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    उमर खालिद की नई याचिका: सुप्रीम कोर्ट से खुली अदालत में सुनवाई की मांग, 16 अप्रैल को तय होगी प्रक्रिया

    Updated: Mon, 13 Apr 2026 11:03 PM (IST)

    दिल्ली दंगों के आरोपित उमर खालिद ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की है। उन्होंने अपनी जमानत याचिका खारिज होने के फैसले को चुनौती दी है और ...और पढ़ें

    उमर खालिद ने सुप्रीम कोर्ट से की खुली अदालत में सुनवाई की मांग। फाइल फोटो

    उमर खालिद ने सुप्रीम कोर्ट से की खुली अदालत में सुनवाई की मांग। फाइल फोटो

    HighLights

    1. उमर खालिद ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की।

    2. जमानत याचिका खारिज होने के फैसले को दी गई चुनौती।

    3. खालिद ने खुली अदालत में सुनवाई का अनुरोध किया।

    पीटीआई, नई दिल्ली। दिल्ली दंगों के मुख्य आरोपितों में से एक उमर खालिद ने एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। सुप्रीम कोर्ट ने पांच जनवरी को उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी। अब खालिद ने इस फैसले को चुनौती दे हुए एक पुनर्विचार याचिका दायर की है।

    खालिद की ओर से अदालत में पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने जस्टिस अरविद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारी की पीठ से पुनर्विचार याचिका को खुली अदालत में सुनवाई करने का अनुरोध किया है।

    खुली अदालत में सुनवाई के लिए आवेदन दायर किया

    इस पर जस्टिस अरविंद कुमार ने कहा, हम कागजात देखेंगे। जरूरत पड़ने पर इस मामले की सुनवाई की प्रक्रिया तय करेंगे। सिब्बल ने बताया कि मामले पर 16 अप्रैल को न्यायाधीशों के कक्षों में विचार किया जाएगा और उन्होंने खुली अदालत में सुनवाई के लिए आवेदन दायर किया है।

    दरअसल रिव्यू पिटिशन पर सुनवाई चैंबर में होती है और जो आवेदन होता है उस पर जज चैंबर में विचार कर फैसला लेते हैं लेकिन अदालत की इजाजत से कई बार रिव्यू पिटिशन की ओपन कोर्ट में भी सुनवाई होती है और तब दोनों पक्षकारों को दलील पेश करने का मौका मिल जाता है।

    जनवरी में जमानत से किया था इनकार

    गौरतलब है कि जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने पांच जनवरी को उमर खालिद और सह-आरोपित शरजील इमाम को जमानत देने से इन्कार कर दिया था।

    कोर्ट ने कहा था कि रिकार्ड पर मौजूद सामग्री पहली नजर में उनके खिलाफ गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967 यानी यूएपीए के तहत मामला बनाती है।

    सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि अभियोजन पक्ष की सामग्री से पहली नजर में यह संकेत मिलता है कि दोनों की भूमिका केंद्रीय और प्रारूप तय करने वाली रही।

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