दिल्ली बनेगी शंघाई जैसी? हाईराइज बिल्डिंग्स को मिली हरी झंडी, जानिए क्या है नई TOD और FAR पॉलिसी
दिल्ली में जमीन की कमी के चलते नई टीओडी नीति से गगनचुंबी इमारतों के निर्माण का रास्ता खुल गया है। ...और पढ़ें

दिल्ली में अब जमीन की कमी को देखते हुए ऊंचाई की ओर विकास को बढ़ावा देने की तैयारी चल रही है। एआई इमेज
HighLights
दिल्ली में नई टीओडी नीति से ऊंची इमारतों को बढ़ावा।
एफएआर वृद्धि और टीओडी जोन विस्तार से विकास।
विशेषज्ञों ने बुनियादी ढांचे की चुनौतियों पर चिंता जताई।
राज्य ब्यूरो, नई दिल्ली। दिल्ली में अब जमीन की कमी को देखते हुए ऊंचाई की ओर विकास को बढ़ावा देने की तैयारी चल रही है। हालिया नीतिगत सुधारों, जैसे फ्लोर एरिया रेशियो (एफएआर) की सीमाओं को बढ़ाए जाने और ट्रांजिट-ओरिएंटेड डेवलपमेंट (टीओडी) जोनों के विस्तार ने राष्ट्रीय राजधानी में गगनचुंबी इमारतों और बड़े पैमाने पर पुनर्विकास के नए रास्ते खोल दिए हैं। हालांकि, इस बदलाव के साथ ही शहरी नियोजन विशेषज्ञों और आर्किटेक्ट ने कुछ चुनौतियों की ओर भी गंभीरता से इशारा किया है।
क्या है नई नीति और बदलाव?
दिल्ली में तेजी से सिकुड़ती जमीन और आवास की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए सरकार ने बुनियादी नीतिगत बदलाव किए हैं। इन सुधारों के तहत ऊंचे आवासीय टावरों के निर्माण की अनुमति दी जा रही है। विशेषकर मेट्रो काॅरिडोर के पास ट्रांजिट-ओरिएंटेड डेवलपमेंट (टीओडी) के जरिए हाईराइज सोसायटियों को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसका सीधा उद्देश्य लोगों को सीधे मेट्रो कनेक्टिविटी देकर सड़कों पर ट्रैफिक कम करना और जमीन का बेहतर उपयोग सुनिश्चित करना है।
14 भूखंडों की पहचान की गई
इसके तहत दिल्ली में लगभग 207 वर्ग किमी क्षेत्र को इसके दायरे में शामिल किया गया है, जहां किफायती आवास, कार्यालय स्थल एवं स्टूडियो अपार्टमेंट बनाए जा रहे हैं। द्वारका, रोहिणी, पीरागढ़ी और कड़कड़डूमा जैसे प्रमुख मेट्रो काॅरिडोर के पास करीब 14 भूखंडों की पहचान की गई है।
सिंगल-विंडो सिस्टम के माध्यम से अनुमोदन प्रक्रिया को आसान बनाया गया है, ताकि एक ही छत के नीचे जल बोर्ड, एमसीडी, और अग्निशमन विभाग संबंधी मंजूरी मिल सके।
यहां यह भी उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार ने दिल्ली में संशोधित ट्रांजिट ओरिएंटेड डेवलपमेंट (टीओडी) विनियम और शुल्क 2026 को मंजूरी देते हुए इसे छह फरवरी 2026 को अधिसूचित किया था।

विशेषज्ञों ने इन चुनौतियों की ओर किया इशारा
आर्किटेक्ट और नगर नियोजकों के मुताबिक चुनौती यह नहीं है कि दिल्ली में कितनी ऊंची इमारतें बनाई जा सकती हैं। असली चुनौती यह है कि क्या दिल्ली की सड़कें, पानी की आपूर्ति, सीवरेज/ड्रेनेज सिस्टम और सार्वजनिक परिवहन इस नई आबादी का बोझ झेलने के लिए तैयार हैं?
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि मोहल्ला या क्षेत्र स्तर पर सटीक योजना नहीं बनाई गई तो ऊंची इमारतों में रहने आने वाली घनी आबादी पहले से ही जर्जर एवं भीड़भाड़ वाले बुनियादी ढांचे पर और अधिक दबाव डाल देगी।
केवल मुनाफे और निर्माण पर ध्यान
आर्किटेक्ट और डीडीए के पूर्व योजना आयुक्त अशोक कुमार जैन ने इस नीति पर बात करते हुए कहा, 'दिल्ली इस समय अपने शहरी विकास के एक दिलचस्प मोड़ पर है। जमीन की बढ़ती कीमतों और सीमित जगह के कारण अधिक एफएआर और टीओडी आधारित विकास एक स्वाभाविक कदम है।'
हालांकि उन्होंने सतर्क करते हुए यह भी कहा कि पुनर्विकास केवल इस बात पर केंद्रित नहीं होना चाहिए कि नीति से कितना अतिरिक्त निर्माण क्षेत्र या आर्थिक लाभ मिल रहा है। चर्चा इस पर भी अवश्य होनी चाहिए कि नई आबादी वहां के स्थानीय संसाधनों पर क्या प्रभाव डालेगी।
बिना योजना के बढ़ सकती है मुश्किल
जैन के अनुसार यदि बुनियादी ढांचे (सड़कें चौड़ी करना, पानी की पाइपलाइन बढ़ाना, ड्रेनेज सिस्टम दुरुस्त करना) में समानांतर निवेश नहीं किया गया तो ऊंची इमारतें दिल्ली के रिहायशी इलाकों को कंक्रीट के जंगल में बदल सकती हैं। जहां पानी की किल्लत, सड़कों पर भारी जाम, जलभराव जैसी समस्याएं रोज का हिस्सा बन जाएंगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि दिल्ली को शंघाई अथवा अन्य वैश्विक शहरों की तरह ऊंचा तो बनाया जा सकता है, लेकिन इसके लिए केवल नियमों को उदार बनाना काफी नहीं है बल्कि धरातल पर नागरिक सुविधाओं को भी उसी रफ्तार से अपग्रेड करना होगा।
