Trending

    विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

    केजरीवाल की अर्जी पर आया फैसला, सुनवाई से खुद को अलग नहीं करेंगी जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा

    By Vineet TripathiEdited By: Sonu Suman
    Updated: Mon, 20 Apr 2026 07:12 PM (IST)

    दिल्ली शराब घोटाले से जुड़े केस में, न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने केजरीवाल की खुद को अलग करने की मांग खारिज कर दी। न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि जन ...और पढ़ें

    न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने केजरीवाल के मामले से जुड़े केस खुद को अलग करने की अर्जी की खारिज।

    न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने केजरीवाल के मामले से जुड़े केस खुद को अलग करने की अर्जी की खारिज।

    HighLights

    1. केजरीवाल की मांग न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने खारिज की

    2. जनता में गलत धारणा जाने से रोकने की बात

    3. जजों को मुकदमे लड़ने वाले की तरफ से टेस्ट पास करना होगा

    जागरण संवादाता, नई दिल्ली। कथित शराब घोटाले से जुड़े केस की सुनवाई से न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने खुद को अलग करने की केजरीवाल की मांग को खारिज कर दिया है।

    न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि अगर मैं खुद को इस मामले से अलग कर लेती हूं तो जनता को यह लगने लगेगा कि जज किसी खास राजनीतिक दल या विचारधारा से जुड़े हुए हैं। यह अदालत, खुद को मामले से अलग करके, ऐसी धारणा बनने की अनुमति नहीं दे सकती।

    अलग किया तो किसी भी जज के लिए काम करना नामुमकिन: जस्टिस शर्मा

    न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि मेरा न्यायिक करियर 34 साल का है। लेकिन, क्या ऐसा हो सकता है कि जजों को अब मुकदमा लड़ने वाले की तरफ से तय किया गया एक और टेस्ट पास करना पड़े, ताकि यह साबित हो सके कि वे केस सुनने के लिए योग्य हैं? ऐसे में, जजों को उस मनगढ़ंत टेस्ट की शर्तों को पूरा करना होगा, जैसे कि उन्होंने किसी संगठन के कार्यक्रम में हिस्सा नहीं लिया हो, या उनके परिवार के सदस्य कानूनी पेशे में न हों। ऐसा होने पर किसी भी जज के लिए काम कर पाना नामुमकिन हो जाएगा।

    न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि मुझे पता है कि एक न्यायाधीश के रूप में मेरी आलोचना की जाएगी। चाहे वो इंटरनेट मीडिया हो या आवेदक। मुझे पता है कि मुझे कितना और क्या करना है। उन्होंने कहा कि अगर मैं बिना सुने इन्कार कर देती तो मैं अपनी ड्यूटी सरेंडर कर देता।

    सुनवाई से अलग होने के गहरे संवैधानिक प्रभाव होंगे: जस्टिस शर्मा

    न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि यह बार-बार कहा गया था कि मेरी ईमानदारी पर कोई संदेह नहीं है और मेरी बहुत इज्जत करते हैं पर उन्हें कहा कि वो अपने मन का क्या करें जब उनके मन में ऐसे विचार आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि सुनवाई से अलग होने के गहरे संवैधानिक प्रभाव होंगे।

    खबरें और भी

    न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि मैंने अपने आप से पूछा कि अगर मैं इनकार नहीं करूंगी तो क्या हो सकता है। फिर मैंने सोचा अगर मैं मना कर दूं तब क्या होगा। उन्होंने कहा कि मैंने बहुत से एमपी-एमएलए केस भी दूसरे कोर्ट में ट्रांसफर किए हैं, अगर मुझे महसूस हुआ कि केस यहां नहीं सुना जाना चाहिए।

    सिसोदिया की तरफ से पेश वकील के तर्क का किया जिक्र

    न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने मनीष सिसोदिया की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े के तर्क का जिक्र किया। जिसमें उन्होंने माता सीता को एक बार नहीं बल्कि दो बार अग्नि परीक्षा देने का जिक्र किया था।

    उन्होंने कहा कि यह कोर्ट इस नई बात के लिए शुक्रगुजार है, लेकिन अगर इस कोर्ट को एक आरोपित अग्नि परीक्षा देने के लिए कहता है, जिसे बरी कर दिया गया है, तो इस कोर्ट को यह सवाल करना चाहिए कि एक जज को सिर्फ एक आरोपित के कहने पर अग्नि परीक्षा क्यों देनी पड़ती है, सिर्फ इसलिए कि उसे डर है कि जज गलत नतीजा दे सकता है?'

    कोई वादी बिना साक्ष्य के जज को भी जज नहीं कर सकता: जस्टिस शर्मा

    न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि एक आरोपित यह साबित कर सकता है कि वह बेगुनाह है, लेकिन उसे यह साबित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती कि जज दागी है। उन्होंने कहा कि जब वादी अदालत को जज करेगा और जब अदालत उसे जज करेगी, उसका अलग क्राइटेरिया नहीं हो सकता। कोई वादी बिना साक्ष्य के जज को भी जज नहीं कर सकता।

    न्यायाधीश का पद संयम और मौन की मांग करता है: जस्टिस

    न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि खुद को मामले से अलग कर लेने का आसान रास्ता, बाहर निकलने का एक आसान जरिया हो सकता था। लेकिन यह अदालत जानती है कि न्यायाधीश का पद संयम और मौन की मांग करता है। फिर भी, इस मौन के कारण स्वयं संस्था को ही कोई क्षति नहीं पहुंचनी चाहिए। लगाया गया प्रत्येक आरोप, न्यायपालिका की सामूहिक संस्था पर ही प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

    न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि लगाए गए आरोप और जिन संबंधों का जिक्र किया गया, वे इस मामले से संबंधित नहीं थे। इन कार्यवाही से मीडिया द्वारा गढ़ी गई कहानी को जोड़ने की कोशिश की गई। इस अदालत ने बिना किसी दबाव के इस मामले पर निर्णय सुनाया है।

    यह सरेंडर करने जैसा होगा: जस्टिस

    न्यायमूर्ति शर्मा ने कहा कि जज का ऑफिस खुद से अलग होने की मांग करता है। यह सरेंडर जैसा होगा, अगर मैं बिना एप्लीकेशन को सुने अपनी ड्यूटी सरेंडर कर लेती तो यह रास्ता आसान होता क्योंकि कोई मुझे या मेरे परिवार को कुछ नहीं कहता। लेकिन इंस्टीट्यूशन के फायदे में नहीं हैं कि मैं बिना जजमेंट के ड्यूटी सरेंडर कर लेती। उन्होंने कहा कि यह कोर्ट ज्यूडिशियल सिस्टम पर भरोसे को कम नहीं होने देगा और उसे नुकसान नहीं पहुंचने देगा।

    यह भी पढ़ें- दिल्ली के पटपड़गंज में मोमोज खाने से 15 से ज्यादा लोग बीमार, एक बच्चा ICU में एडमिट