देश पर भारी पड़ रहा प्लास्टिक कचरा: रोजाना निकलता है 19 हजार टन प्लास्टिक, नगर निगमों पर बढ़ रहा आर्थिक बोझ
भारतीय शहरों को प्रतिदिन निकलने वाले 19,000 टन प्लास्टिक कचरे की सफाई का भारी आर्थिक बोझ उठाना पड़ता है, जबकि प्लास्टिक उत्पादक कंपनियां इसका बहुत कम हिस्सा चुकाती हैं।

नगर निकायों पर प्लास्टिक कचरा सफाई का बढ़ता आर्थिक बोझ। (एआई जेनरेटेड इमेज)
HighLights
भारत में प्रतिदिन 19,000 टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न होता है।
नगर निकाय प्लास्टिक कचरा सफाई का भारी आर्थिक बोझ उठाते हैं।
कंपनियाँ 'प्रदूषक भुगतान करे' सिद्धांत का पूरा पालन नहीं करतीं।
संजीव गुप्ता, नई दिल्ली। दूध का पैकेट, चिप्स का रैपर या ऑनलाइन डिलीवरी का बॉक्स- इस्तेमाल के तुरंत बाद कचरे में बदल जाने वाली इस प्लास्टिक पैकेजिंग का असल आर्थिक बोझ देश की नगरपालिकाएं, करदाता और अनौपचारिक क्षेत्र के सफाई कर्मचारी उठा रहे हैं।
पर्यावरण शोध संस्था ''सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट'' (सीएसई) की नई रिपोर्ट 'पॉलिसी, प्रैक्टिस, एंड प्लास्टिक : कॉस्ट ऑफ मैनेजिंग प्लास्टिक वेस्ट इन इंडियन सिटीज' में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। इसके मुताबिक भारतीय शहरों को प्लास्टिक कचरा साफ करने में बहुत ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ता है, जबकि प्लास्टिक बनाने वाली कंपनियां इसका बहुत छोटा सा हिस्सा ही चुकाती हैं।
हर रोज के कचरे में लगभग 19,000 टन केवल प्लास्टिक
भारत में हर दिन जितना भी कचरा निकलता है, उसमें से लगभग 19,000 टन केवल प्लास्टिक होता है। इसमें सबसे ज्यादा हिस्सा दूध के पैकेट, चिप्स के रैपर और आनलाइन सामान की पैकेजिंग का होता है। इस कचरे को सड़कों से उठाने, छांटने और रिसाइकिल करने में नगर निगमों का बहुत सारा पैसा खर्च होता है।
रिपोर्ट के मुताबिक पहाड़ों और दूर-दराज के इलाकों में यह मुसीबत और ज्यादा है। धर्मशाला (हिमाचल) में पहाड़ी इलाका होने के कारण कचरा संभालने में लगभग नौ रुपए प्रति किलो का खर्च आता है, लेकिन कंपनियाँ सिर्फ एक प्रति किलो ही देती हैं (यानी कुल खर्च का सिर्फ 13-14 प्रतिशत)। अंडमान (पोर्ट ब्लेयर) जैसे द्वीप में यही खर्च 10 से 12 रुपए प्रति किलो तक पहुँच जाता है, जबकि इंदौर जैसे मैदानी शहरों में यह खर्च दो से चार रुपए प्रति किलो आता है। दिल्ली जैसे महानगरों की स्थिति भी बड़ी दयनीय है।
असंगठित सफाई कर्मचारियों को भी इसका सही मेहनताना नहीं मिल पाता
पर्यावरण नियम (ईपीआर) के तहत 'जो कचरा फैलाएगा, वही सफाई का पैसा देगा' का सिद्धांत लागू होना चाहिए। लेकिन कंपनियां बहुत कम पैसा देकर निकल जाती हैं। कंपनियों से पूरा पैसा न मिलने की वजह से बचा हुआ घाटा नगर निगमों को जनता के टैक्स के पैसों से भरना पड़ता है। साथ ही, दिन-रात कूड़ा बीनने वाले असंगठित सफाई कर्मचारियों को भी इसका सही मेहनताना नहीं मिल पाता।
सीएसई ने सुझाव दिया है कि पहाड़ों और द्वीपों जैसे कठिन इलाकों में सफाई का खर्च ज्यादा होने के कारण कंपनियों से ज्यादा पैसा लिया जाना चाहिए। कंपनियां जिस शहर या राज्य में सामान बेचती हैं, उन्हें अपने सफाई फंड का हिस्सा उसी इलाके के नगर निगम को देना चाहिए।
इसके अलावा, कूड़ा बीनने वाले सफाई कर्मचारियों को इस व्यवस्था से जोड़कर सीधे आर्थिक मदद दी जानी चाहिए। जब तक सामान बेचने वाली कंपनियां अपने प्लास्टिक कचरे को साफ करने का पूरा खर्चा नहीं उठाएंगी, तब तक हमारे शहर साफ नहीं हो पाएंगे और नगर निगमों पर आर्थिक बोझ बना रहेगा।

