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    आज भी नसबंदी को मर्दाना ताकत की कमजोरी मानते हैं दिल्ली के पुरुष! महिलाओं पर बढ़ा बोझ, रिपोर्ट में खुलासा

    Updated: Sat, 17 Jan 2026 04:19 PM (IST)

    दिल्ली में पुरुष नसबंदी को मर्दानगी की कमजोरी से जोड़ते हैं, जिसके कारण 2024-25 में कुल नसबंदी का केवल 2% पुरुषों द्वारा कराया गया। पिछले चार सालों से ...और पढ़ें

    दिल्ली में पुरुष नसबंदी को मर्दानगी की कमजोरी से जोड़ते हैं, जिसके कारण 2024-25 में कुल नसबंदी का केवल 2% पुरुषों द्वारा कराया गया। एआई जेनरेटेड

    दिल्ली में पुरुष नसबंदी को मर्दानगी की कमजोरी से जोड़ते हैं, जिसके कारण 2024-25 में कुल नसबंदी का केवल 2% पुरुषों द्वारा कराया गया। एआई जेनरेटेड

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    अनूप कुमार सिंह, नई दिल्ली। 21वीं सदी में आधुनिक मेडिकल सुविधाओं, सरकारी प्रोत्साहन योजनाओं और लगातार जागरूकता अभियानों के बावजूद, राष्ट्रीय राजधानी में नसबंदी को लेकर पुरुषों की सोच में कोई बदलाव नहीं आया है। दिल्ली में परिवार नियोजन पर नवीनतम सरकारी आंकड़े सामाजिक सच्चाई को उजागर करते हैं कि पुरुष अभी भी नसबंदी को अपनी मर्दानगी की कमजोरी से जोड़ते हैं।

    वर्ष 2024-25 के दौरान, राजधानी में कुल 14,543 नसबंदी की गईं, लेकिन इनमें से केवल 301 पुरुषों की नसबंदी थी। इसका मतलब है कि लगभग 98 प्रतिशत नसबंदी महिलाओं पर की गईं। यह स्थिति सिर्फ एक साल तक सीमित नहीं है; पिछले चार सालों से दिल्ली में यही ट्रेंड बना हुआ है, जहां पुरुषों की नसबंदी का हिस्सा कभी भी तीन प्रतिशत से ज्यादा नहीं हुआ है।

    पुरुष क्यों डरते हैं नसबंदी से?

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    स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि नसबंदी एक सरल, सुरक्षित और कम जोखिम वाली प्रक्रिया है, जिसे महिलाओं की नसबंदी की तुलना में कहीं कम जटिल माना जाता है। इसके बावजूद, पुरुषों में यह धारणा गहराई से बैठी हुई है कि नसबंदी करवाने से उनकी शारीरिक क्षमता और यौन शक्ति पर असर पड़ता है, एक ऐसी धारणा जिसे मेडिकल साइंस सपोर्ट नहीं करता है।

    सरकार ने समय-समय पर जागरूकता अभियान चलाए हैं। पुरुषों की नसबंदी को बढ़ावा देने के लिए वित्तीय प्रोत्साहन भी दिए गए हैं, लेकिन दिल्ली में जमीनी स्तर पर उनका असर बहुत सीमित दिख रहा है। सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति लंबे समय से महिलाओं पर केंद्रित रही है, जिससे परिवार नियोजन को मुख्य रूप से महिला की जिम्मेदारी के रूप में देखा जाता है।

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    समाजशास्त्रियों का मानना है कि जब तक परिवार नियोजन को एक साझा ज़िम्मेदारी के रूप में पेश नहीं किया जाता और पुरुषों को निर्णय लेने की प्रक्रिया में समान भागीदार नहीं बनाया जाता, तब तक यह असंतुलन बना रहेगा। मौजूदा आंकड़े साफ तौर पर बताते हैं कि समस्या सिर्फ नीतियों की नहीं है, बल्कि सोच और सामाजिक रवैये की है, जिसे बदलना अब सबसे बड़ी चुनौती बन गया है।

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