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    दुश्मन की गोली से ज्यादा दर्द दे रहे सरकारी वादे, कारगिल वेटरन लांस नायक सतबीर सिंह की रुला देने वाली दास्तान

    Updated: Fri, 24 Jul 2026 04:24 PM (IST)

    कारगिल युद्ध के नायक लांस नायक सतबीर सिंह 26 साल से अपने अधिकारों और सम्मान के लिए संघर्ष कर रहे हैं। युद्ध में घायल होने के बावजूद उन्हें आवंटित जमीन ...और पढ़ें

    कारगिल युद्ध के नायक लांस नायक सतबीर सिंह 26 साल से अपने अधिकारों और सम्मान के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ग्राफिक्स एआई

    कारगिल युद्ध के नायक लांस नायक सतबीर सिंह 26 साल से अपने अधिकारों और सम्मान के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ग्राफिक्स एआई

    HighLights

    1. कारगिल नायक सतबीर सिंह 26 साल से न्याय को तरस रहे।

    2. युद्ध में तीन गोलियां लगीं, एक आज भी पैर में।

    3. जमीन और पेट्रोल पंप के वादे अधूरे, वापस ली गई जमीन।

    संजय डबास, बाहरी दिल्ली। देश की रक्षा के लिए अपनी जान जोखिम में डालने वाले सैनिक को यदि अपने अधिकारों और सम्मान के लिए वर्षों तक संघर्ष करना पड़े, तो यह व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। कारगिल युद्ध में अदम्य साहस का परिचय देकर दुश्मन को मुंहतोड़ जवाब देने वाले मुखमेलपुर गांव के वीर सैनिक लांस नायक सतबीर सिंह आज अपने हक के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने को मजबूर हैं।

    संघर्ष की गाथा

    युद्ध के दौरान उन्हें तीन गोली लगीं, एक गोली आज भी उनके पैर में फंसी हुई है, इस कारण उन्हें चलने-फिरने में गंभीर परेशानी होती है। सतबीर सिंह को गोली के दर्द से ज्यादा तकलीफ अधूरे सरकारी वादों से है। 26 साल के इंतजार के बाद भी वादे पूरे नहीं हुए।

    सतबीर सिंह कहते हैं कि कारगिल की लड़ाई हम जीत गए, लेकिन अपने ही सिस्टम से न्याय की लड़ाई हार रहे हैं। हमें किसी का अहसान नहीं चाहिए, सिर्फ वह सम्मान और अधिकार चाहिए, जिसका वादा देश ने हमसे किया था। भारतीय सेना में 13 वर्ष, 11 महीने और 15 दिन तक सेवा देने वाले सतबीर सिंह को उत्कृष्ट सेवाओं के लिए विशेष सेवा मेडल से सम्मानित किया गया।

    लांस नायक सतबीर सिंह बताते हैं कि 13 जून 1999 की सुबह वह कारगिल की रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण तोलोलिंग पहाड़ी पर अपनी नौ सदस्यीय टुकड़ी का नेतृत्व कर रहे थे। इसी दौरान लगभग 15 मीटर की दूरी पर घात लगाए बैठे पाकिस्तानी सैनिकों से उनका आमना-सामना हुआ।

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    हालात बेहद चुनौतीपूर्ण थे, लेकिन उन्होंने बिना घबराए हैंड ग्रेनेड से जवाबी हमला किया। इस हमले में चार पाकिस्तानी सैनिक मारे गए। हालांकि इस भीषण मुठभेड़ में भारतीय सेना के सात जवान वीरगति को प्राप्त हुए।

    मुठभेड़ के दौरान सतबीर सिंह को तीन गोलियां लगीं। एक गोली पैर को चीरते हुए एड़ी से बाहर निकल गई, दूसरी गोली आज भी उनकी एड़ी में फंसी हुई है, जबकि तीसरी गोली उनकी जांघ में लगी थी। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद उन्होंने मोर्चा नहीं छोड़ा और अपने साथियों के साथ डटे रहे। युद्ध समाप्त होने के बाद भी शरीर में फंसी गोली और अन्य चोटों का दर्द उनका लगातार पीछा कर रहा है। आज भी उन्हें सामान्य रूप से चलने-फिरने में कठिनाई होती है।

    वादे किए, लेकिन पूरे नहीं हुए

    सतबीर सिंह बताते हैं कि युद्ध के बाद तत्कालीन सरकार ने उनके साहस और बलिदान के सम्मान में पांच बीघा जमीन और एक पेट्रोल पंप आवंटित करने का वादा किया था। उनका आरोप है कि पेट्रोल पंप आज तक आवंटित नहीं किया गया। वहीं, जो जमीन उन्हें उस समय मिली थी, उसे भी लगभग पांच वर्ष बाद जो कि पांच बीघा जमीन थी, वह भी बाद में वापस ले ली गई।

    उनका कहना है कि उन्होंने उस जमीन पर फलों का बाग लगाया था, ताकि परिवार के लिए आय का स्थायी साधन बन सके, लेकिन वह सहारा भी उनसे छिन गया। वर्तमान में उन्हें लगभग 40 हजार रुपये मासिक पेंशन मिलती है। इसी राशि से उन्हें अपने छह सदस्यीय परिवार का पालन-पोषण करना पड़ रहा है। आर्थिक तंगी के कारण उनके दोनों बेटे उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं कर सके, जिसका उन्हें आज भी मलाल है।

    सतबीर सिंह का कहना है कि उनके मामले से संबंधित फाइल वर्षों से प्रधानमंत्री कार्यालय, राष्ट्रपति भवन और संबंधित मंत्रालयों के बीच घूम रही है, लेकिन आज तक कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया।

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