विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

बदलती सरकारें और बदलता इतिहास, बच्चों के भविष्य से यह कैसा खिलवाड़?

Published: Wed, 08 Jul 2026 07:08 PM (IST)

जम्मू-कश्मीर में स्कूल की किताबों में अलगाववादियों को 'शहीद' बताने जैसे विवादों ने शिक्षा व्यवस्था में राजनीतिक हस्तक्षेप को उजागर ...और पढ़ें

सांकेतिक तस्वीर, एआई जनरेटेड।

सांकेतिक तस्वीर, एआई जनरेटेड।

HighLights

  1. जम्मू-कश्मीर में किताबों में अलगाववादियों को 'शहीद' बताया गया।

  2. देशभर में पाठ्यपुस्तकों में गंभीर गलतियां और भ्रामक जानकारी।

  3. बदलते इतिहास से बच्चों की सोचने की क्षमता प्रभावित होती है।

मनु त्यागी, नई दिल्ली। हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था, विशेष रूप से पाठ्यक्रम से जुड़ी विसंगतियां प्राय: सामने आती रही हैं। इसी क्रम में हाल ही में जम्मू-कश्मीर में स्कूल पुस्तकालय की पुस्तकों को लेकर उपजा विवाद इस बात का एक और प्रमाण है कि किस तरह शैक्षणिक सामग्री को राजनीतिक और वैचारिक लाभ के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश की जा रही है।

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के बीच जो सबसे गंभीर सवाल अनसुना रह जाता है, वह यह है कि सत्ता के बदलने के साथ इतिहास की पुस्तकों में होने वाली यह 'उठापटक' क्या देश के बच्चों के भविष्य के लिए सही है? जम्मू-कश्मीर के सरकारी स्कूलों की लाइब्रेरी में 'समग्र शिक्षा योजना' के तहत पुस्तकें बांटी गईं।

'पर्सनालिटीज एंड लीजेंड्स आफ जेएंडके' और 'ग्रेट पर्सनालिटीज आफ जम्मू एंड कश्मीर' नामक पुस्तकों में प्रतिबंधित अलगाववादी नेताओं और सजायाफ्ता आतंकियों (मकबूल भट्ट और मसर्रत आलम) को 'शहीद' और 'महान नायक' के रूप में पेश कर दिया गया।

पुस्तकों में इस क्षेत्र के लिए 'इंडियन आक्यूपाइड कश्मीर' जैसे आपत्तिजनक शब्दों का उपयोग किया गया था। घटनाक्रम बढ़ता देख, जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने कार्रवाई करते हुए शिक्षा विभाग के आठ अधिकारियों को निलंबित कर दिया, उच्च स्तरीय जांच के आदेश दिए और किताबों को वापस लिया गया।

भारतीय जनता पार्टी ने इसे 'अकादमिक जिहाद' बताया और कांग्रेस सहित अन्य स्थानीय दलों ने भी इसकी कड़ी निंदा करते हुए इसे बच्चों के दिमाग को भटकाने की एक गहरी साजिश माना। इससे पहले जम्मू-कश्मीर गृह विभाग ने घाटी में 25 ऐसी किताबों को जब्त और प्रतिबंधित किया था, जो युवाओं के मानस में पीड़ित होने की भावना और आतंकवाद जैसी विसंगतियों को बढ़ावा दे रही थीं।

इन प्रतिबंधित किताबों में अरुंधति राय की 'आजादी', एजी नूरानी की 'द कश्मीर डिस्प्यूट' और सुमंत्र बोस की 'कांटेस्टेड लैंड्स' जैसी पुस्तकें शामिल थीं, जिन पर इतिहास को विकृत करने और अलगाववाद भड़काने के गंभीर आरोप थे।

ये घटनाएं दिखाती हैं कि संवेदनशील क्षेत्रों में शिक्षा को किस तरह अलगाववादी और देश विरोधी विमर्श को जिंदा रखने का माध्यम या कह सकते हैं 'हथियार' बनाया जा रहा है।

संस्थानिक अन्यमनस्कता

यह समस्या केवल जम्मू-कश्मीर या किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है। हमारे देश में यह एक तरह से अघोषित नियम सा बन चुका है कि जैसे ही देश या किसी राज्य में सरकार बदलती है, तो इतिहास का पाठ्यक्रम बदलने का उपक्रम शुरू हो जाता है।

