Trending

    विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

    कैसे शुरू हुई थी हिंसा और 4 दिन तक क्यों सुलगती रही राजधानी? 2020 से अब तक दिल्ली दंगों की पूरी कहानी

    Updated: Tue, 14 Jul 2026 12:04 PM (GMT+05:30)

    फरवरी 2020 में CAA के विरोध और समर्थन के बीच बढ़े तनाव ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली को सांप्रदायिक हिंसा की आग में झोंक दिया, जिसमें 53 लोगों की मौत हुई और ...और पढ़ें

    चार दिनों तक चली हिंसा में 53 लोगों की मौत हो गई थी। फोटो: आर्काइव

    चार दिनों तक चली हिंसा में 53 लोगों की मौत हो गई थी। फोटो: आर्काइव

    HighLights

    1. उत्तर-पूर्वी दिल्ली में 2020 के दंगे चार दिनों तक चले

    2. CAA विरोधी और समर्थक समूहों के बीच हिंसा भड़की थी

    3. अंकित शर्मा हत्याकांड में ताहिर हुसैन समेत पांच दोषी करार

    डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुई सांप्रदायिक हिंसा आज भी स्वतंत्र भारत के सबसे चर्चित दंगों में गिनी जाती है। चार दिनों तक चली इस हिंसा में आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 53 लोगों की मौत हुई।

    700 से अधिक लोग घायल हुए और सैकड़ों घर, दुकानें, वाहन तथा धार्मिक स्थल क्षतिग्रस्त हुए, लेकिन छह साल बाद भी सबसे बड़ा सवाल बरकरार है कि आखिर वह कौन-सी परिस्थितियां थीं, जिन्होंने राजधानी के एक बड़े हिस्से को हिंसा की आग में झोंक दिया?

    Delhi riots

    CAA कानून से शुरू हुई राजनीतिक और सामाजिक खींचतान

    इस कहानी की शुरुआत 11 दिसंबर 2019 से होती है, जब संसद ने नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) पारित किया। केंद्र सरकार ने इसे पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए धार्मिक उत्पीड़न के शिकार गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों को भारतीय नागरिकता देने वाला कानून बताया।

    वहीं, विपक्षी दलों, छात्र संगठनों और कई नागरिक समूहों ने आशंका जताई कि राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के साथ इसके लागू होने से भारतीय मुसलमान प्रभावित हो सकते हैं।

    कानून के विरोध में देशभर में प्रदर्शन शुरू हुए। दिल्ली का शाहीन बाग इन प्रदर्शनों का सबसे बड़ा केंद्र बन गया, जहां 15 दिसंबर 2019 से महिलाओं का धरना लगातार जारी रहा। इस आंदोलन ने देश के कई अन्य हिस्सों में भी ऐसे प्रदर्शनों को जन्म दिया।

    खबरें और भी

    Delhi riots 3

    जाफराबाद से मौजपुर तक: जब आमने-सामने आ गए दो पक्ष

    फरवरी 2020 तक दिल्ली विधानसभा चुनाव समाप्त हो चुके थे, लेकिन CAA विरोधी आंदोलन जारी था। 22 फरवरी की रात उत्तर-पूर्वी दिल्ली के जाफराबाद मेट्रो स्टेशन के नीचे महिलाओं ने धरना शुरू कर दिया। प्रदर्शनकारियों ने सड़क के एक हिस्से को घेर लिया, जिससे यातायात प्रभावित हुआ।

    अगले दिन, 23 फरवरी को पास के मौजपुर चौक पर CAA समर्थक समूह भी जुटने लगे। दोनों पक्षों के बीच नारेबाजी हुई और देखते ही देखते तनाव बढ़ने लगा। शाम तक हालात बिगड़ गए और पत्थरबाजी के बाद हिंसा भड़क उठी।

    Delhi riots 2

    48 घंटे, 7 इलाके और आग की लपटों में घिरी दिल्ली

    अगले 24 से 48 घंटों के भीतर मौजपुर, चांद बाग, भजनपुरा, करावल नगर, शिव विहार, गोकुलपुरी और खजूरी खास समेत उत्तर-पूर्वी दिल्ली के कई इलाके हिंसा की चपेट में आ गए। कई जगहों पर घरों, दुकानों और वाहनों को आग के हवाले कर दिया गया। पुलिसकर्मियों पर हमले हुए और गोलीबारी की घटनाएं भी सामने आईं।

