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    रील्स, AI, फेस्ट और दोस्ती... Gen-Z के लिए DU बना ‘रियल एडल्टिंग’ की पाठशाला

    Updated: Sat, 08 Aug 2026 06:55 AM (IST)

    दिल्ली विश्वविद्यालय में नए सत्र की शुरुआत के साथ ही जेन-जी छात्र कैंपस लाइफ को नए अंदाज में जी रहे हैं, जहां पढ़ाई के साथ-साथ फैशन, सोशल नेटवर्किंग औ ...और पढ़ें

    लेडी श्रीराम कॉलेज में क्लास से पहले फिट करना भी जरूरी है। जागरण

    लेडी श्रीराम कॉलेज में क्लास से पहले फिट करना भी जरूरी है। जागरण


    HighLights

    1. डीयू में जेन-जी छात्र पढ़ाई के साथ 'लाइफ एक्सपीरियंस' चाहते हैं।

    2. कैंपस लाइफ में फैशन, डिजिटल लर्निंग और सोशल स्पेस का महत्व।

    3. छात्र राजनीति, फेस्ट और नेटवर्किंग से बनती है डीयू की पहचान।

    शालिनी देवरानी, नई दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय में नया सेशन शुरू होते ही राजधानी की रफ्तार एक बार फिर तेज हो चुकी है। नार्थ कैंपस की चहल-पहल हो या साउथ कैंपस की रौनक, लाल ईंटों वाली इमारतों के बीच कंधों पर बैग टांगे नए चेहरे, कैंटीन की पहली चाय के साथ शुरू होती दोस्ती, मेट्रो से उतरते छात्रों की उत्सुक निगाहें और हर कोने में भविष्य के सपनों की हलचल... डीयू फिर उसी जीवंत अंदाज में लौट आया है, जिसके लिए वह देशभर में जाना जाता है।

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    हर साल नया बैच अपने साथ नई सोच, नए ट्रेंड और नई एनर्जी लेकर आता है, लेकिन जेन-जी ने डीयू की कैंपस लाइफ का अंदाज भी बदल दिया है। वह कालेज सिर्फ पढ़ाई और डिग्री के लिए नहीं, बल्कि पूरा ‘लाइफ एक्सपीरियंस’ लेने आते है। कैंटीन की चाय, लाइब्रेरी की खामोशी, सोसाइटी की हलचल, फेस्ट का ग्लैमर, हास्टल-पीजी की यारी और और इंटर्नशिप से करियर की प्लानिंग- सब इस सफर का हिस्सा हैं।

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    यूथ के बीच उनके बीच यह चर्चा कम सुनाई देती है कि कौन-सी किताब खरीदनी है, यह ज्यादा सुनाई देता है कि कौन-सी सोसायटी सबसे सक्रिय है, किस कैंटीन की चाय बेस्ट है, किस डिपार्टमेंट का फेस्ट ग्रांड होता है और किस कालेज का कल्चर सबसे अलग है।

    मेट्रो से कैंपस तक... हर सुबह नई कहानी

    सुबह-सुबह विश्वविद्यालय या धौला कुआं मेट्रो स्टेशन पर उतरते ही अलग-सी रौनक दिखाई देती है। कंधे पर लैपटाप बैग, हाथ में काफी, कानों में ईयरबड्स और चेहरे पर नई उम्मीदें... यही है आज के डीयू स्टूडेंट की पहचान। सुबह की मेट्रो में ही आधा कैंपस मिल जाता है।

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    कोई कॉलेज का टाइम-टेबल देखता मिलेगा, कोई गाने सुनता, कोई दोस्तों के साथ सेल्फी लेता, तो कोई दोस्तों के साथ हंसी-ठिठोली करता। स्टेशन से बाहर निकलते ही दोस्तों की आवाज आती है-'अरे... इधर, यहीं हैं हम।' फिर शुरू होता है कैंपस तक पैदल जाने का सफर। फ्रेशर्स के लिए हर बिल्डिंग, हर लान और हर चाय की टपरी एक नई खोज जैसा लगता है।

