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    दिल्ली में नकली दवाओं का बड़ा नेटवर्क: इंसुलिन और महंगी दवाओं में डिस्टिल्ड वाटर-स्टार्च भरने का खुलासा

    Updated: Fri, 01 May 2026 04:09 AM (GMT+05:30)

    राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में नकली दवाओं का नेटवर्क बढ़ गया है, जहां महंगी दवाओं में असली तत्वों की जगह सलाइन और स्टार्च जैसे सस्ते पदार्थ भरे जा रहे ह ...और पढ़ें

    राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में नकली दवाओं का नेटवर्क बढ़ गया है। फाइल फोटो

    राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में नकली दवाओं का नेटवर्क बढ़ गया है। फाइल फोटो

    HighLights

    1. नकली दवाओं में सलाइन, स्टार्च का उपयोग।

    2. दिल्ली में मरीजों की जान से खिलवाड़।

    3. हजारों दवा सैंपल गुणवत्ता में फेल पाए गए।

    अनूप कुमार सिंह, नई दिल्ली। नकली दवाओं का नेटवर्क राष्ट्रीय राजधानी में अब एक ऐसे स्तर पर पहुंच गया है, जहां महंगी और लाइफ-सेविंग दवाओं में असली दवा तत्व (एपीआइ) व इंसुलिन की जगह सलाइन, डिस्टिल्ड वाटर और स्टार्च जैसे सस्ते पदार्थ भर मरीजों की जान से खिलवाड़ किया जा। रहा है।

    दवाओं की जांच कर रहीं एजेंसियों के अनुसार यह केवल मिलावट नहीं, बल्कि पूरी तरह से नकली दवा का मामला है। जिसमें दवा का बाहरी रूप असली होता है, लेकिन अंदर की सामग्री बेअसर या खतरनाक होती है। नकली दवाओं का यह नेटवर्क अब सिर्फ आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि मरीजों पर मुनाफे का खतरा बन गया है, जहां उपचार की जगह मरीजों को धोखा मिल रहा है।

    केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) की फरवरी 2026 की ड्रग अलर्ट रिपोर्ट में देशभर में 194 दवा गुणवत्ता परीक्षण में फेल (एनएसक्यू) पाई गईं, पैरासिटामोल व पेंटाप्राजोल जैसी आम दवा भी इनमें शामिल थीं।

    स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर संसद में दिए गए आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार अप्रैल 2024 से मार्च 2025 के बीच 3,104 दवा सैंपल ‘नाट ऑफ स्टैंडर्ड क्वालिटी (एनएसक्यू)’ पाए गए, यानी वे निर्धारित गुणवत्ता मानकों पर खरे नहीं उतरे। इसके अलावा दिसंबर 2025 में अकेले 167 सैंपल फेल पाए गए, जो यह दर्शाता है कि समस्या लगातार बनी हुई है।

    ऐसी नकली दवाओं का बड़ा खतरा यह है कि मरीज को यह एहसास ही नहीं होता कि वह असली उपचार से वंचित है। कैंसर के मरीजों में इससे उपचार बेअसर हो जाता है, जबकि डायबिटीज के मरीजों में ब्लड शुगर नियंत्रण बिगड़ जाता है। एंटीबायोटिक्स के मामले में यह संक्रमण को बढ़ाने और दवा-प्रतिरोध (एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस) का कारण बन सकता है।

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    विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार निम्न और मध्यम आय वाले देशों में लगभग 10 प्रतिशत तक दवा सबस्टैंडर्ड या फाल्सिफाइड पाई जाती हैं, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है।

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