।

    3. दिल्ली हाई कोर्ट ने जोड़े को पुलिस सुरक्षा दी।

    जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। परिवारों की मर्ज़ी के खिलाफ़ शादी करने वाले वयस्कों के मामले में एक अहम टिप्पणी करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि सहमति से शादी करने वाले वयस्कों को अपने जीवन साथी चुनने के लिए समाज की मंज़ूरी की ज़रूरत नहीं है, और न ही समाज या परिवार के सदस्य ऐसे मामलों में दखल दे सकते हैं।

    जस्टिस सौरभ बनर्जी की बेंच ने कहा कि ऐसे फैसलों को सम्मान दिया जाना चाहिए, क्योंकि व्यक्तियों को बिना किसी शक के अपने जीवन साथी चुनने का संवैधानिक अधिकार है। कोर्ट ने यह भी दोहराया कि शादी का अधिकार मानवीय स्वतंत्रता का हिस्सा है और यह व्यक्तिगत पसंद का मामला है। यह न केवल मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा में शामिल है, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 21 का भी एक अभिन्न अंग है।

    कोर्ट ने ये टिप्पणियां एक शादीशुदा जोड़े द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए कीं। नई शादीशुदा महिला ने अपने पिता से जान के खतरे का हवाला देते हुए पुलिस सुरक्षा मांगी थी। जोड़े ने कोर्ट को बताया कि उन्होंने जुलाई 2025 में एक आर्य समाज मंदिर में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार शादी की थी और बाद में अपनी शादी रजिस्टर करवाई थी। यह तर्क दिया गया कि महिला के पिता के विरोध के कारण जोड़े को धमकियां मिल रही थीं, जिसके कारण उन्हें कोर्ट से सुरक्षा मांगनी पड़ी।

    जोड़े को सुरक्षा देते हुए कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता वयस्क हैं और उन्होंने स्वेच्छा से एक-दूसरे से शादी करने और अपना जीवन एक साथ बिताने का फैसला किया है। ऐसी स्थिति में, न तो समाज, न सरकार, और न ही उनके परिवार के सदस्य, रिश्तेदार या दोस्त किसी भी तरह से याचिकाकर्ताओं के फैसले में दखल दे सकते हैं।

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    कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं के जीवन और स्वतंत्रता को खतरा नहीं पहुंचाया जा सकता। कोर्ट ने निर्देश दिया कि जोड़े को जरूरी पुलिस सुरक्षा दी जाए और जरूरत पड़ने पर उन्हें संबंधित पुलिस स्टेशन के SHO या बीट अधिकारी से सीधे संपर्क करने की अनुमति दी जाए। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि अगर याचिकाकर्ता अपना निवास बदलते हैं, तो उन्हें लगातार सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए स्थानीय पुलिस अधिकारियों को सूचित करना होगा।

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