प्राइवेट स्लीपर बसों में महिलाएं कितनी सुरक्षित? CCTV से पैनिक बटन तक उठी मांग; 3 महीनों में यौन उत्पीड़न के 2 केस
दिल्ली में निजी स्लीपर बसों में महिलाओं की सुरक्षा पर गंभीर सवाल उठ गए हैं, जहां तीन महीनों में यौन ...और पढ़ें

देश की राजधानी दिल्ली में निजी स्लीपर बसों में यात्रियों, विशेषकर महिलाओं की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। एआई इमेज
HighLights
तीन माह में निजी स्लीपर बसों में दो यौन उत्पीड़न के मामले।
बस संचालन में सुरक्षा चूक और नियमों की अनदेखी उजागर हुई।
सीसीटीवी, जीपीएस, पैनिक बटन जैसे तकनीकी सुरक्षा उपाय अनिवार्य।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। देश की राजधानी दिल्ली में निजी स्लीपर बसों में यात्रियों, विशेषकर महिलाओं की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। महज तीन महीनों के भीतर प्राइवेट स्लीपर बसों में यौन उत्पीड़न की दो अलग-अलग घटनाएं सामने आने के बाद बस संचालन में सुरक्षा कमियों और लापरवाही का खुलासा हुआ है। बता दें कि दिल्ली में
इन दो मामलों ने बढ़ाई चिंता
बता दें कि 4 अगस्त को दिल्ली में परी चौक से कश्मीरी गेट तक करीब 47 किलोमीटर के सफर के दौरान दिल्ली की सड़कों पर चलती बस में पीड़िता के साथ लगातार दरिंदगी की गई। वहीं, मई माह में बाहरी दिल्ली के मंगोलपुरी और रानी बाग इलाके में दिल्ली से बिहार चलने वाली एक प्राइवेट स्लीपर बस में 30 वर्षीय महिला के साथ दुष्कर्म का मामला सामने आया था।
सुरक्षा में भारी चूक और नियम-कानूनों की अनदेखी
निजी अंतरराज्यीय (Interstate) बसें बिना किसी कड़े नियमन और जांच के सड़कों पर दौड़ रही हैं।
- चालान और परमिट का उल्लंघन: कई बसों पर यातायात चालान लंबित हैं और परमिट नियमों का लगातार उल्लंघन हो रहा है, फिर भी इन पर कोई सख्त कार्रवाई नहीं हो रही।
- अवैध पिक-अप पॉइंट्स: ये बसें अक्सर अक्षरधाम फ्लाईओवर जैसे अनधिकृत स्थानों पर गाड़ियां रोककर सवारियां भरती हैं।
- तेज रफ्तार और हादसे: ओवरस्पीडिंग, लापरवाही से गाड़ी चलाना और हादसों की घटनाएं आम हो चुकी हैं।
सुरक्षा व्यवस्था पुख्ता करने के लिए उठाए जाएं ये कदम
यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और अपराधियों में डर पैदा करने के लिए प्रशासनिक स्तर पर कई सुधारात्मक उपाय लागू करने की आवश्यकता है...
- केंद्रीय डेटाबेस व पृष्ठभूमि की जांच: चालकों, कंडक्टरों और सहायकों (हेल्पर्स) का एक व्यापक डेटाबेस बनाया जाए और समय-समय पर उनके पुलिस सत्यापन (Background checks) व रिकॉर्ड को अपडेट किया जाए।
- संवेदीकरण व प्रशिक्षण: बाहरी राज्यों के ऑपरेटरों और बस स्टाफ को महिला व बाल सुरक्षा, कानूनी परिणामों और यौन अपराधों से जुड़े कानूनों के प्रति जागरूक किया जाए।
- रात के समय औचक निरीक्षण: पुलिस और परिवहन विभाग द्वारा रात में औचक जांच (Random checks), क्रू वेरिफिकेशन और बसों की फिजिकल चेकिंग की जाए।
- परमिट और चालान का ऑडिट: ड्राइवरों के लंबित चालान और परमिट की नियमित जांच की जाए।
तकनीकी सुरक्षा मानक भी हैं बेहद जरूरी
सुरक्षा में सुधार के लिए बसों के भीतर तकनीकी सुरक्षा उपाय अनिवार्य किए जाने चाहिए। बसों में पूरी तरह चालू हालत में सीसीटीवी कैमरे, जीपीएस ट्रैकिंग और पैनिक बटन की सुविधा होनी चाहिए। इसके अलावा, स्लीपर बर्थ के पर्दों और बंद केबिनों के लिए ऐसे नियम बनाए जाएं ताकि बस के अंदर दृश्यता (विजिबिलिटी) बनी रहे और किसी भी संदिग्ध गतिविधि पर नजर रखी जा सके।
