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उपभोक्ता संरक्षण कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती, दिल्ली HC ने केंद्र से मांगा जवाब

Published: Sun, 17 May 2026 10:15 PM (IST)

दिल्ली हाई कोर्ट ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की कुछ धाराओं की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर ...और पढ़ें

दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब। फाइल फोटो

दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब। फाइल फोटो

HighLights

  1. उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 की वैधता को चुनौती।

  2. दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया।

  3. NCDRC के कानूनी प्रश्न तय करने के अधिकार पर सवाल।

जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की कुछ धाराओं की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ ने केंद्र सरकार और उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय को छह सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। मामले की अगली सुनवाई 23 सितंबर 2026 को होगी।

याचिकाकर्ता एन. प्रियंवदा और अन्य की ओर से दायर की गई है, जिसमें उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 51(2), 51(3) और 51(4) के साथ-साथ उपभोक्ता आयोग प्रक्रिया विनियम, 2020 के विनियम 12 को चुनौती दी गई है।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इन प्रविधानों के जरिए राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (एनसीडीआरसी) को महत्वपूर्ण विधिक प्रश्न तय करने और उस पर फैसला देने का अधिकार दिया गया है, जबकि ऐसा अधिकार संवैधानिक रूप से केवल हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जैसे न्यायालयों के पास होना चाहिए।

याचिका में कहा गया कि धारा 51(2) के तहत दूसरी अपील केवल उन मामलों में स्वीकार की जाती है जिनमें महत्वपूर्ण विधिक प्रश्न शामिल हों। वहीं धारा 51(3) और 51(4) एनसीडीआरसी को ऐसे प्रश्न तैयार करने और उन पर निर्णय देने का अधिकार देती हैं। याचिकाकर्ताओं के अनुसार यह व्यवस्था सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 100 के तहत हाई कोर्ट को प्राप्त अधिकारों जैसी है, लेकिन इसमें वैसी न्यायिक सुरक्षा और संवैधानिक संरचना मौजूद नहीं है।

याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि मौजूदा कानून के तहत तकनीकी या गैर-न्यायिक सदस्यों वाली पीठें भी महत्वपूर्ण विधिक प्रश्नों पर फैसला दे सकती हैं। याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों में स्पष्ट किया गया है कि इस प्रकार के न्यायिक अधिकार केवल संवैधानिक अदालतों के पास होने चाहिए।

NCDRC के आदेशों के खिलाफ वैधानिक अपील का प्रविधान नहीं

याचिका में कहा गया कि एनसीडीआरसी के आदेशों के खिलाफ आगे किसी वैधानिक अपील का प्रविधान नहीं होने से स्थिति और गंभीर हो जाती है। याचिकाकर्ताओं ने ऐसे मामलों का भी हवाला दिया, जिनमें गैर-न्यायिक सदस्यों वाली पीठों ने यह कहते हुए दूसरी अपील खारिज कर दी कि उसमें कोई महत्वपूर्ण विधिक प्रश्न नहीं बनता।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि विवादित प्रविधान संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन करते हैं, क्योंकि वे न्यायिक स्वतंत्रता और संस्थागत सुरक्षा के अभाव वाला मनमाना न्यायिक ढांचा तैयार करते हैं।

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