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    दिल्ली की इन ऐतिहासिक लाइब्रेरी में मिलती है आजादी की गूंज, जानिए क्या है इनकी खास कहानी

    Updated: Fri, 17 Jul 2026 07:13 PM (IST)

    दिल्ली के पुस्तकालय सिर्फ ज्ञान के केंद्र नहीं, बल्कि शहर के इतिहास और बौद्धिक धरोहर का अभिन्न अंग हैं। ये पुस्तकालय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान क्रां ...और पढ़ें

    दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी। आर्काइव

    दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी। आर्काइव

    HighLights

    1. दिल्ली के पुस्तकालय शहर की बौद्धिक धरोहर का हैं हिस्सा

    2. मारवाड़ी पुस्तकालय क्रांतिकारियों की गुप्त बैठकों का था अड्डा

    3. दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी ने लाखों लोगों को पढ़ने से जोड़ा

    प्रियंका दुबे मेहता, नई दिल्ली। दिल्ली की व्यस्त और संकरी गलियों में चल रहे हों या फिर कायदे से विकसित कनाट प्लेस की चौड़ी सड़कों पर, इसकी ऐतिहासिक समृद्धि की झलक हर ओर मिल जाती है क्योंकि दिल्ली के जर्रे-जर्रे से इतिहास की कहानियां फूटती हैं।

    शहर के विकास, इसके इतिहास को अगर समझना है तो किले, हवेलियां और स्मारकों की तरह ही पुस्तकालयों को भी जानना चाहिए, जिन्होंने राजधानी को टूटते-संभलते, बढ़ते देखा है। पुस्तकालय भी इस शहर की बौद्धिक धरोहर का हिस्सा हैं।

    आज सबरंग के इस अंक में  दिल्ली के उन स्थानों की यात्रा करते हैं, जिसने दिल्ली को पढ़ना सिखाया, किताबों से नाता जोड़ा और हर वर्ग में साहित्य की ललक पैदा की...

    'पुस्तकालय से व्‍यक्तित्‍व में आता है निखार'

    पिछले सप्‍ताह केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने केंद्रीय दिल्‍ली में महान स्वतंत्रता सेनानी लोक नायक जेपी के नाम से पुस्तकालय की शुरुआत की। उन्‍होंने कहा था, देश की तरक्की का आकलन करना है तो युवा लाइब्रेरी को देखना चाहिए। अपने अनुभव साझा करते हुए संदेश दिया था कि 'मेरे कस्बे में पुस्तकालय था, मैं भी वहां से जुड़ा था। उससे मेरे जीवन बदलाव आया।'

    युवाओं को पुस्‍तकालय से जुड़ना चाहिए इससे व्‍यक्तित्‍व में निखार आता है। दिल्‍ली के पुस्‍तकालयों को देखेंगे तो वाकई गृह मंत्री द्वारा कही गई बात, यहां साक्षात दिखती है। पुस्तकालय, जो सदियों से ज्ञान, बहस और सामाजिक बदलाव की गवाह रहे हैं। इस बौद्धिक विरासत की गवाह दिल्ली के पब्लिक पुस्तकालयों के अलावा कुछ और भी लाइब्रेरी हैं जिनका होना टूटी-बिखरी जिंदगियों, स्वतंत्रता के बाद सुकून तलाशते मनों के लिए दोपहरी की शीतल छांव रहा है।

    दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी के चांदनी चौक में स्थापित हरदयाल म्युनिसिपल हेरिटेज पब्लिक लाइब्रेरी जहां इतिहास के पिछले पन्नों की गवाह है वहीं ब्रेल, जेल और मोबाइल पुस्तकालय इनके विकास और विस्तार की कहानी कहते हैं।

    बाजार के शोरगुल के बीच ज्ञान का सन्नाटा

    सरोजिनी नगर का नाम सुनते ही जेहन में कैसी छवि उभरती है, एक शोर-शराबे वाली सड़क, भीड़ भरा बाजार, एक दूसरे से टकराते लोग और दूर तक एक साथ आती आवाजें। ऐसे में कोई यह सोच सकता है क्या कि इसी बाजार से सटी एक ऐसी जगह है जहां सन्नाटा है, शांति है, सुकून है, नहीं न। तो आप गलत सोच रहे हैं, ऐसा बिल्कुल है, एक बारगी हैरानी होती है यहां के पुस्तकालय में पहुंच कर।

