अंकित शर्मा को मिला इंसाफ! ताहिर हुसैन को कोर्ट ने सजा सुनाते हुए क्या-क्या कहा?
फरवरी 2020 के दिल्ली दंगों में आईबी अधिकारी अंकित शर्मा की हत्या के मामले में आम आदमी पार्टी के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन को उम्रकैद की सजा सुनाई गई है ...और पढ़ें

ताहिर हुसैन को अंकित शर्मा हत्याकांड में उम्रकैद की सजा मिली।
जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। फरवरी 2020 में दिल्ली दंगों के दौरान इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) के अधिकारी अंकित शर्मा की हत्या के मामले में आम आदमी पार्टी (AAP) के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन को उम्रकैद की सजा सुनाई गई है। सजा सुनाए जाने के बाद, दोषी के परिवार वाले कोर्ट रूम में ही रोने-बिलखने लगे। इस दौरान कोर्ट परिसर में एक महिला बेहोश भी हो गई।

बचाव पक्ष ने किया था कम सजा देने का अनुरोध
वहीं, बचाव पक्ष ने मृत्युदंड का विरोध करते हुए अदालत से कहा था कि यह मामला रेयरेस्ट ऑफ द रेयर की श्रेणी में नहीं आता। बचाव पक्ष ने दोषियों की सामाजिक और पारिवारिक परिस्थितियों सहित अन्य आधारों का हवाला देते हुए उन्हें मृत्युदंड न देने और कम सजा देने का अनुरोध किया था।
दोनों पक्षों की दलीलें पूरी होने के बाद अदालत ने सजा पर फैसला सुनाने के लिए 31 जुलाई की तारीख तय की थी। अब सभी की निगाहें अदालत के फैसले पर टिकी हैं। अंकित शर्मा का शव 26 फरवरी 2020 को चांदबाग क्षेत्र के एक नाले से बरामद हुआ था।
कोर्ट ने सजा सुनाते हुए क्या-क्या कहा?
कोर्ट ने कहा की अंकित को जानवरों की तरह मारा गया और मारने के बाद भी शव को नाले में फेंका गया। समाज को झकझोरने वाला मामला है। दोषियों के परिवार ने आश्रित होने की बात कहकर सजा कम करने की मांग बचाव पक्ष ने की है लेकिन इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।
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अभियोजन ने ताहिर के घर को दंगों का लॉन्च पैड बताया लेकिन ये इस केस के चार्ज से जुड़ा नहीं है। इसके साथ ही अदालत ने ताहिर हुसैन को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। साथ ही कोर्ट ने अलग-अलग धाराओं में जुर्माना भी लगाया गया।

हालांकि राज्य ने दोषियों के लिए मौत की सजा मांगी थी, लेकिन कोर्ट ने देखा कि प्रॉसिक्यूशन रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी पेश करने में नाकाम रहा जिससे पता चले कि पांचों दोषियों का स्वभाव हिंसक था या वे अपराधी थे।
कोर्ट ने कहा कि दोषियों का पहले किसी भी अपराध में शामिल होने का कोई इतिहास नहीं था, और दोषियों को अनुशासन में रखा जा सकता था और नियम-आधारित आदेश का पालन करने के लिए कहा जा सकता था।
कोर्ट ने कहा कि मौत की सज़ा देने पर कोई रोक नहीं है, लेकिन ऐसे मामलों में, किसी व्यक्ति की ज़िंदगी खत्म करने के आदेश को सही ठहराने के लिए सिर्फ गैर-कानूनी भीड़ में शामिल होने से ज्यादा कुछ साबित होना चाहिए।