    फैशन... क्योंकि 'फर्स्ट इम्प्रेशन' है जरूरी

    डीयू का फैशन हमेशा चर्चा में रहता है, लेकिन अब यह पहले से कहीं ज्यादा बोल्ड, क्रिएटिव और पर्सनल हो गया है। ओवरसाइज्ड टी-शर्ट, कार्गो पैंट्स, स्नीकर्स, टोट बैग, सिल्वर ज्वेलरी, थ्रिफ्ट फैशन और इंडो-वेस्टर्न लुक... यहां सिर्फ ट्रेंड नहीं, बल्कि जेन-जी का स्टाइल स्टेटमेंट बन चुका है।

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    यहां हर कॉलेज की अपनी अलग वाइब है और हर छात्र अपने पहनावे से अलग पहचान बनाना चाहता है। इंस्टाग्राम पर ओओटीडी यानी आउटफिट आफ द डे पोस्ट करना, क्लास के बाद रील शूट करना रूटीन का हिस्सा बन चुका है। कैंपस में यह आवाज अक्सर आपको सुनाई देगी 'अरे यार फोटो क्लिक कर दे... लाइट अच्छी आ रही है।'

    क्लासरूम से कैंटीन तक होती असली कन्वर्सेशन

    क्लास खत्म होते ही अगला पड़ाव होती है कैंटीन। एक चाय और चार दोस्त... फिर बातें शुरू। 'असाइनमेंट कब जमा करना है?', 'इंटर्नशिप कहां मिली?', 'वीकेंड पर हडसन लेन चलते हैं?' या फिर 'चलो, आज एक क्लास बंक कर देते हैं।' चाय कब ठंडी हो जाती है, पता ही नहीं चलता।

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    कई बार सबसे अच्छे आइडिया, सबसे मजबूत फ्रेंडशिप और सबसे लंबी बहस इसी कैंटीन की टेबल पर जन्म लेती हैं। यहां असाइनमेंट से लेकर रिलेशनशिप, करियर, यूपीएससी, एमबीए, स्टार्टअप, फिल्मों, क्रिकेट और वीकेंड प्लान तक हर विषय पर खुलकर चर्चा होती है। यही अनौपचारिक बातचीत डीयू की असली पहचान है। डीयू में कैंटीन सिर्फ खाने की जगह नहीं, बल्कि सबसे बड़ा सोशल स्पेस है।

    नोट्स से डिजिटल वर्ल्ड तक...बदला पढ़ाई का अंदाज

    आज जेन-जी के लिए पढ़ाई सिर्फ बुक्स और फोटोकॉपी वाले नोट्स तक सीमित नहीं है। अब चैटजीपीटी, एआइ टूल्स, आनलाइन जर्नल, डिजिटल नोट्स, गूगल स्कालर और वर्चुअल स्टडी ग्रुप्स पढ़ाई का अहम हिस्सा बन चुके हैं। वाट्सएप ग्रुप पर नोट्स शेयर होते हैं, गूगल ड्राइव पर पूरी क्लास का स्टडी मटीरियल मौजूद रहता है और प्रेजेंटेशन से लेकर रिसर्च तक हर काम तकनीक की मदद से आसान हो गया है।

    लाइब्रेरी में भी कोई लैपटॉप पर प्रेजेंटेशन बनाता दिखेगा, कोई टैबलेट पर नोट्स लिखता, तो कोई कहता दिखेगा- 'पीडीएफ भेज देना यार।' लाइब्रेरी की खामोशी अब लैपटाप की स्क्रीन की रोशनी से भी जुड़ गई है। पढ़ाई का तरीका बदला है, लेकिन सीखने की रफ्तार पहले से कहीं तेज हो गई है।

    पीजी और हॉस्टल में शुरू होती 'रियल एडल्टिंग'

    डीयू में कश्मीर से कन्याकुमारी तक, गुजरात से अरुणाचल तक और छोटे कस्बों से लेकर महानगरों तक...देश के विभिन्न हिस्सों से युवा आते हैं। हॉस्टल के अलावा सत्य निकेतन, विजय नगर, कमला नगर, रूप नगर, नेब सराय, कालकाजी के पीजी में रहने वालों के लिए डीयू सिर्फ कॉलेज नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर बनने की पहली पाठशाला भी है और यही लाइफ उन्हें जिम्मेदार बनाती है।

