किशोर ही नहीं दो से ढाई साल के बच्चों में भी दिखने लगे मानसिक विकार के लक्षण, भारत में गहराते मानसिक संकट पर चिंता
भारत में मानसिक स्वास्थ्य संकट अब किशोरों तक सीमित नहीं, बल्कि 2-2.5 साल के बच्चों में भी इसके लक्षण दिख रहे हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि अत्यधिक चिड़चि ...और पढ़ें

भारत में दो साल के बच्चे भी मानसिक विकार के शिकार हो रहे हैं। प्रतीकात्मक तस्वीर
HighLights
दो से ढाई साल के बच्चों में दिख रहे मानसिक विकार के लक्षण।
मोबाइल उपयोग, संवाद में कमी आदि समस्याओं का कारण।
समय पर हस्तक्षेप से गंभीर मानसिक रोगों को रोका जा सकता है।
अनूप कुमार सिंह, नई दिल्ली। भारत में मानसिक स्वास्थ्य संकट अब केवल किशोरों या युवाओं तक सीमित नहीं रह गया है। शैशवावस्था से ही मानसिक संकट की आहट सुनाई देनी लगी है। दो साल के बच्चे भी मानसिक विकार के शिकार हो रहे हैं। चिकित्सा विशेषज्ञों ने बताया कि दो से ढाई वर्ष तक की उम्र के बच्चों में भी मानसिक विकारों और व्यावहारिक लक्षणों के संकेत सामने आ रहे हैं।
बच्चों में मानसिक चुनौतियां बढ़ीं
2024 में प्रकाशित अंतरराष्ट्रीय शोध और यूनिसेफ की रिपोर्ट इस बात की पुष्टि करते हैं कि पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों में मानसिक और विकासात्मक चुनौतियां तेजी से बढ़ रही हैं। शोध में यह स्पष्ट किया गया है कि तात्कालिक हस्तक्षेप (अर्ली इंटरवेंशन) से इन बच्चों के मानसिक विकास की दिशा बदली जा सकती है क्योंकि यही समय उनके मस्तिष्क के विकास का भी होता है।
गंभीर मानसिक समस्याओं का रूप ले रहे
इंडियन साइकैट्रिक सोसायटी के 77वें वार्षिक अधिवेशन में भाग लेने पहुंचे बाल रोग तथा मेडिको लीगल विशेषज्ञ डा. अरुण गुप्ता ने दैनिक जागरण से बातचीत में इसकी पुष्टि करते हुए चेताया कि ऐसे लक्षण आगे चलकर गंभीर मानसिक समस्याओं का रूप ले सकते हैं। बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर गंभीर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा है कि अब मानसिक विकारों के लक्षण स्कूल जाने वाले बच्चों तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि दो से 2.5 वर्ष तक की उम्र के बच्चों में भी इसके संकेत दिखाई देने लगे हैं।
बाल स्वभाव मानकर टाल देना खतरनाक
इस उम्र में दिखने वाले व्यवहारिक और भावनात्मक लक्षण यदि समय रहते पहचाने नहीं गए, तो आगे चलकर ये गंभीर मानसिक विकारों में बदल सकते हैं। इहबास के पूर्व निदेशक डा. निमेष जी देसाई ने बताया कि अत्यधिक चिड़चिड़ापन, बार-बार और बिना कारण रोना, सामाजिक प्रतिक्रिया में कमी, आंखों से संपर्क न बनाना, नींद की गड़बड़ी और असामान्य जिद जैसे संकेतों को सामान्य बाल स्वभाव मानकर टाल देना खतरनाक हो सकता है।
खबरें और भी
मानसिक रोगों के बोझ को कर सकते हैं कम
उन्होंने कहा कि यही लक्षण आगे चलकर एंग्जायटी, व्यवहार विकार और भावनात्मक असंतुलन का आधार बनते हैं। माता-पिता, डाक्टर, आंगनवाड़ी व स्कूल मिलकर इस पर साझा काम करें तो बचपन में ही मानसिक विकारों को रोका जा सकता है। तो आने वाले वर्षों में देश पर बढ़ते मानसिक रोगों के बोझ को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
छोटे बच्चों में मानसिक विकार बढ़ने के प्रमुख कारण
- अत्यधिक मोबाइल और स्क्रीन का उपयोग, बच्चों को चुप कराने, खाना खिलाने या सुलाने के लिए मोबाइल देने से बच्चा इनका एडिक्ट हो जाता है, इससे उसका सामाजिक और भावनात्मक विकास बाधित होता है।
- माता-पिता का सीमित समय और संवाद की कमी से भावनात्मक जुड़ाव कम हो रहा है, जिससे बच्चे असुरक्षा और चिड़चिड़ेपन का शिकार होते हैं।
- प्राकृतिक खेल और शारीरिक गतिविधि की कमी, खुले में खेलने, दौड़ने-कूदने और अन्य बच्चों से मिलने के अवसर घटने से बच्चों का सामाजिक समझ और भावनात्मक संतुलन प्रभावित होता है।
- अनियमित दिनचर्या और नींद की कमी, देर रात तक जागना, स्क्रीन देखते हुए सोना बच्चों के मस्तिष्क विकास पर नकारात्मक असर डालती है।
- अत्यधिक अनुशासन या अपेक्षाएं, बहुत छोटी उम्र में ही बच्चों पर जल्दी सीखने, जल्दी बोलने या ‘परफेक्ट’ बनने का दबाव डालना मानसिक तनाव पैदा करता है।
यह भी पढ़ें- यूजीसी के नए बिल के विरोध में डॉक्टर भी उतरे, बोले- इलाज के समय नहीं पूछते मरीज की जाति