    24 और 25 फरवरी हिंसा के सबसे भयावह दिन साबित हुए। दिल्ली पुलिस और अतिरिक्त अर्धसैनिक बलों की तैनाती के बावजूद कई इलाकों में हालात नियंत्रण से बाहर हो चुके थे। सोशल मीडिया पर वायरल हुए आगजनी और हिंसा के वीडियो बाद में जांच का अहम हिस्सा बने।

    Delhi riots 4

    रतन लाल और अंकित शर्मा की मौत ने बदल दी जांच की दिशा

    इस हिंसा में दिल्ली पुलिस के हेड कॉन्स्टेबल रतन लाल की मौत हो गई, जबकि इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) के कर्मचारी अंकित शर्मा का शव चांद बाग इलाके में मिला। इन दोनों मामलों ने राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक चर्चा छेड़ दी।

    इसके बाद कई मामलों में हत्या, दंगा, आगजनी और आपराधिक साजिश की धाराओं के तहत मुकदमे दर्ज किए गए। अंकित शर्मा हत्याकांड दिल्ली दंगों से जुड़े सबसे चर्चित मामलों में शामिल हो गया।

    Delhi riots 1

    जब जांच पहुंची ‘लार्जर कॉन्सपिरेसी’ के दायरे तक

    हिंसा थमने के बाद दिल्ली पुलिस ने 750 से अधिक एफआईआर दर्ज कीं और हजारों लोगों से पूछताछ शुरू की। जांच के दौरान एक अलग "लार्जर कॉन्सपिरेसी" मामला भी दर्ज किया गया, जिसमें कई छात्र नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं पर यूएपीए समेत विभिन्न धाराओं में आरोप लगाए गए।

    हालांकि, आरोपियों और कई मानवाधिकार संगठनों ने पुलिस जांच की निष्पक्षता पर सवाल उठाए और स्वतंत्र जांच की मांग की। इसके चलते दिल्ली दंगों की जांच और उसके निष्कर्ष लंबे समय तक कानूनी और राजनीतिक बहस का विषय बने रहे।

    छह साल बाद भी अदालतों में जारी है कानूनी लड़ाई

    13 जुलाई 2026 में दिल्ली दंगा मामलों से जुड़े सबसे चर्चित मुकदमों में से एक, आईबी कर्मचारी अंकित शर्मा हत्याकांड में बड़ा फैसला आया। दिल्ली की विशेष अदालत ने पूर्व आम आदमी पार्टी पार्षद ताहिर हुसैन समेत पांच आरोपियों को दोषी करार दिया। इसे 2020 के दंगों से जुड़े हत्या के मामलों में पहली बड़ी दोषसिद्धि माना जा रहा है।

    इसी महीने दिल्ली हाई कोर्ट ने कथित 'लार्जर कॉन्सपिरेसी' मामले में आरोपी अथर खान की जमानत याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि मामले की न्यायिक प्रक्रिया जारी है और गवाहों पर प्रभाव पड़ने की आशंका को देखते हुए जमानत नहीं दी जा सकती।

    इससे पहले जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने इसी मामले में पांच आरोपियों को सशर्त जमानत दी थी, जबकि उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी थीं। अदालत ने कहा था कि दोनों के खिलाफ लगाए गए आरोपों की प्रकृति अन्य सह-आरोपियों से अलग है।

    Delhi riots

    चार दिनों की हिंसा, जिसकी गूंज अब भी सुनाई देती है

    छह साल बाद भी दिल्ली दंगों से जुड़े कई मुकदमे विभिन्न अदालतों में लंबित हैं। अलग-अलग मामलों में सुनवाई और फैसलों की प्रक्रिया जारी है। 2020 की यह हिंसा केवल चार दिनों का दंगा नहीं थी, बल्कि कानून, राजनीति, सामाजिक तनाव और न्यायिक प्रक्रिया के जटिल मेल का ऐसा अध्याय बन गई, जिसकी गूंज आज भी भारतीय न्याय व्यवस्था और सार्वजनिक विमर्श में सुनाई देती है।

    यह भी पढ़ें- AAP पर कपिल मिश्रा का बड़ा हमला; दिल्ली दंगों में ताहिर हुसैन केवल एक्टर, ‘डायरेक्टर’ तक भी पहुंचेगा कानून