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    सरोजिनी नगर के दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी में पहुंचकर आप भूल जाते हैं कि बाहर किन हालात को देखकर आए हैं। बहुमंजिला भवन, बाहर खड़ी एक मोबाइल वैन, शीशे की खिड़कियों से झांकता अंग्रेजों के दौर का आर्किटेक्चर जो अब बदलाव और ताजगी की राह देखता नजर आता है। लिफ्ट से पहले फ्लोर पर बने कंट्रोल रूम और प्रशासनिक खंड में पहुंचते हैं तो किताबों के व्यापक संसार से रूबरू होने का अवसर मिलता है।

    भूतल पर कई कमरों में करीने से लगी टेबल चेयर पर दर्जनों पाठक लेकिन आवाज बिल्कुल नहीं। एक एक अदद पुस्तकालय की विशेषता होती है। दिल्ली के पुस्तकालयों का जिक्र आता है तो पता चलता है कि कई ऐतिहासिक पुस्तकालय हैं जिसमें चांदनी चौक का पुस्तकालय अपने आप में पुराने और भव्य आर्किटेक्चर के लिए एक अलग पहचान रखता है। पाठकों के अलावा सामान्य जिज्ञासुओं के लिए भी यह आकर्षण का केंद्र है। केंद्रीय मंत्री की अपील यहां इस पुस्‍तकालय में साक्षात दिखती है।

    इससे भी पुराने पुस्तकालय और इनकी शाखाएं दिल्ली के विभिन्न इलाकों में फैली हुई हैं। इनका अपना इतिहास भी है। 

    सुकून की छांव देती दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी

    सरोजिनी नगर की ही तरह पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन की सड़कों पर चलते हुए अचानक एक ऐसा प्रांगड़ मिल जाता है जहां प्रकृति की शीतलता के साथ-साथ ज्ञान का प्रकाश फैलता है। बीच में खुले आंगन, चारों ओर बरामदे, ऊंची छतें, मोटी दीवारें और बड़े-बड़े दरवाजे यह पुस्तकालय औपनिवेशिक आर्किटेक्चर की झलक देता है।

    बाहर से यह इमारत किसी सरकारी दफ्तर जैसी सादगी लिए दिखती है लेकिन भीतर प्रवेश करते ही लकड़ी की अलमारियों में सजी लाखों किताबें, ऊंची छतों वाले शांत वाचन कक्ष और दशकों पुराने अखबारों व संदर्भ ग्रंथों से भरे अभिलेखागार इसे दिल्ली की सबसे महत्वपूर्ण बौद्धिक धरोहरों में बदल देते हैं। असल में स्वतंत्रता के बाद लोगों को जागरूक करने के जरूरत महसूस की जा रही थी।

    वर्ष 1951 में भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय और यूनेस्को के साझा पायलट प्रोजेक्ट के तहत दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी स्थापित की गई। आधुनिक, लोकतांत्रिक और निश्शुल्क पुस्तकालय का उद्घाटन पंडित जवाहरलाल नेहरू और मौलाना अबुल कलाम आजाद ने किया। इस लाइब्रेरी को बनाने के लिए जगह की बात आई तो तय हुआ कि पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के सामने के विशाल इमारत में बनाई जाए।

    यह विशाल भवन था डालमिया जैन हाउस। द्वितीय विश्व युद्ध के दौर में यह वेवेल कैंटीन थी और बाद में यहां शरणार्थी शिविर बनाया गया था। फिर क्या था ब्रिटिश सलाहकार फ्रैंक एम गार्डनर और पहले भारतीय निदेशक डीआर कालिया ने इस पुस्तक को एक वैश्विक माडल के तौर पर आकार दिया गया।

