'विकास' Vs 'स्वाभिमान': एक पुश्तैनी मकान के आगे क्यों थमी दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे की रफ्तार?
दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे के रास्ते में लोनी के मंडोला गांव का 'स्वाभिमान' नामक पुश्तैनी मकान अड़चन बन गया है। इसके कारण एनएचएआई को एक किलोमीटर लंबी ...और पढ़ें

दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे के बीच में खड़ा है पुश्तैनी है, जिससे एक किलोमीटर का चक्कर बढ़ा। फोटो जागरण
HighLights
मंडोला गांव का 'स्वाभिमान' मकान एक्सप्रेसवे के रास्ते में
वैकल्पिक सर्विस रोड से निकल रहा यातायात, एक किमी चक्कर
परिवार मौजूदा दर पर मुआवजे की मांग, मामला कोर्ट में
सौरभ पांडेय, पूर्वी दिल्ली। दिल्ली से देहरादून तक रफ्तार भरता देश का बहुप्रतीक्षित एक्सप्रेसवे जहां सफर को आसान और तेज बना रहा है, वहीं लोनी के मंडोला गांव में एक पुश्तैनी मकान इस महत्वाकांक्षी परियोजना की सबसे बड़ी अड़चन बनकर खड़ा है।

‘स्वाभिमान’ नाम का यह मकान एक्सप्रेसवे की प्रस्तावित सीधी कनेक्टिविटी के बीच आ गया है। नतीजतन, राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) को यहां वैकल्पिक सर्विस रोड बनाकर ट्रैफिक निकालना पड़ रहा है।
इस वजह से वाहन चालकों को करीब एक किलोमीटर लंबा अतिरिक्त चक्कर लगाना पड़ रहा है। विकास की रफ्तार और विरासत के सम्मान के बीच फंसी यह कहानी अब पूरे एक्सप्रेसवे की सबसे चर्चित कड़ी बन गई है।

मंडोला गांव में बना ‘स्वाभिमान’ मकान लक्ष्यवीर सिंह के नाम दर्ज है, जो फिलहाल अमेरिका में पढ़ाई कर रहे हैं। उनकी मां पूजा बताती हैं कि यह मकान सिर्फ एक संपत्ति नहीं, बल्कि पीढ़ियों की मेहनत और पहचान की निशानी है।
उनके मुताबिक, लक्ष्यवीर सिंह के दादा ने वर्षों पहले यह मकान बनवाया था। इसलिए बनवाया क्योंकि यह गांव में होते हुए भी यह दिल्ली से बेहद नजदीक था।
‘स्वाभिमान’ सिर्फ मकान नहीं, परिवार की पहचान
पूजा बताती हैं कि ‘स्वाभिमान’ नाम यूं ही नहीं रखा गया। जब उनके ससुर ने यह मकान बनवाया, तब इसे परिवार की मेहनत, संघर्ष और सम्मान का प्रतीक मानते हुए यह नाम दिया गया।
यही वजह है कि यह घर आज भी परिवार के लिए सिर्फ चाहरदीवारी नहीं, बल्कि भावनात्मक जुड़ाव, स्मृतियों और विरासत का केंद्र है। परिवार का कहना है कि समाधान ऐसा होना चाहिए, जिसमें विकास भी हो और उनकी पीढ़ियों की पहचान का सम्मान भी बना रहे।
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वर्तमान दर से मिले मुआवजा
पूजा कहती हैं कि परिवार विकास कार्यों के खिलाफ नहीं है, लेकिन वे चाहते हैं कि मुआवजा सम्मानजनक और मौजूदा दरों के हिसाब से मिले। उनका कहना है कि मंडोला योजना के लिए 1998 में जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हुई थी, लेकिन परिवार ने उस समय जमीन देने से इनकार कर दिया था।
अब आवास विकास परिषद 1998 की करीब 1100 रुपये प्रति वर्गमीटर दर से मुआवजा देना चाहती है, जबकि मौजूदा बाजार दर करीब 35 हजार रुपये प्रति वर्गमीटर है। परिवार का कहना है कि इतने पुराने रेट पर मुआवजा मंजूर नहीं है। मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच के समक्ष लंबित है और निर्णय आने का इंतजार सभी को है।

सर्विस रोड से निकल रहा ट्रैफिक, एक किलोमीटर का बढ़ा चक्कर
मकान एक्सप्रेसवे के मंडोला पर बने रैंप के बीच आने के कारण एनएचएआइ को यहां वैकल्पिक सर्विस रोड बनानी पड़ी है। फिलहाल इसी सर्विस रोड से ट्रैफिक निकाला जा रहा है। इस वजह से वाहन चालकों को करीब एक किलोमीटर लंबा अतिरिक्त चक्कर लगाना पड़ रहा है।
हालांकि इससे आवागमन पूरी तरह बाधित नहीं है, लेकिन इस हिस्से में एक्सप्रेसवे की सीधी रफ्तार पर असर पड़ा है। जब तक मुआवजा विवाद का समाधान नहीं होता, तब तक यही अस्थायी व्यवस्था जारी रहने की संभावना है।
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