राष्ट्रीय शिक्षा नीति का प्रभाव: स्कूलों से गायब हो रही हैं विदेशी भाषाएं
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के तीन-भाषा फार्मूले के कारण स्कूलों में विदेशी भाषाओं (फ्रेंच, स्पैनिश, जर्मन) की स्थिति कमजोर हो रही है। दो भारतीय भाषाओ ...और पढ़ें
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राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के तीन-भाषा फार्मूले के कारण स्कूलों में विदेशी भाषाओं (फ्रेंच, स्पैनिश, जर्मन) की स्थिति कमजोर हो रही है।
HighLights
NEP के तीन-भाषा फार्मूले का विदेशी भाषाओं पर असर।
दो भारतीय भाषाओं की अनिवार्यता से विदेशी भाषाओं की जगह घटी।
छात्रों के करियर विकल्प और भाषाई विविधता पर संभावित नकारात्मक प्रभाव।
रीतिका मिश्रा, नई दिल्ली। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) द्वारा राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) के तहत तीन-भाषा फार्मूले को लागू करने की प्रक्रिया ने स्कूलों के भाषा ढांचे को तेजी से बदलना शुरू कर दिया है और इसका सबसे बड़ा असर फ्रेंच, स्पैनिश और जर्मन जैसी विदेशी भाषाओं पर पड़ता दिख रहा है।
जहां पहले ये भाषाएं स्कूलों में वैकल्पिक भाषा के रूप में आसानी से पढ़ाई जाती थीं और बोर्ड स्तर पर इनके बाकायदा परीक्षा भी होती थी, वहीं अब दो भारतीय भाषाओं को अनिवार्य किए जाने के बाद इनकी जगह लगातार सिमटती जा रही है।
स्कूलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती तीन भाषाओं के संतुलन की है। नई व्यवस्था में विद्यार्थियों को कम से कम दो भारतीय भाषाएं पढ़ाना जरूरी है, ऐसे में अंग्रेजी माध्यम वाले अधिकांश स्कूल हिंदी के साथ पंजाबी या उर्दू जैसे विकल्प दे रहे हैं, जबकि अंग्रेजी पहले से ही अनिवार्य बनी हुई है। इसी तरह हिंदी माध्यम के स्कूल अंग्रेजी के साथ संस्कृत, उर्दू या पंजाबी जैसे विकल्प दे रहे हैं, जबकि हिंदी पहले से ही अनिवार्य है।
विदेशी भाषाओं के लिए जगह बचना मुश्किल
इस संरचना में विदेशी भाषाओं के लिए जगह बचना मुश्किल हो रहा है। द्वारका स्थित एक निजी स्कूल की प्रधानाचार्या ने कहा कि विद्यार्थियों में विदेशी भाषा सीखने की उत्सुकता रहती है। अभी तक बहुत से विद्यार्थी ये भाषा छठवीं से लेते थे और बकायदा इस विषय की बोर्ड परीक्षा भी देते थे। लेकिन बोर्ड के इस निर्णय के बाद उनको निराशा मिली है।
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कई प्रधानाचार्यों के मुताबिक फिलहाल तो फ्रेंच और जर्मन को हाबी कक्षाओं में शामिल किया है लेकिन नए सत्र से इन्हें बंद करने पर विचार किया जा रहा हैं।
शिक्षकों का कहना है कि पहले विद्यार्थियों के पास विषय चुनने की स्वतंत्रता अधिक थी और फ्रेंच-जर्मन को न केवल रुचि बल्कि बेहतर अंक लाने के लिए भी चुना जाता था। 10वीं में ये विषय बोर्ड परीक्षा का हिस्सा होते थे, जिससे विद्यार्थियों को एक अतिरिक्त अकादमिक विकल्प मिलता था। लेकिन अब जब दो भारतीय भाषाएं अनिवार्य हो गई हैं, तो छात्रों के लिए विदेशी भाषा चुनना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं रह गया है।
वद्यार्थियों के पास भविष्य में विकल्प सीमित
शिक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि यह बदलाव केवल विषय चयन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर आगे चलकर करियर विकल्पों पर भी पड़ सकता है। विदेशी भाषाओं का ज्ञान उच्च शिक्षा, अंतरराष्ट्रीय अवसरों और कई पेशेवर क्षेत्रों में महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में यदि स्कूल स्तर पर ही इन भाषाओं की पहुंच कम हो जाएगी, तो विद्यार्थियों के पास भविष्य में ये विकल्प सीमित हो सकते हैं।
नीति का उद्देश्य भले ही भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देना और भाषाई जड़ों को मजबूत करना हो, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका एक अनपेक्षित परिणाम देखने को मिल सकता है, जहां भाषाई विविधता का दायरा सिमट जाएगा। स्थिति यह हो गई है कि विद्यार्थी अनिवार्य भारतीय भाषाओं के कारण विदेशी भाषाएं चुन ही नहीं पा रहे हैं।
शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यही रुझान जारी रहा तो आने वाले वर्षों में स्कूलों में विदेशी भाषाएं केवल हाबी कक्षाओं का हिस्सा बनकर रह जाएंगी, या पूरी तरह समाप्त भी हो सकती हैं। ऐसे में संतुलन बनाने की जरूरत है, ताकि भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने के साथ-साथ छात्रों के वैश्विक पहुंच को भी बनाए रखा जा सके।