    सरोजिनी नगर में इसकी साउथ जोन शाखा है जिसकी शुरुआत 1985 में हुई थी। इसका चिल्ड्रन सेक्शन पूरे साउथ दिल्ली के बच्चों का मुख्य आकर्षण है। इसके तहत नौ सब-ब्रांच, दो कम्युनिटी और आरसी रिसेटलमेंट कालोनी लाइब्रेरी काम करती हैं।

    एक रीडिंग रूम से शुरू हुआ सबसे पुरानी लाइब्रेरी का सफर

    हरदयाल म्युनिसिपल हेरिटेज पब्लिक लाइब्रेरी दिल्ली की सबसे पुरानी सार्वजनिक लाइब्रेरी मानी जाती है। दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी आजादी के बाद भारत में आधुनिक सार्वजनिक पुस्तकालय व्यवस्था की पहली बड़ी प्रयोगशाला बनी। हालांकि पहले अंग्रेजों के लिए 1862 इसे शुरू किया गया था लेकिन बाद में इसके नाम के साथ-साथ इसका स्वरूप भी बदला।

    पहले एक छोटा सा रीडिंग रूम था फिर इसे लारेंस इंस्टीट्यूट का नाम दिया गया। इसके बाद 1916 में इसका नाम बदलकर हार्डिंग लाइब्रेरी रखा गया। इसके पीछे की कहानी यह है कि 1912 में वायसराय लार्ड हार्डिंग पर इसी चांदनी चौक में बम हमला हुआ था और बाद में अंग्रेजों ने लाइब्रेरी को नई इमारत में शिफ्ट करके लार्ड हार्डिंग के नाम पर इसका नामकरण कर दिया।

    आजादी के बाद 1970 में इस पुस्तकालय का नाम इसी इलाके के निवासी क्रांतिकारी लाला हरदयाल के नाम पर रखा गया और दिल्ली की सबसे पुरानी सार्वजनिक धरोहर के रूप में पहचानी गई।

    क्रांतिकारियों की गुप्त बैठकों का था अड्डा

    मारवाड़ी समाज का नाम आता है तो व्यवसाय और वाणिज्य से जोड़कर देखते हैं लेकिन ज्ञान की जिज्ञासा भी समाज में कम नहीं थी। शुरुआत से ही इस समाज के लोग ज्ञानार्जन को प्रमुख उद्देश्य मानते थे। नई सड़क का मारवाड़ी सार्वजनिक पुस्तकालय इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। नई सड़क इलाके में ही रहने वाले छात्र कौशल माहेश्वरी का कहना है कि उनके दादा परदादा इस लाइब्रेरी का जिक्र बड़े फक्र से किया करते थे।

    वर्ष 1915-16 में बना मारवाड़ी सार्वजनिक पुस्तकालय शहर की एक अनूठी और जीवंत बौद्धिक धरोहर का प्रतीक है। यह पुस्तकालय केवल धार्मिक, आध्यात्मिक या व्यापारिक किताबों के संग्रह तक सीमित नहीं था। लोग बताते हैं कि इसने ब्रिटिश शासन के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में एक अत्यंत महत्वपूर्ण राष्ट्रीय भूमिका निभाई थी।

    चांदनी चौक के किराणा दुकान संचालक खूबीचंद खेतान बताते हैं कि महात्मा गांधी, पंडित मदन मोहन मालवीय से लेकर बाल गंगाधर तिलक तक कई हस्तियों के नाम विजिटर्स रजिस्टर में अंकित मिल जाते हैं। यह पुस्तकालय राष्ट्रवादियों, इतिहासकारों और विचारकों की गुप्त बैठकों तथा क्रांतिकारी वैचारिक विमर्शों का अड्डा बना हुआ था।

    आज भी यह दुर्लभ हिंदी साहित्य, प्राचीन ग्रंथों और ऐतिहासिक पांडुलिपियों के अपने अनूठे और अनमोल संग्रह को सहेजे हुए है। आज भी यहां बड़े बुजुर्ग दिख जाते हैं। हालांकि अब यहां बड़ी संख्या रीसर्च स्कॉरलर और विद्यार्थियों की होती है।  

