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    'प्रेस कॉन्फ्रेंस में CM की कही बात कानूनी रूप से लागू नहीं', गरीबों से 'केजरीवाल के वादे' पर दिल्ली HC की टिप्पणी

    Updated: Mon, 06 Apr 2026 07:53 PM (GMT+05:30)

    दिल्ली हाई कोर्ट ने पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के कोरोना काल में गरीब किराएदारों के लिए किराया देने के वादे पर एकल पीठ के फैसले को रद्द कर दिया ...और पढ़ें

    एकल पीठ के निर्णय को दिल्ली हाई कोर्ट ने रद कर दिया। फोटो: आर्काइव

    एकल पीठ के निर्णय को दिल्ली हाई कोर्ट ने रद कर दिया। फोटो: आर्काइव

    HighLights

    1. हाई कोर्ट ने केजरीवाल के गरीब किराएदारों के वादे पर फैसला पलटा

    2. मुख्यमंत्री का प्रेस कॉन्फ्रेंस में वादा कानूनी रूप से लागू नहीं

    3. सरकार को वादे को लिखित दस्तावेज में बदलना चाहिए था

    जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। कोरोना महामारी के दौरान प्रेस काॅन्फ्रेंस में गरीब लोगों के किराये को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की ओर से किए गए दावों के संबंध में एकल पीठ के निर्णय को रद करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने अहम टिप्पणी की है।

    प्रेस कॉन्फ्रेंस का वादा अपने आप में कानूनी नहीं

    न्यायमूर्ति सी हरिशंकर व न्यायमूर्ति ओम प्रकाश शुक्ला की पीठ ने कहा कि किसी मुख्यमंत्री की ओर से प्रेस काॅन्फ्रेंस में किया गया कोई भी वादा, बिना किसी औपचारिक नीति के कानूनी वादा नहीं होता है।

    अदालत ने यह टिप्पणी करते हुए एकल पीठ के आदेश को खारिज कर दिया। एकल पीठ ने अपने आदेश में पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 2020 में गरीब किराएदारों की ओर से किराया देने के लिए किए गए वादों को कानूनी तौर पर लागू करने लायक बताया था।

    लॉकडाउन के दौरान किया था किराया देने का वादा

    देशव्यापी लॉकडाउन के चार दिन बाद यानी 29 मार्च 2020 को केजरीवाल ने एक प्रेसवार्ता में सभी मकान मालिकों से उन किराएदारों से किराया न मांगने का अनुरोध किया जो आर्थिक तंगी से जूझ रहे थे।

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    केजरीवाल ने आगे कहा था कि अगर किराएदार गरीबी की वजह से ऐसा नहीं कर पाते हैं, तो सरकार उनकी ओर से किराया देगी।

    एकल पीठ ने कहा था- वादे को निभाना चाहिए

    22 जुलाई 2021 को एकल पीठ ने अपने निर्णय में कहा था कि मुख्यमंत्री द्वारा प्रेस काॅन्फ्रेंस में किया गया वादा लागू किया जाना चाहिए और एक मुख्यमंत्री से उम्मीद की जाती है कि वह ऐसे वादे को पूरा करने के लिए अपने अधिकार का इस्तेमाल करेगा।

    हालांकि, एकल पीठ के निर्णय के खिलाफ दायर अपील याचिका पर दिल्ली सरकार के इस तर्क को अदालत ने ठुकरा दिया कि प्रेस काॅन्फ्रेंस में प्रवासियों का किराया देने का दिया गया वादा सिर्फ एक नेता का दिया गया बयान था।

    मुख्यमंत्री का सार्वजनिक बयान हल्के में नहीं

    अदालत ने कहा कि लोगों के चुने हुए मुख्यमंत्री जैसे प्रतिनिधि का सार्वजनिक मंच पर दिया गया वादा अलग होता है। इस मामले में तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारा दिया गया बयान सिर्फ एक नेता का बयान नहीं है, बल्कि राज्य के मुख्यमंत्री का बयान है और इसलिए इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता।

    लेकिन बिना दस्तावेज के लागू नहीं होगा

    हालांकि, पीठ ने निर्णय सुनाया कि सिर्फ मुख्यमंत्री का दिया गया बयान कानूनी रूप में लागू नहीं होगा। पीठ ने कहा कि प्रेस काॅन्फ्रेंस के बाद कोई भी आधिकारिक दस्तावेज, जैसे ऑफिस मेमोरेंडम, अधिसूचना, सार्वजनिक नोटिस या आदेश जारी नहीं किया गया, जिससे मुख्यमंत्री के दिए गए भरोसे को रिकाॅर्ड पर लिया जा सके।

    उस समय की सरकार को मुख्यमंत्री के दिए गए भरोसे को एक लिखित दस्तावेज में बदलना चाहिए था, ताकि उसे कानूनी रूप लागू किया जा सके। पीठ ने कहा कि पहली नजर में यह देखा गया कि मुख्यमंत्री का यह भरोसा कि सरकार सभी प्रवासियों को किराया देगी, जरूरी अध्ययन और सभी जरूरी पहलुओं पर दिमाग लगाने के बाद नहीं दिया गया था।

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