निश्चित ही विसंगतियां दूर करना जरूरी है। जो गलत पढ़ाया जा रहा है, उसके एवज में तथ्यों को सही दिशा में पेश करना जरूरी है। ओडिशा में राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत पहली से आठवीं कक्षा तक की नई पुस्तकों में 1,678 गंभीर गलतियां पाई गईं।

विज्ञानी आइजक न्यूटन को हम 'महान पायलट' बता रहे हैं, हंपी मंदिर को कोणार्क सूर्य मंदिर दिखा रहे हैं और नियामगिरि पहाड़ियों को झारखंड में दर्शा रहे हैं। ये तो भ्रामक जानकारियां हैं।

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद की कक्षा आठ की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार को लेकर एकतरफा और भ्रामक टिप्पणी जोड़ी गई थी।

इस पर सर्वोच्च न्यायालय ने संज्ञान लेते हुए इसे संस्थान की छवि धूमिल करने का प्रयास माना और किताबों की छपाई व डिजिटल वितरण पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था, जिसके बाद एनसीईआरटी को बिना शर्त माफी मांगनी पड़ी। इससे पूर्व में भारतीय धावक मिल्खा सिंह की जगह फरहान अख्तर की तस्वीर प्रकाशित कर दी गई थी।

अब ये छात्रों के लिए पुस्तक तैयार करने में लगे जिम्मेदार विभागों की अन्यमनस्कता का ही प्रमाण है कि हम भविष्य के लिए जो गढ़ रहे हैं उसे भी कैसी हड़बड़ाहट में तैयार किया जा रहा है या ऐसे हाथों में जिम्मेदारी सौंपी गई, जो शैक्षिक प्रणाली से, इतिहास से स्वयं ही अनभिज्ञ थे।

वस्तुत: इतिहास साक्ष्यों पर आधारित एक विज्ञान है। जब बच्चों को केवल एकतरफा इतिहास पढ़ाया जाता है, तो उनकी स्वतंत्र रूप से सोचने, सवाल करने और विश्लेषण करने की क्षमता खत्म हो जाती है। वे नागरिक के बजाय किसी एक विचारधारा के अनुयायी बनने लगते हैं।

सोचिए उस छात्र के बारे में जिसने कक्षा आठ में एक खास तरह का इतिहास पढ़ा, लेकिन कालेज पहुंचते ही या सरकार बदलते ही उसे बताया गया कि जो उसने पढ़ा वह गलत या आधा सच था। इससे छात्रों के भीतर पूरी शिक्षा व्यवस्था और ऐतिहासिक तथ्यों के प्रति गहरा अविश्वास पैदा होता है।

भारतीय छात्रों को आज दुनिया के सर्वश्रेष्ठ दिमागों से मुकाबला करना है। यदि हमारे छात्र इतिहास की बुनियादी समझ या ऐतिहासिक सच्चाइयों से महरूम रहेंगे, तो कहीं न कहीं वैश्विक अकादमिक जगत में भी उनकी शैक्षिकता प्रभावित होगी। स्कूली बच्चों के कच्चे दिमाग में पुस्तकों के जरिये जो वैचारिक बीज बोए जाते हैं, वे बड़े होकर समाज में नफरत या अलगाव की गहरी खाई तैयार करते हैं।

विशेषज्ञों की निगरानी

जब एक विद्यार्थी अपनी ही संस्कृति और इतिहास को हीन और विदेशी आक्रांताओं या अलगाववादी ताकतों को महान समझने लगता है, तो वह बौद्धिक रूप से देश के खिलाफ खड़ा होने लगता है। इस वैचारिक और तथ्यात्मक भटकाव को रोका जाना जरूरी है। इतिहास पूरी निष्पक्षता, सत्यता और साक्ष्यों के आधार पर लिखा जाना चाहिए।

यह भी पढ़ें- NCERT की पुस्तकों में संशोधन: हिटलर के संदर्भ हटाए गए, विभाजन पर कांग्रेस के रुख में बदलाव किया गया


देश और दुनिया की ताजा खबरों के लिए Hindi News देखें। Live Cricket Score , IPO Listings, Shiv Chalisa, राशिफल और दुर्गा चालीसा पर अन्य जानकारी पाएं।