    पुस्तकालय नहीं, जादुई बांसुरीवाला

    एक दौर में दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी को जादुई बांसुरी वाला कहा जाने लगा था जिसके असर से लोग खिंचे चले आते थे। लाइब्रेरी की पूर्व डायरेक्टर जनरल डाॅ. अंजना चट्टोपाध्याय ने लिखा है कि अपने कार्यकाल के अंत में फ्रैंक गार्डनर ने इस पुस्तकालय के पाठकों की उम्र, शिक्षा, भाषा और विषयों की पसंद को लेकर एक विस्तृत और वैज्ञानिक सर्वे किया। उनके इस सर्वे की रिपोर्ट ने पूरी दुनिया को चौंका दिया।

    गार्डनर ने पाया कि इस लाइब्रेरी में 23 हजार पंजीकृत थे और सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि इनमें से 78 प्रतिशत पाठक ऐसे थे जो अपनी जिंदगी में पहली बार किसी लाइब्रेरी की दहलीज लांघ रहे थे। पुरानी दिल्ली के तंग और भीड़भाड़ वाले इलाकों में रहने वाले बच्चों के बीच इस लाइब्रेरी का जो क्रेज था, उसे बयां करते हुए गार्डनर ने अपनी रिपोर्ट में एक बेहद खूबसूरत लाइन लिखी - दिल्ली के बच्चे इस लाइब्रेरी की तरफ इस तरह खिंचे चले आते हैं जैसे वो जर्मनी की लोककथाओं वाले पीड पाइपर (जादुई बांसुरीवाले) की जादुई धुन के पीछे भाग रहे हों।

    उस समय कुल पाठकों में से 30 प्रतिशत से अधिक संख्या 16 साल से कम उम्र के बच्चों की थी। गार्डनर ने अपने इस आकलन जो लिखा था वह दिल्ली ही नहीं, पूरे देश के लिए गर्व की बात थी, उन्होंने लिखा था कि यह एशिया की सबसे व्यस्त और आधुनिक पब्लिक लाइब्रेरी है।

    मोबाइल वैन का अपना अलग ही क्रेज

    पुस्तकालय और पुस्तकें दोनों अगर घरों तक पहुंचने लगें तो क्या कहने। 75 वर्षीय हरिनाथ कहते हैं कि उन्होंने अपने बड़े बुजुर्गों से पुस्तकालय की मोबाइल वैन की कहानियां सुनी थीं कि लोगों में कितना क्रेज होता था इन्हें लेकर। 1950 और 1960 के दशक में दिल्लीवालों के पास मनोरंजन और खुद को शिक्षित करने के साधन बेहद सीमित थे। ऐसे में डीपीएल ने दिल्ली के लोगों की बौद्धिक प्यास बुझाने का काम किया।

    खासकर बच्चों और दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी की मोबाइल वैन का दौरा किसी त्योहार से कम नहीं होता था। सुंदर जैन बताते हैं कि उनकी मां को पढ़ने का शौक था और उन्हें इसका इंतजार रहता था किसी भी तीज त्योहार की तरह।

    सरोजिनी नगर के पुस्तकालय में अपना समय व्यतीत करने और समाचार पत्र पढ़ने आने वाले कैलाश नाथ का कहना है कि लोग बताते थे कि उस दौर में नीले-सफेद रंग की यह बड़ी बस जब हफ्ते में एक दिन उनके इलाके की तयशुदा जगह पर आकर खड़ी होती थी तो लोग पहले से ही हाथों में अपनी पुरानी किताबें लेकर नई किताबों के इंतजार में लाइनों में खड़े हो जाते थे।

    कहां-कहां है दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी

    पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के सामने केंद्रीय पुस्तकालय स्थित है जो पूरे सिस्टम का हेडक्वार्टर है। सरोजिनी नगर में इसकी साउथ जोन शाखा है जिसकी शुरुआत 1985 में हुई थी। इसका चिल्ड्रन सेक्शन पूरे साउथ दिल्ली के बच्चों का मुख्य आकर्षण है। इसके तहत नौ सब-ब्रांच, दो कम्युनिटी और आरसी रिसेटलमेंट कालोनी लाइब्रेरी काम करती हैं। पटेल नगर ब्रांच लाइब्रेरी वेस्ट जोन में आती है। इसकी शुरुआत 1963 में हुई थी।

