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    आखिर क्यों हीटवेव से बेहाल दिल्ली-एनसीआर, रात में भी भट्टी की तरह तप रहा; क्या है इसकी वजह और आगे की राह?

    Updated: Fri, 29 May 2026 04:10 PM (GMT+05:30)

    Why is Delhi-NCR Burning Even at Night: गर्मी से बेहाल दिल्‍ली-एनसीआर को बेशक गुरुवार को बारिश आने से थोड़ी राहत मिली है, लेकिन हीटवेव का अलर्ट अभी भी ...और पढ़ें

    Urban Heat Island Effect : आखिर दिल्ली में इतनी गर्मी क्यों पड़ रही है, क्या यह सिर्फ एक अस्थायी हीटवेव है? फोटो: एआई जनरेटेड

    Urban Heat Island Effect : आखिर दिल्ली में इतनी गर्मी क्यों पड़ रही है, क्या यह सिर्फ एक अस्थायी हीटवेव है? फोटो: एआई जनरेटेड

    HighLights

    1. शहर 'अर्बन हीट आइलैंड' बनने से रातें भी गर्म

    2. हरियाली और जल स्रोतों की कमी बढ़ा रही गर्मी

    3. हीटवेव को आपदा घोषित करने की उठ रही मांग

    डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। दिल्ली-NCR में दोपहर का तापमान 45 डिग्री के आसपास पहुंच चुका है, लेकिन इस बार सिर्फ दिन ही नहीं, रातें भी राहत नहीं दे पा रही हैं।

    सवाल यही है कि आखिर दिल्ली में इतनी गर्मी क्यों पड़ रही है? क्या यह सिर्फ एक अस्थायी हीट वेव है, या अब यही हमारा New Normal बनने जा रहा है?

    देर रात तक चलने वालीं गर्म हवाएं, उमस और घर की तपती फर्श और दीवारें, ये कोई मौसम में हुआ अचानक बदलाव भर नहीं है बल्कि बदलती जलवायु का संकेत है। 

    मौसम एवं पर्यावरण विज्ञानियों की मानें तो अब तापमान का पुराना पैटर्न बदल चुका है। जो गर्मी दस साल पहले असामान्य मानी जाती थी, वही अब हर साल सामान्य होती जा रही है। दिल्ली में 40-45 डिग्री तापमान अब अपवाद नहीं, बल्कि नई वास्तविकता है।

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    आखिर इतनी गर्मी क्यों पड़ रही है?

    इस गर्मी की सबसे बड़ी वजह सिर्फ मौसम नहीं, बल्कि शहर खुद भी हैं। पर्यावरण विज्ञानियों के अनुसार, दिल्ली जैसे बड़े शहर Urban Heat Island बन चुके हैं। इसका मतलब है कि शहर अपने भीतर अतिरिक्त गर्मी पैदा कर रहा है।

    दिनभर सड़कें, कंक्रीट की इमारतें, फ्लाईओवर और पक्के ढांचे सूरज की गर्मी को सोखते रहते हैं। फिर रात होते ही यही ढांचे धीरे-धीरे उस गर्मी को वापस छोड़ते हैं। यही कारण है कि अब रातें पहले जैसी ठंडी नहीं रहीं।

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    रात और दिन के तापमान का अंतर घट रहा

    पहले दिल्ली में दिन और रात के तापमान में करीब 12.5 डिग्री का अंतर होता था, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह घटकर लगभग 9 डिग्री रह गया है। यानी रातें लगातार गर्म होती जा रही हैं और शरीर को वह सुकून नहीं मिल पा रहा, जो पहले गर्मियों में रात के दौरान मिला करता था।

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    सिर्फ गर्मी नहीं, Heat Stress का भी खतरा

    मौसम एवं पर्यावरण विज्ञानियों की मानें तो लगातार अधिक तापमान में रहना सिर्फ असुविधा ही नहीं है, बल्कि इतना अधिक तापमान शरीर पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालता है। इसे Heat Stress कहा जाता है।

    जब कोई व्यक्ति पूरे दिन गर्मी में काम करता है और रात में भी उसे आराम नहीं मिलता, तो शरीर का तापमान सामान्य नहीं हो पाता है। इससे दिल की बीमारियां होती है, दिमाग पर असर पड़ता है और मांसपेशियों से जुड़ी दिक्कतें बढ़ सकती हैं।

    दिल्ली की समस्या इसलिए और गंभीर है क्योंकि यहां बड़ी आबादी ऐसे लोगों की है, जो खुले में काम करने को मजबूर हैं। जैसे स्ट्रीट वेंडर, रिक्शा चालक, सब्जी विक्रेता और कंस्ट्रक्शन वर्कर। उनके लिए हीट वेव सिर्फ मौसम नहीं, रोजी-रोटी और स्वास्थ्य दोनों का संकट है।

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    क्या गर्मी सबको बराबर प्रभावित करती है?

    हीट वेव एक  अनइक्वल क्लाइमेट डिजास्टर भी है। जिन लोगों के पास एसी, कूलर और बेहतर घर हैं, वे काफी हद तक इस गर्मी से बच सकते हैं, लेकिन जो लोग टिन की छतों वाले घरों में रहते हैं या दिनभर सड़क पर काम करते हैं, उनके लिए यह गर्मी कहीं ज्यादा खतरनाक बन जाती है। यानी जलवायु संकट से सब प्रभावित जो जरूर होते हैं, लेकिन उसका असर सभी पर बराबर नहीं होता।

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    दिल्ली और ज्यादा गर्म क्यों हो रही है?

