IB अधिकारी हत्याकांड: दंगे से जुड़े मामलों में पहली बार उम्रकैद, पीड़ितों में जगी न्याय की उम्मीद
अंकित शर्मा हत्याकांड में पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन सहित पांच दोषियों को उम्रकैद की सजा मिलने के बाद दिल्ली दंगा पीड़ितों में न्याय की उम्मीद जगी है। य ...और पढ़ें

दिल्ली दंगा।
HighLights
अंकित शर्मा हत्याकांड में पांच दोषियों को उम्रकैद की सजा।
दिल्ली दंगों का पहला बड़ा मर्डर केस जिसमें फैसला आया।
पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन भी उम्रकैद की सजा पाने वालों में।
जागरण संवाददाता, पूर्वी दिल्ली। उत्तर पूर्वी दिल्ली दंगों के करीब छह साल बाद आईबी कर्मी अंकित शर्मा हत्याकांड में अदालत का बड़ा फैसला सामने आने के बाद अन्य पीड़ित परिवारों में फिर से न्याय की उम्मीद जगी है।
अंकित की हत्या में अदालत ने पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन समेत पांच दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई है। यह दंगों से जुड़े मामलों में पहला बड़ा और चर्चित मर्डर केस है, जिसमें दोषियों को सजा मिली है। दंगों में 53 लोगों ने जान गई थी, इनमें से ज्यादातर के परिजनों को अब भी न्याय का इंतजार है।
सबूतों के आधार पर आरोप साबित
अदालत ने अपने फैसले में माना कि अंकित शर्मा की हत्या एक हिंसक भीड़ द्वारा की गई, जिसमें दोषी शामिल थे। उनका शव दंगों के दौरान नाले से बरामद हुआ था और जांच के दौरान कई गवाहों, तकनीकी साक्ष्यों और परिस्थितिजन्य सबूतों के आधार पर आरोप साबित हुए।
इस फैसले को इसलिए भी अहम माना जा रहा है, क्योंकि दंगों से जुड़े कई गंभीर मामलों में अब तक अंतिम फैसला नहीं आ पाया था। हालांकि, अदालत ने इसे रेयरेस्ट ऑफ द रेयर मानने से इनकार किया और फांसी की सजा नहीं दी, लेकिन उम्रकैद का फैसला यह संकेत देता है कि गंभीर मामलों में सख्त सजा संभव है।
कुछ अन्य मामलों में भी हो चुकी है सजा
अंकित शर्मा केस के अलावा दंगों के शुरुआती दौर में एक मामले में 9 आरोपियों को दोषी ठहराया गया था। इस मामले में आरोप था कि ये लोग भीड़ का हिस्सा बनकर सांप्रदायिक तनाव के बीच संपत्तियों को नुकसान पहुंचा रहे थे। अदालत ने कहा था कि इनका उद्देश्य अधिकतम नुकसान करना था और सभी को जेल की सजा सुनाई गई।
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इसके अलावा एक अन्य मामले में दंगे के दौरान तोड़फोड़ और हिंसा में शामिल एक आरोपी को भी अदालत ने दोषी ठहराते हुए करीब पांच साल की सजा सुनाई थी। यह मामला दंगों में शुरुआती सजा के रूप में देखा गया, जिसमें भीड़ के साथ मिलकर हिंसा और नुकसान पहुंचाने का आरोप साबित हुआ। इन फैसलों के बावजूद हकीकत यह है कि दंगों से जुड़े अधिकांश मामले अब भी अदालतों में लंबित हैं।