    पहली बार खुद का बजट संभालना, महीने के आखिरी दिनों में खर्च का हिसाब, देर रात वाली मैगी, रूममेट के साथ छोटी-मोटी नोकझोंक और फिर उसी के साथ हंसना, वीकेंड पर दिल्ली घूमने का प्लान, इंडिया गेट पर रात की सैर, सरोजिनी नगर, कमला नगर और जनपथ में शापिंग और आखिर में दोस्तों से कहना-'यार, इस बार तू ट्रीट दे दे मेरा बजट थोड़ा टाइट है।' यही छोटे-छोटे पल जिंदगी भर की यादें बन जाते हैं। रूममेट धीरे-धीरे दोस्त से परिवार बन जाता है और हास्टल या पीजी का कमरा दूसरा घर।

    रील्स, नेटवर्किंग और पर्सनल ब्रांडिंग पर फोकस

    नई पीढ़ी के लिए कालेज सिर्फ डिग्री पाने की जगह नहीं, अपना पोर्टफोलियो तैयार करने का समय भी है, ऐसे में स्टूडेंट डिजिटल दुनिया में भी पहचान बनाते हैं। इंस्टाग्राम पर रील, लिंक्डइन पर नई उपलब्धि, यूट्यूब पर व्लाग , पॉडकास्ट, स्टार्टअप, फ्रीलांसिंग और इंटर्नशिप... जेन-जी जानते है कि आज की दुनिया में सिर्फ मार्क्स नहीं, स्किल्स और विजिबिलिटी भी मायने रखती है।

    ऐसे में कालेज अब अपना प्रोफाइल बनाने की जगह भी बन चुका है। ऐसे में युवा अब इंटरनेट मीडिया को सिर्फ एंटरटेनमेंट के लिए नहीं, बल्कि सीखने, नेटवर्किंग और खुद को पहचान दिलाने के प्लेटफार्म के तौर पर भी इस्तेमाल करते हैं।

    डीयू फेस्ट और इलेक्शन में धड़कती कैंपस की जान

    अगस्त में सत्र की शुरुआत हुई है और कुछ दिनों बाद कैंपस का रंग एक बार फिर बदलेगा। छात्र संगठन फ्रेंशर्स के बीच अपनी मौजूदगी दर्ज कराएंगे। पोस्टर, नुक्कड़ संवाद, घोषणापत्र और चुनावी चर्चाएं कैंपस की हवा में घुलने लगेंगी। नए छात्र इसी में पहली बार इतने करीब से छात्र राजनीति और लोकतंत्र का रंग देखते हैं।

    इसके बाद शुरू होगा कल्चरल फेस्टिवल का दौर। डीयू का जिक्र उसके सोसायटी कल्चर और फेस्ट्स के बिना मानो अधूरा है। कहीं डांस प्रैक्टिस, कहीं थिएटर की रिहर्सल, कहीं गिटार की धुन...सालभर कैंपस में किसी न किसी कालेज का फेस्ट इसे वाइब्रेंट रखता है। इस दौरान यूथ का फोकस इसी चैकलिस्ट पर रहता है कि किस कालेज में कौन सा ग्रुप या सिंगर लाइव परफार्म करने वाला है।

    समय बदला, पीढ़ियां बदली और ट्रेंड्स भी, लेकिन डीयू की खूबसूरती आज भी वही है। यहां कोई पहली बार घर से दूर रहना सीखता है, कोई पहली बार स्टेज पर तालियां बटोरता है, कोई पहली बार चुनावी बहस सुनता है और कोई पहली बार खुद पर भरोसा करना सीखता है।

    यही वजह है कि दिल्ली विश्वविद्यालय का सफर हमेशा साथ रहता है। यहां से निकलने वाले छात्र अपने साथ सिर्फ मार्कशीट नहीं, उम्रभर ही दोस्ती, अनगिनत यादें, खूबसूरत अनुभव और जिंदगी भर सुनाने लायक सैकड़ों किस्से लेकर जाते हैं। शायद यही 'डीयू लाइफ' की सबसे बड़ी खूबसूरती है।

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