    इस जानलेवा गर्मी की एक और बड़ी वजह है हरियाली और जल स्रोतों का कम होना।

    मौसम विज्ञानियों के मुताबिक, दिल्ली ने पिछले दशक में अपने घने पेड़ों और वाटर बॉडीज का बड़ा हिस्सा खो दिया है। जो ग्रीन कवर कभी 25-27 प्रतिशत के आसपास था, वह अब घटकर लगभग 15 प्रतिशत रह गया है। पेड़ और जल स्रोत प्राकृतिक कूलिंग सिस्टम की तरह काम करते हैं। जब शहर में हरियाली नहीं रहती तो गर्मी बढ़ने लगती है।

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    आगे का रास्ता क्या है?

    विशेषज्ञ मानते हैं कि अब सिर्फ हीट वेव आने पर अलर्ट जारी करना काफी नहीं होगा। शहरों को स्थायी रूप से हीट रेजिलिएंट बनाना पड़ेगा। इसके लिए कई कदम जरूरी बताए गए हैं- 

    • शहरों में ग्रीन कवर बढ़ाना।
    • वाटर बॉडीज को बचाना।
    • बिल्डिंग डिजाइन में ज्यादा शेड और हवा के रास्ते रखना।
    • कूल रूफ तकनीक अपनाना, जिससे छतें कम गर्म हों।
    • हीट इंडेक्स के आधार पर वार्निंग सिस्टम तैयार करना।
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    हीट वेव को मापने में ह्युमिडिटी को भी शामिल करना होगा 

    अभी तक भारत में हीट वेव को सिर्फ तापमान से मापा जाता है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि हवा की नमी यानी ह्यूमिडिटी को भी इसमें शामिल करना चाहिए। क्योंकि कई बार तापमान कम होने के बावजूद शरीर को गर्मी ज्यादा महसूस होती है।

    क्या हीट वेव को आपदा घोषित करना चाहिए?

    NGT ने देश भर में हीटवेव को लेकर केंद्र एवं राज्य सरकारों को नोटिस भेजा है, एक्शन प्लान पूछा है, इसके साथ ही टिप्पणी की है कि हीटवेव सबसे कम पहचानी जाने वाली आपदा है।

    इस वक्त डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट 2005 के तहत हीट वेव कोई आपदा नहीं है। विशेषज्ञाें की मानें तो इसे आपदा घोषित किया जाना चाहिए, जिससे इससे बेहतर तरीके से निपटा जा सके। लोगों को राहत देने और शहरों को गर्मी के लिए तैयार किया जा सके।

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    अगले पांच साल में और बढ़ेगी भीषण गर्मी

    विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) और यूके मेट ऑफिस की रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 से 2030 के बीच दुनिया में तापमान लगातार रिकॉर्ड स्तर पर बना रह सकता है।

    रिपोर्ट में 86% संभावना जताई गई है कि अगले पांच साल में नया सबसे गर्म वर्ष दर्ज होगा। वहीं 91% संभावना है कि कम से कम एक साल ऐसा होगा जब वैश्विक तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा पार कर जाएगा।

    रिपोर्ट के अनुसार, आर्कटिक क्षेत्र दुनिया के बाकी हिस्सों की तुलना में 3.5 गुना तेजी से गर्म हो रहा है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि लगातार बढ़ती गर्मी, सूखा, बाढ़ और जंगलों में आग जैसी चरम मौसमी घटनाओं को और गंभीर बना सकती है।

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    भारत में बढ़ेगा हीटवेव का खतरा

    संयुक्त राष्ट्र और विश्व मौसम विज्ञान संगठन की रिपोर्ट में कहा गया है कि आने वाले वर्षों में भीषण गर्मी का दौर और तेज हो सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 से 2030 के बीच वैश्विक तापमान रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच सकता है, जिसका असर भारत पर भी दिखाई देगा।

    विशेषज्ञों के अनुसार, देश के कई हिस्सों में लंबे समय तक सूखा और अधिक गर्मी पड़ सकती है। हीटवेव की अवधि पहले से ज्यादा लंबी होने की आशंका है, जबकि रात के तापमान में भी खास कमी नहीं आएगी।

    रिपोर्ट में कहा गया है कि अल नीनो जैसी मौसमी स्थितियां मानसून को कमजोर कर सकती हैं, जिससे गर्मी और बढ़ने का खतरा रहेगा।

    सबसे बड़ा सवाल

    दिल्ली की यह गर्मी सिर्फ मौसम भर नहीं है। यह एक चेतावनी है कि शहर किस तरह बदल रहे हैं और जलवायु संकट अब हमारे रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बन चुका है।

    अगर शहर इसी तरह कंक्रीट से भरते गए, पेड़ और पानी कम होते गए और गर्मी को सिर्फ मौसमी समस्या समझा गया, तो आने वाले वर्षों में दिल्ली जैसी महानगरों का रहने लायक बने रहना सबसे बड़ी चुनौती होगा।

    (नोटबुक एलएम की सहायता से बनाए गए ग्राफिक्स)

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