    इसके छह शाखाएं और एक आरसी लाइब्रेरी हैं। करोल बाग ब्रांच नार्थ जोन में आती है। इसकी शुरुआत 1964 में हुई थी। इसके तहत सात सब-ब्रांच और पांच आरसी लाइब्रेरी संचालित होती हैं। 1964 में शहादरा में पुस्तकालय का ईस्ट जोन बनाया गया था। इसके तहत तीन शाखाएं, एक कम्युनिटी और तीन आरसी लाइब्रेरी हैं।

    इसके अलावा इस नेटवर्क में 24 सब-ब्रांच, तीन कम्युनिटी लाइब्रेरी, 11 रिसेटलमेंट कॉलोनी लाइब्रेरी, 22 डिपाजिट स्टेशन और तिहाड़ जेल के भीतर कैदियों के लिए एक विशेष जेल लाइब्रेरी भी शामिल है। जेल के पुस्तकालय में समय-समय पर किताबें बदली जाती हैं ताकि कैदी अपनी औपचारिक शिक्षा पूरी कर सकें और मुख्यधारा में लौट सकें।

    अनूठी शाखाएं भी

    1963 में सेंट्रल लाइब्रेरी के एक छोटे से कमरे से दृष्टिबाधित पाठकों के लिए डीपीएल ने ब्रेल विभाग की शुरुआत की थी। 1966 में यह लक्ष्मी बाई नगर गया और फिर 1979 में इसे लाल बहादुर शास्त्री मार्ग पर स्थित ब्लाइंड रिलीफ एसोसिएशन के परिसर में स्थानांतरित कर दिया गया। यह दिल्ली की एकमात्र ब्रेल पब्लिक लाइब्रेरी है।

    मार्च 1966 में यहां एक ब्रेल ट्रांसक्राइबिंग यूनिट शुरू की गई। एक और अनूठे पुस्तकालय का शुरुआत कॉमनवेल्थ गेम्स 2010 के दौरान हुई। पद्म भूषण स्व. उस्ताद रहीम फहीमुद्दीन खान डागर ने बाजाघर का उद्घाटन किया। यहां भारतीय शास्त्रीय और सुगम संगीत के चार हजार से अधिक दुर्लभ ग्रामोफोन रिकॉर्ड्स का संग्रह है।

    इसमें महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी जैसे तमाम लोगों के के ऐतिहासिक भाषणों के ओरिजिनल रिकॉर्ड्स भी शामिल हैं। इस खंड में एक प्रदर्शनी भी लगाई गई है जो यह बताती है कि कैसे एक वक्त में भारत दुनिया भर की ग्रामोफोन कंपनियों को रिकॉर्ड बनाने के लिए 80 प्रतिशत कच्चा माल भारतीय लाख या लाहा निर्यात करता था।

    लोगों की बात

    सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रही ईशानी को लगता है कि अगर कहीं पढ़ाई अच्छे तरीके से की जा सकती है तो वह है लाइब्रेरी। वो यहां पर सुबह से शाम तक पढ़ती हैं। किताबों की जरूरत खास नहीं पड़ती लेकिन जो माहौल और शांति मिलती है, वह घर पर, अकेले कमरे में या संस्थानों में नहीं मिल सकती। वे भले ही रहती कहीं और हैं लेकिन सरोजिनी नगर बाजार की भीड़ और शोर के बीच एक शांत स्थान मिल जाता है जो और कहीं नहीं मिल सकता।

    स्टेनो की प्रैक्टिस कर रही कीर्तिका का कहना है कि वे महिपालपुर से सरोजिनी नगर सिर्फ पुस्तकालय में पढ़ने आती हैं। वे अब सिविल सर्विसेज की तैयारी भी कर रही हैं और उन्हें लगता है कि तैयारी के लिए, सेल्फ स्टडी के लिए दिल्ली के पुस्तकालयों से बेहतर कोई स्थान नहीं हो सकता।