दिल्ली का एक ‘मनहूस बंगला’, 33 शामनाथ मार्ग की रहस्यमयी कहानी; जहां टिक न सका कोई मुख्यमंत्री
दिल्ली का 33 शामनाथ मार्ग 'मनहूस बंगला' के नाम से जाना जाता है, जहां कई मुख्यमंत्री और मंत्री अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए या दुर्भाग्य का सामना किय ...और पढ़ें

दिल्ली का 33 शामनाथ मार्ग एक फिर से चर्चा में है। जागरण

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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। नई दिल्ली के सिविल लाइंस इलाके में स्थित 33 शामनाथ मार्ग एक बार फिर चर्चा में है। दशकों से ‘मनहूस बंगला’ कहे जाने वाले इस वीआईपी आवास को लेकर मिथक और उनसे जुड़ीं राजनीतिक घटनाएं हैं। लंबे समय से खाली पड़े इस बंगले में अब लगभग 20 साल बाद नए निवासी की संभावना जताई जा रही है।
तीन मुख्यमंत्रियों से जुड़ा ‘अधूरा कार्यकाल’ का मिथक
इस बंगले की रहस्यमयी छवि की शुरुआत 1952 से मानी जाती है, जब दिल्ली के पहले मुख्यमंत्री चौधरी ब्रह्म प्रकाश ने इसे अपना निवास बनाया। उनका कार्यकाल पूरा होने से पहले ही समाप्त हो गया।

दिल्ली के पहले मुख्यमंत्री चौधरी ब्रह्म प्रकाश। (सोशल मीडिया)
इसके बाद 1993 में दिल्ली के मुख्यमंत्री मदन लाल खुराना भी इसी बंगले में रहे, लेकिन वे भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके।

मदन लाल खुराना। (सोशल मीडिया)
1996 में साहिब सिंह वर्मा मुख्यमंत्री बने। उन्होंने इस बंगले में रहने से तो परहेज किया, लेकिन इसका उपयोग अपने कैंप कार्यालय के रूप में किया। वे भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके और उनकी जगह सुषमा स्वराज ने ली, जो दिल्ली की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं। इन तीन घटनाओं ने इस आवास को ‘राजनीतिक बदकिस्मती’ से जोड़ दिया।

साहिब सिंह वर्मा। (सोशल मीडिया)
2003 की घटना ने और गहराया डर
साल 2003 में दिल्ली सरकार में मंत्री रहे दीपचंद बंधु ने सहयोगियों की सलाह के बावजूद इस बंगले को अपना निवास बनाया। कुछ ही दिनों बाद उनकी तबीयत बिगड़ी और उन्हें मेनिन्जाइटिस हो गया। अस्पताल में इलाज के दौरान उनका निधन हो गया।
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इस घटना के बाद यह धारणा और मजबूत हो गई कि 33 शामनाथ मार्ग ‘मनहूस’ है। परिणामस्वरूप, यह बंगला लंबे समय तक खाली पड़ा रहा।
नेताओं और अफसरों ने भी बनाई दूरी
बताया जाता है कि मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने भी इस बंगले में रहने से इनकार कर दिया था। करीब एक दशक तक कोई भी नेता या वरिष्ठ अधिकारी यहां रहने को तैयार नहीं हुआ।
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दिल्ली पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित। (सोशल मीडिया)
2013 में वरिष्ठ नौकरशाह शक्ति सिन्हा ने यहां रहने का फैसला किया, लेकिन वे भी केवल चार महीने ही टिक सके और बाद में उन्हें दिल्ली सरकार छोड़नी पड़ी।
‘मनहूस’ छवि बदलने की कोशिश
आम आदमी पार्टी सरकार के कार्यकाल में इस बंगले को दिल्ली संवाद एवं विकास आयोग का कार्यालय बनाया गया। आयोग के तत्कालीन उपाध्यक्ष आशीष खेतान के कार्यकाल के दौरान बंगले में कुछ बदलाव भी किए गए।

हालांकि, वे भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके और इस्तीफा देना पड़ा। इसके बाद आयोग के उपाध्यक्ष बने जस्मिन शाह, जिनका कार्यकाल भी विवादों में रहा और उपराज्यपाल के आदेश पर कार्यालय को सील कर दिया गया।
बंगले की भव्यता और डर का साया
करीब 5500 वर्गमीटर में फैला यह दो मंजिला बंगला सुविधाओं से भरपूर है। यहां चार बेडरूम, ड्राइंग-डाइनिंग हॉल, कॉन्फ्रेंस रूम, बड़ा लॉन, फव्वारे, स्टाफ क्वार्टर और सुरक्षा व्यवस्था है।

आजादी के बाद इसे दिल्ली के मुख्यमंत्री आवास के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता था। इसके बावजूद ‘मनहूस’ छवि के कारण इसे लगातार नजरअंदाज किया गया।
20 साल बाद नया मोड़, क्या बंगले को मिलेगा नया मालिक?
अब करीब दो दशकों बाद इस बंगले को लेकर नई हलचल है। सोशल वेलफेयर मंत्री रविंदर इंद्राज सिंह ने हाल ही में इस बंगले का दौरा किया है।

हालांकि, उन्होंने अभी औपचारिक रूप से इसे स्वीकार नहीं किया है और अपने आवास विकल्पों पर विचार कर रहे हैं।
यदि वे यहां रहने का फैसला करते हैं, तो यह पहली बार होगा जब ‘मनहूस बंगला’ की कहानी किसी नए अध्याय में प्रवेश करेगी।
मिथक बनाम हकीकत
सरकारी फाइलों, राजनीतिक इतिहास और फुसफुसाई जाने वाली कहानियों के बीच, 33 शामनाथ मार्ग का यह बंगला याद दिलाता है कि सत्ता के गलियारों में कुछ पते सिर्फ ईंट-पत्थर से नहीं बने होते, वे अपने भीतर घटनाओं, संयोगों और अधूरी कहानियां भी समेटे रहते हैं।
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